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गांधी जी का इसी टी स्टाल पर हुआ था स्वागत, तभी से नाम हो गया गांधी मुस्लिम होटल

गोरखपुर के वीर अब्दुल हमीद रोड पर है गांधी मुस्लिम होटल

8 फरवरी 1921 को  बहरामपुर जाते वक्त चंद पल यहाँ ठहरे थे गांधी जी

सैयद फरहन अहमद  
गोरखपुर, 2 अक्तूबर। महात्मा गांधी के नाम पर रोड, स्मारक, पार्क, स्टेडियम आदि सुना व देखा होगा लेकिन गांधी जी के नाम पर मुस्लिम होटल, ना देखा ना सुना होगा। जी हाँ ! गोरखपुर शहर के वीर अब्दुल हमीद रोड बक्शीपुर के मीनारा मस्जिद के पास गांधी मुस्लिम होटल है। पहले इसका नाम गांधी होटल था।  तेरह वर्ष पूर्व इसका नाम गांधी मुस्लिम होटल हो गया ।

क्या आप इस होटल के बारे मेँ जानते हैं ?

यह कोई मामूली होटल नहीं हैं । यहां जंगे आजादी के दीवानों का जमघट था। इस होटल की बुनियाद टी स्टाल के रुप में पड़ी थी। बाद में इसे होटल का रुप दे दिया गया।

होटल के मालिक अहमद रजा खान कहते हैं कि उनके दादा गुलाम कादिर बताते थे कि यह होटल जंगे आजादी की याद समेटे हुए हैं। 8 फरवरी 1921 को महात्मा गांधी गोरखपुर आए थे। उसी दिन उन्होंन बाले मियां के मैदान मेँ एक बड़ी सभा को संबोधित किया था। वह दौर खिलाफत आंदोलन का था। हिंदू -मुसलमान सब साथ थे। जब गांधी जी बहरामपुर स्थित बाले मैदान जा रहे थे कुछ देर के लिए कांग्रेसियों ने यहां उनका स्वागत किया तब से यह टी स्टाल गांधी जी के नाम से मशहूर हो गया।
यहां आजादी से पहले और बाद बड़ी-बड़ी हस्तियों का जमघट लगता था और चाय की चुस्कियों के साथ गहन चिंतन, वाद- विवाद, सियासत, देश के हालात पर विमर्श हुआ करता था।।
अहमद रजा ने बताया कि वीर अब्दुल हमीद के भाई अकसर यहां आकर बैठते थे। नाम तो याद नहीं हैं। वह रिक्शा चलाते थे।बाद में उन्होंने नार्मल पर जमीन ले ली और गैराज खोला। फिर कहाँ चले गए पता नहीं। मेघालय के पूर्व राज्यपाल मधुकर दीघे यहां आ कर घंटों बैठा करते थे। इसके अलावा चौरी चौरा आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले कामरेड जामिन भी बैठते थे। बहुत सारे लोग बैठा करते थे।सबके नाम याद नहीं हैं, दादा बताया करते थे।
अहमद रजा ने बताया कि दादा बताते थे कि जिस समय यह होटल खुला यह इलाका जंगल था।जगह-जगह रोशनी के लिए लैम्प पोस्ट बना था।अंग्रेज कर्मचारी उसे रोशन किया करता था। जब लोग रात के 12-1 बजे फिल्म देखकर लौटते तो यहां चाय जरुर पिया करते थे। चायपत्ती अंग्रेज कर्मचारी मुहैया करवाता था। वह एक ठेला लेकर चलता था। उसमें लिप्टन चायपत्ती होती थी।
दादा यह भी बताते थें कि जंगली जानवरों की आवाजें गुंजा करती थी। जब मेरे वालिद मरहूम उमर बड़े हो गए तो टी स्टाल को होटल में बदल दिया गया। वालिद आर्मी मैन थे। उन्होने पाकिस्तान से लड़ाई में हिस्सा लिया था। इसलिए उनका मन होटल में नहीं रमा। कुछ समय बाद नौकरी भी छोड़ दी। दादा ही होटल चलाते रहे। वर्ष  1988 में दादा का इंतकाल हुआ तो दादी सैयदुननिशा होटल चलाती थी। उनका इंतिकाल 2002 में हो गया तो कुछ समय के लिए मेरे चचा हाकी के मशहूर खिलाड़ी  गुलाम सरवर ने होटल चलाया।उसके बाद मैंने होटल संभाल लिया।

पहले इसका नाम गांधी होटल था तो सभी समुदाय के लोग चले आते थे। यहां बड़े का गोश्त भी मिलता है। इसलिए हिंदू भाईयों की सहूलियत के लिए नाम में परिवर्तन कर गांधी मुस्लिम होटल कर दिया। अब यहां शाकाहारी व मांसाहारी दोनों तरह के व्यंजन मिलते है।⁠⁠⁠⁠

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