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कवि व श्रमिक नेता महेश प्रसाद श्रमिक नहीं रहे

कौशल किशोर
अध्यक्ष, जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश 

प्रतिष्ठित साहित्यकार, कवि, चिन्तक और श्रमिक नेता महेश प्रसाद श्रमिक नहीं रहे। उनका निधन 6 अगस्त रविवार को सुबह 10 बजे हो गया। वे लखनऊ के कांकराबाद (काकोरी) के रहने वाले थे। जीवन के अन्तिम समय वे वहीं रहे। उनका निधन वहीं हुआ। इधर काफी अरसे से वे अस्वस्थ चल रहे थे। इसकी वजह उनका लखनऊ शहर आना और लोगों से मिलना-जुलना कम हो गया था।

वे श्रमिक आंदोलन के रचनाकार थे। श्रमिक आंदोलन में बतौर मजदूर नेता उनकी ख्याति रही और इसी आंदोलन के दौरान, इसी से अनुप्राणित हो उन्होंने साहित्य सृजन किया। मजदूरों के ऐतिहासिक दिवस पहली मई 1935 को उनका जन्म हुआ। अपने विचार और कर्म के द्वारा उन्होंने इसे सार्थक किया। श्रमिक उपनाम इसी का प्रतीक है जो इस विशिष्टता को उजागर करता है।

श्रमिक जी विगत पाच दशक से अधिक समय से श्रमिक आंदोलनों और रचना कर्म से जुड़े थे। लखनऊ के जीपीआईएफ, जो बाद में यूपीआईएल के नाम से जाना जाता था, से अपने श्रमिक जीवन की शुरुआत की। कई आंदोलनों और श्रम संगठनों का नेतृत्व किया। एक्टू से उनकी यूनियन सम्बद्ध थी। वे भाकपा माले के भी सदस्य रहे तथा 1988 में जसम के पटना में हुए दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन में वे बतौर प्रतिनिधि शामिल हुए थे। शोषण, उत्पीड़न, अन्याय और दमन के विरुद्ध करोड़ों शोषितो और वंचितों को जागृत कर शोषण विहिन समाज की रचना के लिए संघर्ष उनकी जिन्दगी का उद्देश्य था। उनका रचना कर्म इसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित था। उन्होंने खड़ी बोली और अवधी लोकभाषा में कविताओं की रचना की, वैचारिक गद्य लिखे। ‘मजदूरों ने सीना ताना’, ‘सुन लो धरती पुत्र’, ‘ज्योतिबा फुले का जीवन संघर्ष’, ‘महारानी अहिल्याबाई होल्कर’, ‘अबकी बारी अहा तुम्हारी’, ‘भीम चरित गाथा’, ‘साम्यवादी चिन्तक अखिलेश मिश्र से डेली मुलाकता’ जैसी दर्जन भर कृतियां प्रकाशित हुईं। ये श्रमिक जी के संघर्ष, सृजन और विचारों का आईना हैं।

जीवन के अस्सी साल पूरा करने पर दिसम्बर 2015 में लखनऊ के प्रगतिशील व जनवादी सांस्कृतिक संगठनों ने उन्हें सम्मानित किया था। उनका सम्मान वास्तव में सामाजिक बदलाव और श्रमिक जनता की गौरवशाली परम्परा का सम्मान था। उनकी कविता के कुछ टुकड़े उनकी वैचारिकता व रचनाशीलता के उदाहरण हैं:

ऊँचा पद हथियायेंगे।
घी तर माल उड़ायेंगे।
खुद को खुदा बतायेंगे।
छान घोट कर फांकेमस्त।
बेचारे रहते हर वक्त।
कुछ भी हो आराम करेंगे।
कभी न कोई काम करेंगे।
देवलोक के मुर्गे…….
खुदा बनेंगे जुदा करेंगे।
ये काशी के मुर्गे।
ये काबा के मुर्गे।
…….
कलम के सिपाही, कलम को उठाओ।
नई जिन्दगी के, नये गीत गाओ।

अभी बस्तियों में, है दुर्भाव बसते।
अतीतों के तन पर, दिये घाव रिसते।
अभी तक अनाचार, के पल न बीते।
अभी निर्बलों का, सबल खून पीते।
उठो क्रान्तिकारी, बिगुल को बजाओ।

अभी तो है बाकी, बहुत रात साथी।
हुआ न अभी तक, नवल प्रात साथी।
अभी झुग्गियों में, तिमिर का बसेरा।
अभी जुल्म का है, नगर-गांव डेरा।
मशालें जलाओ, नई भोर लाओ।

कलम के सिपाही, कलम को उठाओ।
नई जिन्दगी के, नये गीत गाओ।

जन संस्कृति मंच महेश प्रसाद श्रमिक के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करता है तथा जन सांस्कृतिक योद्धा की स्मृति को सलाम पेश करता है।

श्रद्धांजलि सभा 12 को
महेश प्रसाद श्रमिक की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन लखनऊ में इप्टा, जसम, प्रलेस, जलेस व अन्य संगठनों की ओर से इप्टा कार्यालय, 22 कैसरबाग, लखनऊ में 12 अगस्त दिन शनिवार को शाम 5 बजे किया गया है।

 

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