जीएनल स्पेशल

‘ द बेस्ट आफ माई नालेज ……..द लेक्चरर लिस्टेड अंडर जनरल कैटेगरी आर सीनियर देन एससी ओबीसी कैटेगरी ’

दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति की टिप्पणी विवादों के घेरे में, जातीय पूर्वाग्रह का आरोप

गोरखपुर, 29 अक्टूबर। दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो अशोक कुमार द्वारा इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद के लिए नियुक्ति का फैसला लेते हुए वरिष्ठता क्रम के निर्धारण के सम्बन्ध में की गई एक टिप्पणी पर जबर्दस्त विवाद खड़ा हो गया है। उन पर जातीय पूर्वाग्रह रखने का भी आरोप लगाया जा रहा है।
प्रो कुमार ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि ‘ उनकी जानकारी के अनुसार यह स्थापित तथ्य है कि एक ही तारीख में एक ही सलेक्शन कमेटी द्वारा सामान्य, अन्य पिछड़ा वर्ग और एससी वर्ग में प्रवक्ता पद पर नियुक्ति की जाती है और वे एक ही तारीख में ज्वाइन करते हैं तो उनमें से सामान्य वर्ग का प्रवक्ता एससी और ओबीसी वर्ग के प्रवक्ता से वरिष्ठ माना जाएगा। ’

इतिहास विभसाग में प्रो हिमांशु चतुर्वेदी के अध्यक्ष पर का कार्यकाल 3 अक्टूबर को पूरा हो रहा था। उनके स्थान पर नए अध्यक्ष की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करते हुए विश्वविद्यालय सामान्य प्रशासन ने कुलपति को प्रो चतुर्वेदी के बाद सबसे वरिष्ठ प्रो मुकुन्द शरण त्रिपाठी के नाम की संस्तुति की। इसी बीच इतिहास विभाग की प्रो निधि चतुर्वेदी ने ‘ इन आर्डर आफ मेरिट ‘ के आधार पर सीनियर होने का दावा पेश करते हुए अध्यक्ष पद पर नियुक्ति की मांग की।
प्रो निधि चतुर्वेदी निवर्तमान अध्यक्ष प्रो हिमांशु चतुर्वेदी की पत्नी हैं।
मुकुन्द शरण त्रिपाठी, चन्द्रभूषण गुप्त और निधि चतुर्वेदी की प्रवक्ता पद पर नियुक्ति
11 अक्टूबर 1998 को हुई थी और तीनों ने उसी दिन ज्वाइन किया था। प्रो निधि चतुर्वेदी और प्रो मुकुन्द शरण त्रिपाठी की नियुक्ति सामान्य वर्ग में और प्रो चन्द्रभूषण गुप्त की नियुक्ति ओबीसी वर्ग में हुई थी। वर्ष 1998 से ही विभाग की वरिष्ठता सूची में क्रमशः प्रो मुकुन्द शरण, प्रो चन्द्रभूषण गुप्त और प्रो निधि चतुर्वेदी का नाम चला आ रहा था और यह वरिष्ठता सूची जन्म तिथि के अनुसार निर्धारित की गई थी। इस दौरान कई बार वरिष्ठता सूची निर्धारित हुई लेकिन यही क्रम बना रहा और इस पर किसी ने आपत्ति भी नहीं की।
प्रो निधि चतुर्वेदी द्वारा वरिष्ठता का दावा पेश किए जाने पर प्रो चन्द्रभूषण ने कुलपति को प्रत्यावेदन देकर कहा कि यदि ‘ इन आर्डर आफ मेरिट ’ के आधार पर वरिष्ठता निर्धारित की जाती है तो उनकी वरिष्ठता कैसे निर्धारित होगी क्योंकि वह ओबीसी वर्ग में चुने गए थे और वह सामान्य वर्ग के लिए बनाए गए पैनल का हिस्सा नहीं थे।
सभी दावों व प्रत्यावेदनों पर विचार करते हुए कुलपति ने प्रो निधि चतुर्वेदी को प्रो मुकुन्द शरण व प्रो चन्द्रभूषण गुप्त से वरिष्ठ माना। उन्होंने यह निर्णय ’ इन आर्डर आफ मेरिट ’ पर लिया। उन्होंने यह निर्णय लेते हुए सम्बन्धित फाइल पर जो नोट लिखा उसमें उपर्युक्त टिप्पणी भी की जो अब विवाद का कारण बन गई है।
प्रो मुकुन्द शरण त्रिपाठी और प्रो चन्द्रभूषण गुप्त ने कुलपति के इस निर्णय पर आपत्ति की है और आरटीआई आवेदन कर जानकारी मांगी है कि वरिष्ठता के निर्धारण का विधिक आधार क्या है ?
इस सम्बन्ध में जब कुलपति प्रो अशोक कुमार से गोरखपुर न्यूज लाइन ने सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय परिनियमावली मे इन आर्डर आफ मेरिट का उल्लेख है। जिस मुद्दे पर नियमावली साइलेंट है वहां केन्द्र व प्रदेश सरकार द्वारा दी गई व्यवस्था व अदालतों द्वारा दिए गए निर्णय के आलोक में फैसला होता है। यह पूछे जाने पर कि आरक्षित वर्ग और सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के बीच वरिष्ठता का निर्धारण इन आर्डर आफ मेरिट पर कैसे हो सकता है उन्होंने कहा कि लोक सेवा आयोग इसकी व्यवस्था है।
उधर प्रो मुकुन्द शरण त्रिपाठी ने कहा कि कुलपति ने विश्वविद्यालय परिनियमावली की पूरी तरह से अनदेखी की है। सलेक्शन कमेटी ने सामान्य वर्ग में तीन नाम मेरिट के अनुसार रखे थे लेकिन कार्यपरिषद ने दो नामों पर ही स्वीकृति दी। इस कारण आर्डर आफ प्रिफरेंस खत्म हो गया। फिर भी यदि इस आधार पर कुलपति फैसला लेते हैं तो परिनियमावली में यह व्यवस्था है कि इसे कार्यपरिषद में रखा जाएगा और उसकी स्वीकृति ली जाएगी। यही नहीं आपत्ति करने का अवसर भी दिया जाएगा। कुलपति ने इस सभी प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। वर्ष 1998 के बाद 2002, 2007 और 2010 में वरिष्ठता सूची अपडेट हुई थी और उसमें मै ही सबसे वरिष्ठ था। कुलपति के गलत निर्णय से मै वरिष्ठता क्रम में दूसरे स्थान पर ही दूसरे स्थान वाले तीसरे पर चले गए। उन्होंने कहा कि कुलपति के निर्णय को वह कुलाधिपति के यहां चुनौती देेंगे। जरूरत पड़ी तो वह हाईकोर्ट भी जाएंगें।

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  • यह तो न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत की हत्या है .. ऐसे तो कोई OBC कभी वरिष्ठ हो ही नहीं सकता . गोरखपुर के जातिवादी सवर्ण अख़बारों के लिए यह कोई समाचार नहीं है ?