जनपद

अकीदत से निकला सरकारी चादर व गागर का जुलूस

उर्स-ए-पाक का दूसरा दिन
गोरखपुर, 3 अगस्त। नार्मल स्थित हजरत बाबा मुबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां के सालाना उर्स के दूसरे दिन मंगलवार को फज्र की नमाज के बाद कुरआन खानी हुई। प्रातः 10 बजे कुल शरीफ कार्यक्रम हुआ। जिसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के साथ ही अन्य वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया और दुआएं की। शाम को अकीदतमंदों ने बाबा को चादर पेश की।
नार्मल स्थित बाबा की दरगाह पर सबसे पहले फज्र की नमाज के बाद कुरान खानी हुई इसके बाद कुल शरीफ कार्यक्रम हुआ। मगरिब की नमाज के वक्त जफर क्लाथ हाउस तुर्कमानपुर से सरकारी चादर व गागर का जुलूस निकला जो तुर्कमानुपर, हाल्सीगंज, मिर्जापुर, साहबगंज, खुनीपुर, नखास चौक, रेती चौक, घण्टाघर, पाण्डेयहाता, नार्मल स्कूल होते हुए बाबा के आस्ताने पर पहुंचा जहां पर अकीदतमंदों ने बाबा को चादर पेश की। इस मौके पर बच्चे, बूढ़े, नौजवान, सभी शामिल हुए। जुलूस के आगे घोड़ा, बघ्घी, बैंड बाजे व शहनाई पर धुन बज रही थी। चादर व गागर जुलूस का कई चैराहों पर पर स्थानीय लोगों ने इस्तेकबाल किया।
इस दौरान दरगाह के अध्यक्ष इकरार अहमद, सैयद मोहतसिम कबीर, मौलाना मकसूद आलम, सैयद शहाब, मोहम्मद अली, शमसीर अहमद शेरू, तौकीर किक्कू, वहाज, अहमद हसन, सैयद सदफ, रमजान, बाॅबी, एजाज अहमद, सरवर, कुतुबुद्दीन, इमरान खान, अनवर आलम, कलीम, उमर कादरी, मोहम्मद कमर उर्फ राजू, रणवीर सिंह, दानिश गोरखपुरी, सद्दाम, महेन्द्र सिंह राणा, अनिल, राजा, एखलाक अहमद, नूर मोहम्मद सहित तमाम लोगों ने शिरकत किया।
देर रात तक चला कव्वाली का सिलसिला 
 हजरत मुबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां के उर्स-ए-पाक में रात कव्वाली का प्रोग्राम हुआ जिसमें एक से बढ़कर एक कव्वाली पेश की गयी। देर रात तक अकीदतमंदों ने कव्वाली का आनंद लिया।
हिंदू ही बुरा है ना मुसलमान बुरा हैं।
आ जाये बुराई पे तो इंसान बुरा हैं।।

यह कव्वाली पेश कर दिल्ली से आये आमिल आरिफ साबरी व उनके साथियों ने खूब वाहवाही पायी।
आमिल व उनके साथियों ने पेश किया
निर्धन को धनवान बना दें या अल्लाह।
बहशीं हैं, इंसान बना दें या अल्लाह।।
हिंदू-मुस्लिम एक ही थाली में खायें।
ऐसा हिन्दुस्तान बना दें या अल्लाह।।

खूब सुब्हालनल्लाह की सदायें बुलंद हुई।
बाबा की शान में गाया
मैं तेरे करम से शहीद शाह।
हर गाम नवाजा जाता हूं।।
निस्तब है तेरे दर से मुझको।
इस निस्बत पर इतराता हूं।।

फिर बारी थी कव्वाल जुनेद सुल्तानी बदायूंनी व उनके साथियों की। उन्होंने गाया
मेरी किस्मत में खुल्द है शायद।
इसलिए ऐतबार करता हूं।।
रोजे महशर का डर नहीं मुझको।
मैं मुहम्मद से प्यार करता हूं।।

लोग झूमने लगे। इसके बाद पेश किया
दीवानें हैं, दीवानें रंग अपना जमा लेंगे।
छेड़ोे ना हमें वरना ख्वाजा को बुला लेंगे।

फिर तो एक शमां बन गया।
उन्होंने बाबा की शान में पढ़ा
ऐसा तो कोई हीरा खजाने में नहीं है।
जैसा है मेरा पीर जमानें में नहीं है।।

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