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‘ तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ, तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ ‘

जन संस्कृति मंच के 15वें राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन (29 जुलाई) को खुले सत्र में ‘हिरावल’ ने मुक्तिबोध की कविता ‘पूँजीवादी समाज के प्रति’ (रचनाकाल -1940-42) के अंश की प्रस्तुति की. आप भी सुनिए और देखिये –

तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे हास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र
मेरी ज्वाल जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता से धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ ।

 

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