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पुस्तक लोकरंग-3 के लोकार्पण और सोहर गान के साथ हुआ दसवें लोकरंग का आगाज

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जोगिया (कुशीनगर) , 11 अप्रैल। जोगिया कुशीनगर , 11 अप्रैल। देश के कई हिस्सों से आए साहित्यकारों, कलाकारों द्वारा हजारों लोगों की मौजूदगी में पुस्तक ‘ लोकरंग-3 ’ के लोकर्पण और जोगिया गांव की महिलाओं के सोहर गान के साथ दसवें लोकरंग का शानदार आगाज हुआ।
इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रो चौथीराम यादव ने कहा कि लोक साहित्य, लोक कला का वहीं सृजन होता है जहां श्रम और संघर्ष होता है। उन्होंने कहा कि जोगिया गांव के लोगां का एक संयुक्त परिवार की तरह लोकरंग का आयोजन को बहुत महत्वपूर्ण बताया।
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो शंभू गुप्त ने कहा कि आज जब लोक साहित्य, लोक कला को विकृत करने का कार्य हो रहा है, ऐसे में लोकरंग का 10 वर्ष तक लगातार आयोजन और हजारों लोगों की उपस्थिति ने लोकसंस्कृति के प्रति लोक के प्रेम को उजागर करता हैै। डा तैयब हुसैन ने कहा कि जिसे हाशिए की संस्कृति कहा जाता है वही असल में हमारी संस्कृति है जो मेहनतकश लोगों का सृजन है।

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लोकरंग में हर वर्ष स्मारिका का प्रकाशन होता है जिसमें लोक कलाओं के बारे में लेख होते हैं। समय-समय पर स्मारिका के स्थान पर पुस्तक का प्रकाशन होता रहा है। पहले लोकरंग के आयोजन में भी पुस्तक का प्रकाशन हुआ था। इसके बाद चैथे लोकरंग में लोकरंग-2 का प्रकाशन हुआ। दसवें लोकरंग में लोकरंग-3 का लोकार्पण आज साहित्यकारों ने किया।

लोकार्पण के मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रो चौथी राम यादव, तैयब हुसैन, एके पंकज, प्रो शंभू गुप्त, कुशीनगर के जिलाधिकारी शंभू कुमार, प्रो सर्वेश जैन, वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन, चरण सिंह पथिक, हरि भटनागर, रामजी यादव, प्रो चन्द्रभूषण अंकुर, सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार अशोक चौधरी, इरफान, शाह आलम, प्रो बद्रीनाथ, रमेश मौर्य, संजय आर्य, अभिषेक पंडित, ममता पंडित आदि उपस्थित थे।

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लोकरंग-3 के लोकार्पण के बाद गांव की महिलाओं हीरमति, फूलमती, सीरमती, शांति, गुजरी, उमरावती ने सोहर प्रस्तुत किया। सोहर लोकसाहित्य का सबसे पुराना गीत है न सिर्फ छंद बल्कि विषय वस्तु से भी। सोहर बच्चे के जन्म के समय मध्यम स्वर और विलम्बित लय में गाया जाने वाला सहगान है। गांव की महिलाओं ने राम के छठिहार प्रसंग पर गाया जाने वाला अत्यन्त मार्मिक सोहर गाया जिसमें हिरन-हिरनी और हिरनी-कौसल्या के बीच संवाद है। यह गीत था-
छापक पेड़ छिउलिया त पतवन गहवर हो।
अरे रामा ताहि तर ठाढि़ हरिनिया त मन अति अनमन हो।।
चरतई चरत हरिना हरिनी से पूछई हो
हिरनी की तोरा चरहा झुराहि कि पानी बिनु मुरझिउ हो
नाहीं मोर चरहा झुरान न पानी बिनु मुरझिउ हो
हरिना आजु राजाजी के छट्ठी तुम्हे मार डरिहई हो
मचियै बैठी कोसिला रानी हरिनी अरज करई हो
इसके बाद पटना से आयी हिरावल ने जनगीत प्रस्तुत किया।

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इसके बाद में राजस्थान से आए कालबेलिया आदिवासी समूह ने अपना नृत्य व गीत प्रस्तुत किया।
कालबेलिया राजस्थान के आदिवासी हैं जो सांप के पकड़ने और उसके जहर को निकालने के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनके नृत्य और गीत बहुत मशहूर हैं। कालबेलिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं और उनका कोई स्थायी डेरा नहीं है। राजस्थान मे वे चित्तौड़, पाली, अजमेर और उदयपुर में अधिक संख्या में पाए जाते हैं। कालबेलिया समुदाय की महिलाए काला घाघरा और ओढ़नी पहन कर घूमते हुए नाचती हैं और पुरूष डफली, बीन, खजड़ी, ढोलक, पुंगी बजाते हुए गाते हैं। नृत्य के दौरान महिलाए कई हैरतअंगेज करतब भी दिखती हैं जिसमें सिर पर घड़े रखकर नृत्य करना, उसमें आग जलाकर नृत्य करना प्रमुख है। लोकरंग में जयपुर से आए चंदनलाल कालबेलिया की टीम ने नृत्य प्रस्तुत किया।

आज उद्घाटन समारोह में लोकार्पित लोकरंग -3 में पत्रिका के सम्पादक सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने लोक संस्कृति और पसमांदा मुसलमान पर सम्पादकीय लिखी है। इस पत्रिका में कई महत्वपूर्ण लेख तो हैं ही गीतों का संग्रह भी है। भिखारी ठाकुर पर गोरखपुर विश्वविद्यालय के शोध छात्र संदीप राय और तैयब हुसैन का लेख है तो एके पंकज का ‘ झारखंड के आदिवासियों का पुरखा साहित्य ’ पर लेख है। इसके अलावा प्रभात का जनजातीय लोकराग पर, डा प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन लोकगाथा रेसमा-चूहड़मल पर, डा आद्या प्रसाद द्विवेदी का भोजपुरी भाषी महिलाओं के लोक नाट्य पर, डा अनिल कुमार पंडित का छउ पर, डा बाल्मीकि महतो का कला के व्रात्य रूप पर, आशा कुशवाहा का लोक कवि बिसराम केे बिरहे पर, डा क्षमाशंकर पांडेय का कोल आदिवासियों के लोक गीत पर लेख हैं।

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