समाचार साहित्य - संस्कृति

पहला गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट- साहित्य की जकड़बंदी और अभिव्यक्ति की सीमा पर बहस के बीच सम्मान, नाट्य मंचन

  • 89
    Shares

गोरखपुर, 10 अप्रैल। बहस, सम्मान, नाट्य मंचन, चित्र व पुस्तक प्रदर्शनी के साथ दो दिवसीय पहला गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट सम्पन्न हो गया। लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन ‘ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं ’ विषय पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने वंदेमातरम के सम्मान के लिए संविधान में संशोधन की वकालत की। दोनों दिन बहस का विषय न होने के बावजूद असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी बहस के केन्द्र में आ गए। दो लेखकों ने पुरस्कार वापसी को बेमतलब बताया तो एक लेखक ने बढ़ती असहिष्णुता को रोकने के लिए सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाया।
एनके सिंह ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है लेकिन एक सीमा तक। सभी को सामाजिक मूल्यों का आदर करना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक ने पत्रकारों को पढ़ने पर जोर दिया तो व्यंग्यकार रणविजय सिंह ने आज सृजनात्मकता पर कोई संकट नहीं है। उन्होंने पुरस्कार वापस लेने वाले लेखकों, पत्रकारों को दोहरे मापदंड वाला बताया वहीं वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने कहा कि लड़के-लड़कियों को आजादी से घूमने देना चाहिए और मारल पुलिसिंग बंद होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पुरस्कार वापसी असहिष्णुता के बन रहे माहौल के खिलाफ थी।

हिंसा के खिलाफ रहा है साहित्य-प्रो विश्वनाथ तिवारी
पहले गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल का उद्घाटन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष प्रो0 विश्वनाथ तिवारी ने किसा। उन्होंने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि साहित्य हमेशा हिंसा के खिलाफ रहा है। उन्होंने कहा कि एक पक्षी की हत्या पर विश्व का प्रथम श्लोक उद्भूत हुआ था। रामायण और महाभारत की कथावस्तु युद्ध है लेकिन उसका स्थायी भाव शांति है। दोनों महाकाव्य अहिंसा को परम धर्म बताते हैं और दोनों का पर्यावसान शांत रस है। शांत रस को आचार्य अभिनव गुुप्त ने प्रतिष्ठित किया। वह ऐसे विचारक हैं जिनके बारे में कहा गया कि एक हजार वर्षों में उनके जैसा विचारक नहीं हुआ।
दिमाग को गुलाम बनाने वाले बाजारवाद का विरोध करे साहित्य-चित्रा मुदगल
समारोह के पहले विमर्श सत्र में ‘‘क्या साहित्य लेखन जकड़नों से मुक्त हुआ है ’’ पर बोलते हुए ” आवां “, ” एक जमीन अपनी ” और ”  पोस्ट बाक्स नम्बर 203 नाला सोपारा ” जैसे चर्चित उपन्यासों की रचचिता चित्रा मुद्गल ने कहा कि साहित्य चेतना का लोकतंत्र है। साहित्य आज की चुनौतियों और जकड़बंदियों के प्रति सर्तक है। साहित्य लोक के बारे में सोचता है। जो नहीं सोचा गया, उसके बारे में सोचता है। उन्होंने बाजारवाद को सबसे बड़ी जकड़बंदी बताते हुए कहा कि साहित्य ने एक समय असमानता के खिलाफ संघर्ष किया और आज उसे दिमाग को गिरवी बनाने वाले बाजारवाद से लड़ना होगा।

IMG_20170408_130631

उन्होंने कहा कि आज प्रकाशक ‘ लपेट ’ जैसी रचना और ‘ पतनशील पत्नियों के नोट्स ’ के लिए बड़े-बड़े आयोजन करते हैं लेकिन किसी सर्जनात्मक कृति के लिए संगोष्ठी करने में भी रोने लगते हैं। लेखकों को इसका विरोध करना चाहिए।
लिट् को लिट्टी से जोड़ने की जरूरत-प्रो रामदेव
वरिष्ठ साहित्यकार प्रो रामदेव शुक्ल ने बाजार को साहित्य की सबसे बड़ी जकड़न बताया और कहा कि साहित्य को गरीबी और भूख से जुड़ना चाहिए। उन्होंने व्यंजना में कहा कि लिट को लिट्टी से जुड़ने की जरूरत है। वरिष्ठ कवि महेश अश्क ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
इस सत्र का समन्वय हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 चित्तरंजन मिश्र ने कहा कि
अपने समय का जरूरी साहित्य अपने समय की जकड़नों को तोड़ता है। एक तरफ हमारा समाज बंदिशों से मुक्त हो रहा है लेकिन इसी समय ऐसा भी हो रहा है कि हमारी स्वाधीनता सीमित होती जा रही है।
विरोध व विद्रोह गोरखपुरियत की पहचान-जुगानी भाई
दूसरे सत्र में ‘ गोरखपुरियत की पहचान ’ पर रवीन्द्र श्रीवास्तव ( जुगानी भाई ), सुल्तान अहमद रिजवी और पी0 के0 लाहिड़ी ने अपनी बात रखी। तीनों ने अपने अनुभवों और बदलते दौर में शहर की बदलती तस्वीर पर चर्चा की। रवीन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि गौतम बुद्ध, गोरखनाथ, कबीर और फिराक जैसी विराट् विभूतियों के व्यक्तित्व के चतुर्भुज ने गोरखपुरियत को वैश्विक पहचान दिलाई है। यह भूमि विरोध और विद्रोह की धरती रही है जिसने आजादी के समय से ही क्रान्तिकारी विचारों और विचारकों को उत्पन्न करने का कार्य किया है। सुल्तान अहमद रिजवी साहब ने कहा कि गोरखपुर की फिजाओं में कुछ ऐसा है जो आने वाले को चक्करघिन्नी की तरह फंसा कर उसे अपना बना लेता है। वस्तुतः गोरखपुरियत और कुछ नहीं आदमियत है। यह भूमि धार्मिक समन्वय की अनूठी भूमि है। पी0 के0 लाहिड़ी ने इस शहर को रिश्तों की आत्मीयता की भूमि बताते हुए शहर से जुड़ी पुरानी यादों को ताजा किया। संचालन कर रहे इतिहास विभाग के प्रो0 चन्द्रभूषण अंकुर ने गोरखपुर शहर को एक जिन्दा धरोहर बताया।
‘ काॅफी हाउस ’ में मोदी-योगी पर चर्चा
प्रथम गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में शहर की पुरानी जीवंत परम्परा को साकार करता काॅफी हाउस जोन भी बनाया गया था जहां गर्मागर्म काॅफी के साथ उपस्थित लोगों ने चर्चा की। एक तरफ राजनैतिक क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों पर बहस जारी थी तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री बनना और गोरखपुर के विकास की चर्चा जारी थी। युवाओं के बीच बी0एस0 फोर की मोटरसाइकिलों और कैरियर के चुनाव को लेकर चर्चा हो रही थी तो वहीं व्यापारियों के बीच जी0एस0टी0 बिल चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ था।

सम्मान
गोरखपुर महानगर में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को प्राइड आॅफ गोरखपुर अवाॅर्ड, गोरखपुर आइकंस अवाॅर्ड एवं कर्मयोगी सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि नगर विधायक डाॅ0 राधामोहन दास अग्रवाल ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गोरखपुर की धरती इस बात को लेकर सौभाग्यशाली रही है कि उसने समय-समय पर देश-समाज के लिये योग्य विविध क्षेत्रों में प्रतिभाओं को उत्पन्न किया है। उनका सम्मान गोरखपुर की धरती का सम्मान है।

इस मौके पर प्रो विश्वनाथ तिवारी, पीके लाहिड़ी, प्यारे मोहन सरकार, शरद मणि त्रिपाठी, प्रो हरिशंकर श्रीवास्तव, चित्रा त्रिपाठी, उर्मिला शुक्ला, मैंनावती देवी, आरबी लाल, पीसी श्रीवास्तव, नरेंद्र मोहन सेठ को प्राइड आफ गोरखपुर अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा प्रो हर्ष सिन्हा, रूप कुमार बनर्जी, मुमताज खान को गोरखपुर आईकंस और रविंद्र रंगधर, संदीप श्रीवास्तव और शुभेंद्र सत्यदेव को कर्मयोगी सम्मान से सम्मानित किया गया।
मधुकर उपाध्याय को सुधाविन्दु सम्मान
लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन वर्ष 2016 का सुधाविन्दु सम्मान वाराणसी की प्रो चन्द्रकला त्रिपाठी व पटना के निलय उपाध्याय को तथा वर्ष 2017 का सुधा विन्दु सम्मान वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय व नरेन्द्र नाथ धर दुबे को दिया गया।
चित्र प्रदर्शनी व कार्टून कोना
आयोजन में संवाद भवन से लगे अमृता कला वीथिका में गोरखपुर के रंगकर्म की ऐतिहासिक विरासत को प्रदर्शित करते हुए शहर की प्रतिष्ठित रंगमंचीय संस्थाओं ने इतिहास के झरोखे से यादगार प्रस्तुतियों के चित्रों को प्रदर्शित किया। इनमें युवा संगम, रंगाश्रम, रंगमण्डल, इप्टा, दर्पण, अंगार, संस्कार भारती, प्रियदर्शनी तथा अभियान प्रमुख थे।
फोटो प्रदर्शनी में सुशील राय, संदीप श्रीवास्तव, संगम दूबे, राजीव केतन एवं अन्य फोटोग्राफरों की तस्वीरें लगायी गईं थी। विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग के छात्रों एवं अन्य कलाकारों द्वारा बनाई गयी खूबसूरत तस्वीरों ने कला के साहित्यिक पक्ष को जीवंत किया।
जाने माने कार्टूनिस्ट प्रदीप सुविज्ञ ने कार्टून कोने के माध्यम से सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर चुटीले व्यंग्य से भरपूर मजेदार कार्टूनों की प्रदर्शनी लगायी।
‘ मा निषाद ’ का मंचन
रूपान्तर नाट्य मंच ने लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन आखिरी सत्र में गिरीश कर्नाड लिखित नाटक ‘ मा निषाद ‘ का मंचन किया। रूपान्तर की टीम लम्बे अरसे बांद मंच पर थी। लोक की दृष्टि से रामायण की नई व्याख्या करने वाले इस नाटक में अपर्णेश मिश्र, सुनील जायसवाल, शंभू तरफदार, दुर्गेश, सतीश श्रीवास्तव आदि ने भूमिका निभाई।

1 Comment

Click here to post a comment

  • Mahesh ashk shamil krne layak nhi the kya ? Ham yahi pr kamjor hai, kam ke sanhya ham apna disha bhool jate hai, Kyo ki hame prachlit hone ka Kast rhta hai Jbki hame koi poochhta bhi nhi, bhai Channel apka hai, aapki bat to upar honi hi chahiye