साक्षात्कार

अपने हालात बदलने के लिए मुसलमानों को खुद आगे बढ़ना होगा-प्रो मोहम्मद अफरोज कादरी

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गोरखपुर, 8 फरवरी। दुनिया-ए-इस्लाम के नामवर आलिम, 40 से ज्यादा किताबों के लेखक, साउथ अफ्रीका के डलास यूनिवर्सिटी केपटाउन में प्रोफेसर मोहम्मद अफरोज कादरी का गोरखपुर आगमन सोमवार को हुआ। लखनऊ में एक पुस्तक “लहु बोलता है” का विमोचन करने भारत आये श्री कादरी ने फुर्सत निकाल कर गोरखपुर में ‘इस्लाहे उम्मत’ सम्मलेन में खिताब किया। चंद मिनट की गुफ्तगू में मुसलमानों के हालात पर वाजे रोशनी डाली। हिन्दुस्तान के चिरैयाकोट से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेसर अफरोज डलास यूनिवर्सिटी केपटाउन साउथ अफ्रीका में दस वर्षों से उच्च शिक्षा व शोध व अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। पेश हैं बातचीत के खास अंश

सवाल : दुनिया में मुसलमानों के हालात कैसे हैं ? मुसलमान परेशानियों में क्यों हैं ?
जवाब : दुनिया में मुसलमानों के हालात बहुत अच्छे नहीं और इतने बुरे भी नहीं जितना मीडिया वाले शोर करते हैं। मुसलमान जहां कहीं बहुत परेशान हैं तो ज्यादातर अपने बुरे आमाल की वजह से। और कई आजमाईश की जद पर हैं। इस तरह की आजमाईश हर दौर में अहले हक पर आती रही हैं। मुसलमानों को सब्र व नमाज के जरिए मुश्किलात का सामना करना चाहिए।

सवाल : मुसलमानों के इस हालात का जिम्मेदार कौन है ?

जवाब : उसके जिम्मेदार खुद मुसलमान हैं क्योंकि अल्लाह व रसूल के अहकामात से बगावत करके हम खुद अपनी मिट्टी पलीद कर रहे हैं। दूसरों पर इसका इल्जाम रखना पर्दा डालना हैं।

सवाल : मुसलमानों के हालात में सुधार कैसे संभव हैं ?

जवाब : मुसलमानों के हालात खुद मुसलमानों के हाथ में हैं। वह जब चाहें अपनी इस्लाह करके रब की बारगाह में रुजू लाकर हालात के तेवर बदल सकते हैं। क्योंकि कुरआनी वसूल यहीं हैं कि “खुदा ने आज तक उस कौम की हालत नहीं बदली, न हो जिस को ख्याल आप अपने हालात के बदलने का । “

सवाल :  आज अमेरिका जैसे मुल्क मुसलमानों पर पाबंदी लगा रहा हैं ? इस पर आपका क्या कहना हैं ?
जवाब : अमरीका या ब्रतानिया से हमें किस फायदें की उम्मीद हैं। दरअसल इस्लाम की तरक्की से दोनों मुल्क खौफजदां हैं और मुसलमानों को रोक कर दरअसल इस्लाम पर पाबंदी आयद (लगाना) करना चाहता हैं। मगर बुए गुल (फूल की खुश्बू) कब कैद में हो सकी हैं। यह किसी के रोकने से रुकने वाली नहीं। इस्लाम आलमगीर मजहब हैं यह यूरोपीय दुनिया पर एक न एक दिन पूरी तरह से फैल जायेगा। मुसलमानों पर पाबंदी इस्लाम की जीत की पहल हैं।

सवाल : क्या अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियां मुसलमानों के लिए घातक हैं ?
जवाब : इस सिलसिले में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। ट्रंप के शपथ ग्रहण में कुरआन की तिलावत से शुरुआत करवाना खुश आईंदा मुस्तकबिल का इशारा दे रहा हैं ।

सवाल : क्या तारेक फतह, तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी जैसे लोग इस्लाम के लिए नुकसानदायक हैं?
जवाब : इसमें से कोई भी इस्लाम और मुसलमान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता हैं। इन लोगों की बात झूठ व फरेब का पुलिंदा हैं। बस कोई वक्त आयेगा जब यह इबरत (उदाहरण) के निशान बना दिए जायेंगे। यह लोग अल्लाह के बागी हैं और अल्लाह उनके इंतकाम के लिए काफी हैं।

सवाल : हिन्दुस्तान में तीन तलाक पर पाबंदी लगानी की बात केंद्र सरकार कर रही हैं। क्या यह सही है ? तीन तलाक की शरई हैसियत पर मुख्तसर रोशनी डाले ?
जवाब : यह बात गलत हैं। अपनी नाकामी को छुपाने की एक एक खिसयाना चाल हैं। लोकतांत्रिक मुल्क के अंदर किसी मजहब में दखल लोकतंत्र का कत्ल करने के बराबर हैं। इस्लाम को चौदह सौ सालों में कभी भी अपना मजहबी कानून जारी रखने में दुश्वारियां पेश नहीं आयीं और उन मजहबी कानून के किसी भी हुक्म पर अमल पैरा होने में सुब्ह कयामत तक कोई दुश्वारी नहीं होगी।
तीन तलाक का तरीका सरासर रहमत हैं। यह मियां बीवी के दरम्यिान पैदा होने वाली जहमतों को खत्म करने का रब का कानून हैं।

सवाल : केंद्र सरकार तीन तलाक पर पाबंदी लगाती हैं तो मुसलमानों को क्या करना चाहिए ?
जवाब : मुसलमानों को इस सिलसिले में कानून का सहारा लेना चाहिए। लोकतांत्रिक मुल्क के अंदर हर मजहब वाले को अपने मजहब पर कायम रहने की जो छूट दी गयी हैं उससे फायदा लेना चाहिए।विरोध प्रदर्शन से मसले का हल नहीं हुआ करता। कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए और अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए। हम हक पर हैं और हक की ही जीत होती हैं। बातिल हक के सामने चंद सेकंड नही ठहरता।

 

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