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‘ देश तो आज़ाद है लेकिन वनटांगिया आज़ाद नहीं ’

मनोज कुमार सिंह / सैयद फरहान अहमद 
वन ग्राम बीट (महराजगंज), 27 फरवरी। गोरखपुर और महराजगंज जिले के 40 हजार लोग जिनमें 21 हजार मतदाता हैं, आजादी के 70 वर्ष बाद अपने को आजाद नहीं मानते।
क्योंकि उनके गांवों में केन्द्र व प्रदेश सरकार की कोई योजना लागू नहीं होती। चुनाव के वक्त ही नेता वोट मांगने आते हैं। उसके बाद कोई नहीं आता। न तो सरकारी मुलाजिम, न नेता।
इन लोगों को वनटांगिया कहा जाता है। गोरखपुर और महराजगंज के जंगलों में बसे 23 वन ग्रामों में यह लोग रहते हैं। इनमें से आधा दर्जन से अधिक गांव घने जंगलों में हैं।
अंग्रेजी सरकार इन्हें 97 वर्ष पहले 1920 में जंगलों में साखू, सागवान, शीशम के पेड़ लगाने के लिए ले गई। खेती और रेल पटरियों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाने से गोरखपुर और आस-पास के जंगल खत्म होने लगे थे। तब अंग्रेजों ने म्यांमार (वर्मा ) की पहाडि़यों पर टोंगिया विधि से खेती और इमारती लकड़ी के लिए सबसे बढि़या माने जाने वाले साखू (शाल) के पेड़ों का जंगल तैयार करने का निर्णय लिया।
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अंग्रेजों ने जब मुनादी कराई तो जमींदारों के शोषण से त्र्रस्त दलित और अतिपिछ़डी जाति के लोग परिवार सहित साखू, सागवान के पौधे रोपने के लिए चले आए।
ये लोग साखू व सागवान के पौधे एक लाइन में रोपते, उसकी देख-देख करते। पौधे के बड़े होने पर इन्हें दूसरे स्थान पर भेज दिया जाता।
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वनटांगियों को अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए बहुत जतन करना पड़ता है

इन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती। गेहूं-धान व सब्जियां उगाने के लिए जमीन एलाट की जाती और वनटांगियां खेती कर अपने लिए भोजन का इंतजाम करते। अंग्रेज अफसर इनसे दिन-रात काम लेते, बेगारी कराते और उन पर खूब जुल्म भी करते।
वनटांगियों की तीन पीढि़यों ने 55 हजार हेक्टेयर में साखू, सागवान व शीशम का जंगल तैयार कर दिया। यह जंगल आज सोहगीबरवां सेंचुरी और गोरखपुर वन प्रमंडल में बंटा है।
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वन ग्राम बीट

देश के आजाद होने के बाद भी उनसे इसी तरह काम लिया जाता रहा। 1980 के बाद वन निगम बनने के बाद इनसे काम लेना बंद कर दिया गया और इन्हें जंगलों से हटाने की कोशिश हुई।
तब वनटांगिया संगठित हुए और उन्होंने अपने अधिकारों के लिए लड़ना शुरू किया। जुलाई 1985 तिलकोनिया गांव में वन विभाग के अधिकारी जब उन्हें उजाड़ने पहुंचे तो वनटांगियों ने विरोध किया। वनकर्मियों ने उन पर गोली चला दी। पांचू और परदेशी मारे गए।
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वन विभाग के उत्पीड़न से बचाने की गुहार करने डीएम कार्यालय पहुंचे वनटांगियां

वनटांगिया हाईकोर्ट गए जहां से उन्हें 3 अप्रैल 1999 स्टे मिल गया। वन विभाग उन्हें हटा तो नहीं सका लेकिन उन्हें अवैध अतिक्रमणकारी मानते हुए उनका उत्पीड़न करता रहा।
2006 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन अधिकारों की मान्यता कानून बना तो 23 गांवों में रहने वाले 4300 परिवारों को 2011 में उनके रिहाइश और खेती की जमीन का मालिकाना हक दे दिया गया लेकिन बतौर नागरिक दूसरे अधिकार उन्हें आज तक नहीं मिले।
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इनके गांव सरकारी रिकार्ड में रेवन्यू गांव नहीं हैं। इसलिए यहां सरकार की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, खाद्यान्न, बिजली, पानी की कोई सुविधा नहीं है।
वन ग्राम बीट दोनों जिलों के 23 वन ग्रामों में से एक गाँव है। यह महराजगंज जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर है। यहां जाने के लिए 14 किलोमीटर जंगल से गुजरना पड़ता है। यहां वनटांगियों के 250 घर हैं। इस गाँव में न स्कूल है , न राशन शाप न बिजली।

23 वन ग्रामों में सिर्फ तिलकोनिया में खुले आसमान मोबाइल स्कूल चलता है। इसके अलावा किसी गांव में स्कूल नहीं है। सभी वन ग्रामों के बच्चों को पढ़ने के लिए तीन से 6 किलोमीटर दूर जंगल के बाहर निजी या सरकारी स्कूलों में जाना पड़ता है। इस कारण छोटे बच्चे स्कूल नहीं जाते।

सोनू पाँच में पढ़ता है। उसे और आँय बच्चों को 3 किलोमीटर दूर सकूल तक पैदल जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में कच्चे रास्ते से स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है, तब 3-4 महीने बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। सोनू चाहता है कि गाँव में जल्द स्कूल बने।
गाँव में राशन की दुकान नहीं हैं। राशन की दुकान तक जाने के लिए भी बीट वन ग्राम के लोगों को 14 किलोमीटर दूर पकड़ी जाना पड़ता है।
वन कर्मचारी वनटांगियों को पक्का निर्माण से रोकते हैं और उन पर जुर्माना लगाते हैं। सूखी लकडि़यां, खर और तालाबों से मछलियां लेने से रोका जाता है और उन पर कार्रवाई की जाती है।
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वन गावों में जाने के लिए वन विभाग से वाहन की परमिट लेनी पड़ती है

 यहां के निवासी अपने छप्पर के घर की दीवार को पक्का कर सीमेंट की शीट डालना चाहते थे। उन्होंने काम शुरू किया तो वन कर्मी उन्हें पकड़ ले गए और 24 घंटे तक पकड़ी रेंज में भूखे-प्यासे लाकप में बंद रखा। उन्हें पीटा भी गया।
गांव के लोग जब पहुंचे तो उन्हें छोड़ा गया लेकिन उन पर केस दर्ज कर दिया गया है।
गुलइची के देवर की शादी थी। बारात के वाहनों के लिए 500 रूपया देकर परमिट बनवाना पड़ा तब उन्हें गांव से बाहर जाने की अनुमति मिली।
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रूपा गर्भवती थी। डिलीवरी का समय आया तो उन्होंने एम्बुलेंस सेवा को फोन किया। एम्बुलेंस आया लेकिन वन विभाग ने उसे रोक लिया। गांव के लोगों ने रेंज आफिस जाकर बताया कि उन्होंने ही एम्बुलेंस को बुलाया है तब जाकर रूपा तक एम्बुलेंस पहुंची और वह अस्पताल गई। इस दौरान 2 घंटा विलम्ब हुआ। इससे रूपा की जान खतरे में पड़ गई थी।
गांव में बिजली नहीं है। अधिकतर लोगों ने सोलर पैनल लगा लिया है। इसका ज्यादा उपयोग मोबाइल चार्ज करने में होता है।
विधानसभा चुनाव में वोट देने के लिए उन्हें 8 किलोमीटर दूर बूथ पर जाना पड़ेगा।
वर्ष 2006 में वन अधिकार कानून बन जाने के बाद वन ग्रामों और वह रहने वाले लोगों को वह सब अधिकार मिलने चाहिएन जो देश के किसी और गाँव में रहने वाले लोगों को मिलता है लेकिन सरकार और अफसर इस कानून को लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। इस कानून के मुताबिक वनग्रामों में स्कूल, अस्पताल, राशन शाप, सामुदायिक केंद्र , आँगनबाड़ी  सब बनाए जा सकते हैं। साथ ही वन ग्राम निवासियों को लघु वन उपज पर पूरा अधिकार होना चाहिए लेकिन कानून बनने के एक दशक बाद भी कुछ भी होता नहीं दिख रहा है।
वनटांगियों को लोकसभा और विधानसभा में वोट देने का अधिकार नब्बे के दशक में मिला। वर्ष 2015 में आजादी के बाद पहली बार पंचायत चुनाव में वोट देने का अधिकार मिला। सभी वनटांगियां गांव 6 विधानसभा क्षेत्रों-गोरखपुर ग्रामीण, फरेंदा, पनियरा, नौतनवा, सिसवा और महाराजगंज में आते हैं।
राजनीतिक दलों ने वनटांगियों को वोट देने का अधिकार तो दिलाया लेकिन उन्हें देश के नागरिक के बतौर मिलने वाले अधिकार आज तक नहीं दिला सके। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में वनटांगियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर दिया था। तब प्रत्याशी और अफसरों ने उन्हें मनाया और कहा कि उन्हें सभी अधिकार दिलाए जाएंगे लेकिन पांच वर्ष में कुछ नहीं हुआ। वनटांगियों के पास नेता फिर वोट मांगने आ रहे हैं लेकिन वह जानते हैं कि उन्होंने जो कुछ हासिल किया है संघर्ष और आंदोलन के बूते हासिल किया है।

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