साहित्य - संस्कृति

देश का संविधान भारतीय दर्शन संस्कृति और साहित्य का सार है

भारतीयसंविधान हर नागरिक को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में बिना भेदभाव के समान अवसर प्रदान करता है। डॉ. भीम राव अंबेडकर ने देश के संविधान के रूप में एक ऐसा ग्रंथ दिया है, जिसमें हमारे विकास की समस्त संभावनाएं मौजूद हैं। यह बातें राज्यपाल रामनाथ कोविंद मंगलवार को एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में चल रहे सेमिनार के समापन समारोह में कहीं। सेमिनार दलित आख्यान और भारतीय दर्शन विषय पर आईसीपीआर के सहयोग से चिति और पटना विश्वविद्यालय के पीएम एंड आईआर विभाग के द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा कि संविधान में कमजोर और अभिवंचित वर्गों को दो सामाजिक संरक्षण प्रदान किया गया, उसका मकसद समान अवसर प्रदान करना है। भारतीय संविधान भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति और भारतीय साहित्य का सार रूप है।यह देश की संस्कृति का सच्चा संवाहक है और देशवासियों का पथ प्रदर्शक भी। भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान, दोनों हमें सामाजिक असमानता,अस्पृश्यता और किसी भी नकारात्मकता को प्रोत्साहित करने की अनुमति नहीं देता है।

कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कहा कि हमारा संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है, लेकिन आखिर क्या वजह है कि एक पढ़ा-लिखा दलित अपनी पहचान छुपाना चाहता है। इसका जवाब समाज के अन्य वर्ग को ढूंढना चाहिए। समाज को दलितों के प्रति सोच को बदलना होगा। उन्होंने आरक्षण खत्म करने वाली चर्चा पर बोलते हुए कहा कि केंद्र सरकार आरक्षण के खिलाफ नहीं है। यह जारी रहेगा। इस अवसर पर चिन्मया मिशन के आचार्य स्वामी मित्रानंद, जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार, रामाशीष सिंह, शरद प्रवाल आदि ने भी विचार रखें। संचालन पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो. संजय पासवान और धन्यवाद ज्ञापन केके ओझा ने किया।

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