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योगी आदित्यनाथ से बगावत कर कौड़ीराम से चुनाव लड़ चुके हैं भाजपा प्रत्याशी उपेन्द्र शुक्ल

22 वर्ष के राजनीतिक जीवन में तीन बार कौड़ीराम विधानसभा से चुनाव लड़े लेकिन जीत न सके
दो बार पार्टी ने टिकट भी काट दिया था, दूसरी बार टिकट कटने पर बगावत कर चुनाव लड़े थे

गोरखपुर , 19 फरवरी.  योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद खाली हुई गोरखपुर लोकसभा सीट पर होने जा रहे उप चुनाव में भाजपा प्रत्याशी बने उपेन्द्र दत्त शुक्ल भाजपा में दो दशक से अधिक समय से हैं। वह कौड़ीराम विधानसभा से तीन बार चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं पाए। दो बार तो पार्टी ने टिकट भी काट दिया गया। 2005 में जब उपचुनाव में टिकट कट गया और यहां से भाजपा ने योगी आदित्यनाथ के करीबी शीतल पांडेय को चुनाव लड़ा दिया जो वे विद्रोह कर बैठे और निर्दल प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ गए। इस चुनाव में दोनों हार गए।
उपेन्द्र दत्त शुक्ल का चुनावी कार्य क्षेत्र कौड़ीराम विधानसभा क्षेत्र रहा है। वह पहली बार वह वर्ष 1996 में यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उन्हें 29,079 वोट मिले लेकिन चुनाव हार गए। इसके बाद वर्ष 2002 में हुए चुनाव में उन्हें जीतने की उम्मीद थी लेकिन भाजपा ने यहां से गौरी देवी को टिकट दे दिया। यह चुनाव बसपा प्रत्याशी रामभुआल जीते। तीन वर्ष बाद रामभुआल का चुनाव अवैध घोषित हो गया और यहां उपचुनाव हुए। उपेन्द्र दत्त शुक्ल को फिर उम्मीद लगी कि पार्टी उन्हें टिकट देगी और विधायक बनने का सपना साकार होगा लेकिन योगी आदित्यनाथ ने यहां से अपने प्रिय शीतल पांडेय को टिकट दिला दिया।
इस बार टिकट कटने से उपेन्द्र नाराज हो गए और भाजपा व योगी आदित्यनाथ से बगावत करते हुए निर्दल चुनाव लड़ गए। उन्हें कुल्हाड़ी चुनाव चिन्ह मिला था। चुनाव में न भाजपा जीती न उपेन्द्र। उपेन्द्र चुनाव बाद फिर भाजपा में लौट आए।
वर्ष 2007 में भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया लेकिन वह 15845 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे। बसपा के अम्बिका सिंह चुनाव जीते जबकि सपा से चुनाव लड़े रामभुआल निषाद दूसरे स्थान पर रहे।
वर्ष 2012 में हुए परिसीमन में कौड़ीराम विधानसभा समाप्त हो गई और इसका बड़ा हिस्सा नए बने गोरखपुर ग्रामीण सीट में सम्मिलित हो गया। इससे उपेन्द्र के चुनाव लड़ने की संभावनाए खत्म हो गई। पिछले दस वर्ष से वह चुनावी राजनीति से दूर सगठन में काम कर रहे थे। इस वर्ष हुए चुनाव में उनकी इच्छा सहजनवा विधानसभा से लड़ने की थी, लेकिन वहां से योगी आदित्यनाथ के करीबी शीतल पांडेय को टिकट मिला और वे विधायक भी बन गए।
उपेन्द्र दत्त शुक्ल कभी योगी आदित्यनाथ के करीबियों में नहीं रहे। उन्हें राज्यसभा सांसद और वर्तमान में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला के निकट माना जाता है। शिव प्रताप शुक्ल भी योगी आदित्यनाथ की नाराजगी के शिकार रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने हिन्दू महासभा से डा. आरएमडी अग्रवाल को चुनाव लड़ा कर उन्हें हरा दिया था। इसके बाद से वह हाशिए पर चले गए थे।
कुछ वर्षो से उनकी भाजपा की मुख्य धारा की राजनीति में वापसी हुई है। पहले उन्हें राज्य सभा सदस्य बनाया गया और फिर केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री। फिलहाल शिव प्रताप शुक्ल और उपेन्द्र दत्त शुक्ल की सीधे तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कोई टकराहट नहीं है।
जानकारों का कहना है कि भाजपा हाईकमान गोरखपुर से किसी ब्राह्मण को ही चुनाव लड़ाना चाहता था। उपेन्द्र दत्त शुक्ल सहित कई नाम इसके लिए आगे आए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उपेन्द्र शुक्ल, योगी आदित्यनाथ की पहली पसंद नहीं थे। उनके मुकाबले वरिष्ठ अधिवक्ता हरि प्रकाश मिश्र, अशोक शुक्ल का नाम आगे किया गया लेकिन उपेन्द्र को संगठन में रहते हुए लम्बे अर्से से पार्टी की सेवा करने का पुरस्कार मिल गया।

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