विचार साहित्य - संस्कृति

कैबिनेट से क्यों, मुल्क से बाहर करवा दें : आज़म ख़ां

नूरा कुश्ती
व्यंग्य
डॉ. मुकेश कुमार

उत्तरप्रदेश के मंत्री आज़म ख़ाँ का खाना तब तक हज़म नहीं होता जब तक वे किसी से पंगा न ले लें। फिलहाल उनकी राज्यपाल राम नाइक से ठनी हुई है। दोनों बिला नागा एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन करते रहते हैं।  मैंने पहले सोचा था कि आज़म ख़ाँ का एनकाउंटर लखनऊ में ही कर लूँगा, लेकिन फिर लगा कि उनके इलाक़े में जाकर करने से अलग फील आएगा, लिहाज़ा पहुँच गए हम रामपुर।  उन्होंने अपने अंदाज़ में भौंहें ऊपर की ओर चढ़ाकर मुस्कराते हुए कहा, पूछिए क्या पूछना चाहते हैं? मैं शुरू हो गया।
आज़म साहब, राज्यपाल चाहते हैं कि आपको मंत्रिमंडल से निकाल दिया जाए, आप क्या कहेंगे?
नाइक साहब को खुशफ़हमी है कि दिल्ली मे उनकी सरकार है तो यूपी को भी वे अपने हिसाब से चलाएंगे। बताइए, कभी ऐसा हुआ है कि कोई गवर्नर मुख्यमंत्री से कहे कि फलाँ मंत्री मुझे ठीक नहीं लगता इसलिए उसे हटा दिया जाए? ये तो उनके अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है। ये मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है कि वह किसे रखे और किसे नहीं। और मुख्यमंत्री का मेरे ऊपर पूरा भरोसा है।
लेकिन उनकी बात भी तो सही है। आपने विधानसभा के अंदर उन पर ऐसी छींटाकशी की जिससे उनका आहत होना स्वाभाविक है?
मैंने ऐसा क्या कह दिया कि वे मुझे हटवाने पर आमादा हो गए। अरे मैंने कहा वे कारसेवक हैं, क्या ग़लत कहा? वे खंडन करें न कि मंदिर आंदोलन में वे शामिल नहीं थे, नहीं करेंगे। दूसरा मैने कहा कि वे राज्य का माहौल खराब कर रहे हैं। आप उनकी अब तक की गतिविधियों को देख लीजिए। वे निष्पक्ष ढंग से काम ही नहीं कर रहे हैं। पूरी तरह से बीजेपी और संघ परिवार के लिए समर्पित हैं। मैं तो खुलकर कह सकता हूँ कि राजभवन में राज्यपाल नहीं आरएसएस का नुमाइंदा बैठा है। तीसरी बात मैंने ये कही कि वे मोदी सरकार के इशारों पर ये सब कर रहे हैं तो ये भी कोई नई चीज़ नहीं है। सारे गवर्नर केंद्र के एजेंट होते हैं, केंद्र सरकार के इशारे पर काम करते हैं। अब देखिए अरूणाचल और उत्तराखंड के गवर्नरों ने क्या किया?
लेकिन ये कोई पहली बार तो है नहीं जब राज्यपाल से आपका पंगा हुआ हो? आप दोनों के बीच तकरार अरसे से चल रही है?
तकरार चल रही है तो दोनों तरफ से चल रही है न। वे ऐसे काम कर रहे हैं, ऐसे बयानात दे रहे हैं कि मुझे उनका जवाब देना पड़ता है और मैं दूँगा, क्योंकि एक जन प्रतिनिधि होने के नाते मेरी जि़म्मेदारी भी बनती है और हक़ भी बनता है।
लेकिन एक मर्यादा भी होती है न। नाइक साहब के हिसाब से आप उस मर्यादा को बार-बार तोड़ रहे हैं?
मर्यादा क्या केवल मेरे लिए है, उनके लिए नहीं है। गवर्नर को भी तो एक मर्यादा के भीतर काम करना होता है, मगर वे नहीं कर रहे हैं। लगातार हिंदुत्ववादी मुद्दों को उछालते रहते हैं, ताकि आगामी चुनाव के पहले उनकी पार्टी के पक्ष में माहौल बने। मैं ठहरा खरा आदमी, उन्हें दो टूक जवाब दे देता हूँ तो मिर्ची लग जाती है। और अगर उन्हें इतनी ही तकलीफ़ है तो मुझे कैबिनेट से क्यों मुल्क से निकलवा दें। आखऱि उनकी पार्टी बात-बात पर मुसलमानों को चले जाने के लिए कहती ही रहती है। उनका निज़ाम है, वे मुझे गद्दार घोषित करके भेज दें किसी और मुल्क में।
आप उनसे इस क़दर खफ़़ा क्यों है?
इसलिए कि वे राज्य सरकार के हर काम में अड़ंगा डाल रहे हैं। जो भी बिल उनके पास भेजो कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। हमें तो सदन में जवाब देना पड़ता है, जनता के बीच जाना पड़ता है। दरअसल, वे हमें नाकाम साबित करने पर तुले हुए हैं, मगर मैं उन्हें ऐसा करने नहीं दूँगा।
लोगों को लगता है कि आप मुस्लिम नेता की अपनी छवि को चमकाने के लिए बीजेपी, संघ और मोदी पर हमले करते रहते हैं?
अगर ऐसा करने से छवि चमकती है तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। लेकिन मैं तो सांप्रदायिक ताक़तों के खिलाफ़ हमेशा से बोलता रहा हूँ और आगे भी बोलता रहूँगा। लेकिन मैं एक बात कहूँगा कि जितना मैं हमला करता हूँ उससे कहीं ज़्यादा संघ परिवार मुझ पर हमला करता है और इससे मेरा नहीं उसका प्रचार ज़्यादा होता है। वे मुस्लिम विरोध की राजनीति को हवा देने के लिए मुझे पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल करते हैं। राज्य में और कोई मुसलमान नेता मेरे जितना मुखर तो है नहीं इसलिए वे मुझे टॉरगेट बनाते हैं। मीडिया इसका उलटा अर्थ निकालता है। वह उनकी ओर नहीं देखता और सोचता है कि मैं झगड़ा कर रहा हूँ।
लेकिन इतना तो आप मानेंगे ही कि आप बहुत मर्तबा अतिरंजित व्यवहार करते हैं। खुद को मुसलमानों का रहनुमा साबित करने के लिए विवादास्पद बयान दे देते हैं?
देखिए मैं सियासत में हूँ। हाँ मुसलमानों की रहनुमाई भी करता हूँ और आज से नहीं बरसों से कर रहा हूँ। उनको मेरी ज़रूरत भी है क्योंकि सब उनको बरगलाकर अपने उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं। लेकिन आपको ये भी स्वीकार करना चाहिए कि मीडिया भी मेरे पीछे पड़ा रहता है और अनाप-शनाप सवाल करता है जिससे कभी-कभी मैं भी खीझ़कर जवाब दे देता हूँ।
ये तो कोई वजह नहीं हुई। आप इतने वरिष्ठ नेता है, मंत्री हैं, आपकी जि़म्मेदारी बनती है। आपकी वजह से सरकार की भी फज़़ीहत होती है?
मैं इसे आपकी तरह नहीं देखता। आप मीडिया वाले एक परफेक्ट नेता की माँग करते हैं, लेकिन तलाश में रहते हैं ऐसे नेता की जो आपको कोई सनसनीखेज़ ख़बर दे। मीडिया को अपनी जि़म्मेदारियों का एहसास तो है नहीं, मगर सबकी जवाबदेही तय करता फिरता है। दूसरी बात ये कि मेरे बयानों से सरकार की कोई फज़़ीहत नहीं होती बल्कि उसे मज़बूती मिलती है। हमारे मतदाताओं को एहसास होता है कि कोई तो है जो अल्पसंख्यकों के मुद्दों को ताक़त के साथ उठाता है, किसी की परवाह नहीं करता, पीएम और गवर्नर की भी नहीं।
आप स्वीकार नहीं करते लेकिन आपको पता होना चाहिए कि आपका कितना मज़ाक बनता है। भैंसो के गुमने वाली घटना पर लोग आज भी मज़े लेते हैं?
वो भी आप लोगों की मेहरबानी थी। आप लोगों ने तो मेरी भैंसों को क्वीन विक्टोरिया की तरह मशहूर कर दिया। आप लोगों ने ही मुझे ग़ैर जिम्मेदार के साथ-साथ फंडामेंटलिस्ट भी घोषित कर दिया है। वे लोग जो उठते-बैठते हेट स्पीच देते हैं, नफरत की जुबान बोलते हैं, उनसे मेरा नाम जोड़ देते हैं। मेरा नाम दंगों से जोड़ देते हैं। झूठी रिक़ार्डिंग चलाकर मेरी इमेज खराब करते हैं। जाँच ने एक्सपोज़ कर दिया है कई बड़े चैनलों को। इसलिए मुझे मत समझाइए कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
आप इतने अडिय़ल हैं कि हर किसी की सुनते ही नहीं। लोग तो कहते हैं कि अगर मुलायम से आपकी पुरानी दोस्ती न होती तो पार्टी आपको बर्दाश्त न करती?
लोग क्या कहते हैं, मुझे पता नहीं। मगर हाँ, मुलायम सिंह से मेरा पुराना याराना है और वे इसे निभा रहे हैं ये उनका बड़प्पन है। लेकिन पार्टी को मेरी वजह से कोई नुकसान होता है ऐसा मैं नहीं मानता। इसके उलट वह मेरी वजह से अल्पसंख्यकों में लोकप्रिय है, वे समाजवादी पार्टी पर भरोसा करते हैं। और ये तो आप समझते ही है कि यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की क्या अहमियत है। चुनाव आ रहे हैं उनमें आपको इस बात का फिर पता चल जाएगा।

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