साहित्य - संस्कृति

कविता के रूपवादी मिजाज में फिट नहीं बैठते त्रिलोचन और मुक्तिबोध – सूरज बहादुर थापा

लखनऊ, 18 अगस्त। राष्ट्रीय पुस्तक मेला, लखनऊ के मंच पर जन संस्कृति मंच की ओर से ‘स्मरण त्रिलोचन और मुक्तिबोध’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसके तहत परिचर्चा तथा दोनों कवियों की कविताओं का पाठ हुआ।
इस मौके पर मुक्तिबोध की कविताओं पर बालते हुए आलोचक व लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रध्यापक सूरज बहादुर थापा  ने कहा कि ये दोनों कवि हिन्दी कविता के रूपवादी मिजाज में फिट नही बैठते। ये कविता के पारम्परिक सौंदर्यबोध को नकारते हैं। प्रेमचंद ने जिस सौदर्यबोध की बात कही थी मुक्तिबोध इसी सौदर्यबोध के कवि हैं। जहां से कोई कवि शुरुआत नहीं करना चाहेगा, मुक्तिबोध वहां से शुरुआत करते हैं। प्रेम और श्रृंगार इनका प्रधान स्वर नहीं है बल्कि यहां संत्रास, भयावहता, जुगुप्सा, जीवन की बीहड़ता है। इनकी कविता का मुहावरा अलग है। इसलिए इन्हें समझने के लिए हमें इनके पास जाना पड़ेगा।
सुल्तानपुर से आए कवि डी एम मिश्र ने त्रिलोचन के जीवन से  जुडे कई रोचक संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा कि वे जनपद के कवि हैं। उनका गांव चिरानी पट्टी और जनपद उनकी कविताओं में अपनी पूरी संस्कृति के साथ आता है। डी एम मिश्र ने त्रिलोचन पर लिखी अपनी कविता सुनाई तथा उनकी दो कविताओं का भी पाठ किया। युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी ने त्रिलोचन की कविताओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि त्रिलोचन की कविताओं में जीवन है। वे जीवन के कवि हैं। वे उपदेश नहीं देते बल्कि जनजीवन में प्रवेश करते हैं और निराशा के क्षणों में आशा पैदा करते हैं। श्रमिको की बदहाल व अभावग्रस्त जिन्दगी को सहजता से सामने लाते हैं। अजीत प्रियदर्शी ने त्रिलोचन की कई कविताओं का उदाहरण देते हुए उनकी कविता के वैशिष्ट्य को उजागर किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि व पत्रकार सुभाष राय ने की। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध सच को सच की तरह देखते हैं और झूठ को झूठ की तरह। वे झूठ को ध्वस्त करते हैं। इनकी कविता में परकाया प्रवेश की कला दिखती है। वह बदलाव को घटित होते देखना चाहते हैं। कई कविताओं में अंधेरा दिखता है। वे इसकी शिनाख्त करते हैं। यह उजाले व रोशनी के लिए संघर्ष है। यह संघर्ष है बराबरी के लिए, समानता के लिए। इस मौके पर सुभाष राय ने मुक्तिबोध की दो कविताएं भी सुनाई। कवयित्री डा उषा राय ने मुक्तिबोध की मशहूर कविता ‘अंधेरे में’ के खण्ड चार का आजपूर्ण पाठ किया। संचालन किया युवा कवि व लेखक डा संदीप कुमार सिंह ने। उन्होंने रामजी राय का हवाला देते हुए कहा कि नागार्जुन नक्सल मिजाज के कवि हैं तो मुक्तिबोध नक्सलवाद के ‘अवांगर्द’ कवि है।
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कार्यक्रम की शुरुआत जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर द्वारा दिए बीज वक्तव्य से हुई। उन्होने कहा कि त्रिलोचन धरती के कवि है और इसी के रंग से सराबोर हैं उनकी कविताएं। त्रिलोचन ‘नगई महरा’ में कहते हैं कि समझ ही आदमी को आदमी से जोड़ती है। आज तो ऐसा दौर है जब जोड़ने की समझ की जगह तोड़ने की समझ पैदा की जा रही है। त्रिलोचन की समझ का विस्तार हम मुक्तिबोध की कविताओं में पाते हैं। विचारशीलता मुक्तिबोध की कविताओं का प्राणतत्व है। उनकी कविता में जो अंधेरा है, वह इस व्यवस्था का अंधेरा है। यहां अंधेरा मिथ नहीं यथार्थ है जो आज अपनी विकरालता के साथ उपस्थित है। इस अवसर पर शिवमूर्ति, भगवान स्वरूप कटियार, अशोक चन्द्र, बंधु कुशावर्ती, डा निर्मला सिंह, अलका पाण्डेय, विमल किशोर, राम किशोर, आशीष कुमार सिंह, मेहदी अब्बास रिजवी, अजय शर्मा, नीतीन राज, खुशबू सिंह, सुशील सिंह, विवेक, आलोक तिवारी, अलका तिवार आदि उपस्थित थे।

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