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चीनी वैक्सीन जापानी इंसेफेलाइटिस से बचा रहा लाखों बच्चों की जान

बी आर डी मेडिकल कालेज में भर्ती जापानी इन्सेफेलाइटिस मरीज (फाइल फोटो)

-एक दशक में करोड़ों बच्चों को लगाया गया है चीन निर्मित जापानी इंसेफेलाइटिस का वैक्सीन
-वर्ष 2013 से हर वर्ष 11 करोड़ बच्चों को दी जा रही जेई वैक्सीन
-भारत ने भी बनाया देसी वैक्सीन लेकिन आत्मनिर्भर होने पर लगेगा समय

मनोज कुमार सिंह 

गोरखपुर, 25 अक्टूबर। देशभक्ति के नाम पर चीन निर्मित वस्तुओं के बहिष्कार का अभियान चला रहे लोगों को शायद यह नहीं पता है कि पिछले एक दशक से चीन में बना टीका ही देश के लाखों बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी से बचा रहा है। वर्ष 2006 और 2010 में इंसेफेलाइटिस प्रभावित जिलों में करोड़ों बच्चों को यही टीका लगाया गया और इसके अच्छे प्रभाव को देखते हुए पिछले तीन वर्ष से 150 जिलों में दो वर्ष तक के 10 करोड़ से अधिक बच्चों को यह टीका दो बार लगाया जा रहा है।
वर्ष 2005 में डेढ़ हजार से अधिक बच्चों के जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिन्ड्रोम (एईएस) से मौत से मचे हंगामे के बाद यूपीए-1 सरकार ने बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका लगाने का निर्णय लिया। टीके चीन से मंगाए गए। वर्ष 2006 में चार राज्यों 11 जिलों में 16.83 मिलियन बच्चों को और 2007 में नौ राज्यों के 27 जिलों में 18.20 मिलियन बच्चों को टीका लगाया गया। वर्ष 2008 में 22 और 2009 में 30 जिलों में एक से 15 वर्ष के बच्चों को सिंगल डोज टीका लगाया गया।

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जापानी इंसेफेलाइटिस क्यूलेक्स विश्नोई प्रजाति के मच्छर के काटने से होता है जो कि जेई विषाणु से संक्रमित होता है। इस वर्ष देश में जेई के 974 केस रिपोर्ट हुए हैं जिसमें 167 की मौत हो गई।
वर्ष 2013 से नियमित टीकाकरण में शामिल हुआ जेई वैक्सीन
2006 और 2009 तक जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका लगने का बहुत अच्छा परिणाम मिला और इसके केस काफी कम होते गए। अब इंसेफेलाइटिस के कुल मामलों में जापानी इंसेफेलाइटिस के केस 6 से 7 फीसदी ही रह गए हैं।
इसके बाद वर्ष 2011 में 181 जिलों में 16 से 18 महीने के बच्चों को नियमित टीकाकरण के तहत चीन निर्मित यह टीका सिंगल डोज दिया गया।
इस वैक्सीन से जापानी इंसेफेलाइटिस की रोकथाम में अच्छे नतीजे मिलने के बाद केन्द्र सरकार ने वर्ष 2013 में इंसेफेलाइटिस प्रभावित जिले में प्रत्येक बच्चे को यह टीका लगाने का निर्णय लिया और जापानी इंसेफेलाइटिस के टीके को नियमित टीकाकरण में शामिल कर लिया। अब शून्य से दो वर्ष के बच्चों को दो बार यह टीका लगता है। पहली बार नौ से 12 माह के बीच और दूसरा 18 से 24 माह के बीच। स्वास्थ्य कार्यकर्ता गांवों में जाकर बच्चों को यह टीके लगाते हैं। उत्तर प्रदेश के इंसेफेलाइटिस प्रभावित 36 जिलों में यह टीका बच्चों को लगाया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश में एक करोड़ से भी अधिक बच्चों को चीनी आयातित टीका लगाकर उन्हें जापानी इंसेफेलाइटिस से प्रतिरक्षित किया जा रहा है। पूरे देश में करीब 11 करोड़ बच्चों को इस वैक्सीन से प्रतिरक्षित किया जा रहा है।

सिर्फ 20 रूपया है चीन निर्मित जेई वैक्सीन के एक डोज की कीमत
चीन का यह वैक्सीन टिश्यू कल्चर पर बना है। इसे लाइव एटीनेयूटेड एसए 14-14-2 कहते हैं जिसे चीन की चेगदू इंस्टीट्यूट आफ बायोलाजिकल प्रोडक्ट्स कम्पनी बनाती है। चीन निर्मित यह वैक्सीन बेहद सस्ता है और इसकी एक डोज की कीमत 20-22 रूपए ही है। चीन ने यह वैक्सीन वर्ष 1988 में विकसित किया था। चीन न सिर्फ अपने देश के बच्चों को यह वैक्सीन देता है बल्कि भारत, नेपाल, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, श्रीलंका, कम्बोडिया, थाईलैण्ड आदि देशों को भी देता है। इस वैक्सीन पर हुए अध्ययन के मुताबिक सिंगल डोज पर इसकी सफलता दर 90 फीसदी तक और डबल डोज पर 98 प्रतिशत पायी गई है।

इतना सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर की नहीं तो सैकड़ों बच्चों की जान बचायी जा सकती थी।

गोरखपुर जिले में हर वर्ष चार लाख बच्चों को लगती है वैक्सीन
गोरखपुर जिले में दो वर्ष तक के बच्चों को जापानी इंसेफेलाइटिस का टीका लगाने के लिए चार लाख डोज की जरूरत होती है। नौ से 12 माह की आयु के बच्चों की संख्या जिले में 1.82 लाख है। इतनी ही संख्या 18 से 24 माह के बच्चों की है। इस तरह करीब चार लाख चीन निर्मित जे ई वैक्सीन जिले केा प्राप्त होते हैं। वैक्सीन का एक वायल से पांच डोज दिए जा सकते हैं। प्रत्येक डोज 0.5 मिली का होता है। इसे लगाने के लिए विशेष सिरिंज आती है जो एक बार बच्चे को देने के बाद आटोमेटिक लाक हो जाती है।
भारत में 2013 में बना जेई का देसी वैक्सीन
वर्ष 2013 में भारत में जेई का देशी वैक्सीन बना। यह वैक्सीन हैदराबाद स्थित निजी क्षेत्र की संस्था भारत बायोटेक इंटरनेशनल ने इंडियन कौंसिल आफ मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलाजी की मदद से तैयार किया। यह वैक्सीन कर्नाटक के कोलार जिले में वर्ष 1981 में जापानी इंसेफेलाइटिस के एक मरीज से प्राप्त जेई विषाणु के स्ट्रेन से तैयार किया गया है। इस वैक्सीन को अक्टूबर 2013 में लांच करने की घोषणा की गई लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है। यही कारण है कि नियमित टीकाकरण में अभी चीन निर्मित वैक्सीन का ही उपयोग हो रहा है। यह वैक्सीन चीन निर्मित वैक्सीन से महंगा है। चीन निर्मित वैक्सीन के एक डोज की कीमत 20 रूपए है जबकि जेईएनवीएसी के एक डोज की कीमत बाजार में 150 रूपए है।
भारत में पहले सेंटर रिसर्च इंस्टीट्यूट कसौली जेई के लिए माउस ब्रेन वैक्सीन बनाता था जो तीन डोज लगाया जाता था लेकिन इसका बड़ी संख्या में उत्पादन संभव नहीं था। भारत में बने वेरो सेल डिराईव्ड प्यूरीफाइड इनएक्टिवेटेड जेई वैक्सीन -जेईएनवीएसी से यह संभावना बनी है कि आने वाले दिनों में देश जेई वैक्सीन के मामले में आत्मनिर्भर हो सकता है।

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