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प्राकृतिक चिकित्सा की पुरानी पद्धति है ‘ हिजामा ’ , कपिंग थेरेपी से दूर करते हैं खून का असंतुलन

सैयद फरहान अहमद
गोरखपुर, 24 अक्टूबर। आपने कप का प्रयोग चाय पीने में किया होगा लेकिन एक कप खून निकालवा कर इलाज नहीं करवाया होगा। न ही कप के जरिए मसाज करवाया होगा। इलाज में आमतौर पर खून चढ़ाया जाता है, लेकिन खून निकाल कर इलाज नहीं सुना होगा। गोरखपुर में करीब डेढ़ साल से एक ऐसी विधि से इलाज हो रहा है जो हजारों साल पुरानी है। इसे ‘हिजामा’ या ‘पछना’ या ‘सिंघी लगवाना’ या ‘कपिंग थेरेपी’ के नाम से जाना जाता है।
गोरखपुर मंडल में यह विधि बिल्कुल नई है। गोरखपुर के शाहमारुफ जामा मस्जिद रोड पर अलीगढ़ दवाखाना में डा. मोहम्मद अख़लद ‘हिजामा’ विधि से इलाज कर रहे हैं। यहां एक कप खून निकलवाने की कीमत 150 रुपया है। डा. मोहम्मद अख़लद का दावा है कि ‘हिजामा’ विधि का कोई साइड इफेक्ट्स नहीं हैं। इस विधि से करीब 72 असाध्य बीमारियों का इलाज किया जा रहा है। इस इलाज में दवा की जरुरत नहीं होती है और न ही किसी तरह का परहेज करने की जरुरत पड़ती है।
डा. मोहम्मद अख़लद

डा. मोहम्मद अख़लद

 डा. अखलद का कहना है कि ‘हिजामा’ विधि कई बीमारियों में बेहद मुफीद है। यह थेरेपी काफी पुरानी है। हम इसे मॉडीफाय कर रहे हैं और लोगों तक पहुंचा रहे हैं। इसकी थ्योरी यह है कि शरीर में कई बीमारी की वजह खून का असंतुलन होता है। हम कपिंग थेरेपी के जरिए इस ब्लड को बैलेंस कर देते हैं और बीमारी ठीक हो जाती है और पेशेंट को जल्द आराम मिल जाता है।
‘ हिजामा ‘ के जरिए ऐसे  किया जाता इलाज
डा. अख़लद ने बताया कि पहले मरीज का हेल्थ रिकार्ड चेक किया जाता है। जरूरी ब्लड टेस्ट किया जाता है और उससे संबंधित बीमारी का एक्स रे कराया जाता है। डॉक्टर रिपोर्ट के आधार पर तय करते हैं कि बॉडी में कपिंग (हिजामा) कहां की जाए। कपिंग के लिए एनाटॉमी और फीजियोलॉजी की समझ होनी चाहिए। बीमारी के अनुसार गर्दन या गर्दन के नीचे या पीठ में कपिंग की जाती है। कपिंग के लिए शीशे का कप यूज करके वैक्यूम पैदा किया जाता है ताकि कप शरीर से चिपक जाए। कुछ देर बाद वह जगह उभर जाती है। फिर उस प्वाइंट पर सर्जिकल ब्लेड से माइनर कटिंग कर फिर से कपिंग की जाती है। कपिंग करने के तीन से पांच मिनट बाद असंतुलित खून जमा हो जाता है। जमा हुए खून को निकाल दिया जाता है। अगर बीमारी शुरुआती हो तो दो सीटिंग में बीमारी खत्म हो जाती है, वरना तीन-चार सीटिंग की जरुरत होती है.
उन्होंने  बताया कि ‘हिजामा’ प्राकृतिक चिकित्सा की सबसे पुरानी पद्धति है। समय के साथ-साथ हम इस विधि को भूलते चले गए.
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डा. अख़लद ने बताया कि सालों पुरानी इस पद्धति को कपिंग थेरेपी भी कहते हैं। माइग्रेन, ज्वाइंट पेन, कमर दर्द, स्लिप डिस्क, सर्वाइकल डिस्क, पैरों में सूजन, सुन्न होना शूगर, ब्लड प्रेशर,  पेट की बीमारियां, बवासीर, पुराना कब्ज भूलने की बीमारी, जिगर की बीमारियां और झनझनाहट, मोटापा, दुबलापन, बांझपन, नींद का न आना, डिप्रेशन जैसी बहुत सी बीमारी का इलाज संभव है.

डा. अख़लद ने बताया कि ‘हिजामा’ की शुरुआत हजार साल पहले मिस्र में बतायी जाती हैं. जिसे ‘हार्न थेरेपी’ के नाम से जाना जाता है। प्राचीन व मध्य कालीन भारत में जोंक द्वारा इलाज इस विधि का एक प्रकार है. उन्होंने बताया कि उनके क्लीनिक में जल्द ही जोंक द्वारा इलाज की व्यवस्था शुरू की जायेगी. यह जोंक आम नहीं होंगी बल्कि पाली जाने वाली जोंक होंगी जिन्हें मुरादाबाद से मंगवाया जायेगा. यह विधि थोड़ी महंगी होगी। लेकिन जल्द इस विधि से भी इलाज किया जायेगा.
शाहमारुफ में ‘हिजामा’ का वाहिद क्लीनिक अलीगढ़ दवाख़ाना हैं. यहां के डा. मोहम्मद अख़लद शहर में हिजामा के इकलौते डाक्टर है. इन्होंने वर्ष 2015 में जामिया हमदर्द नई दिल्ली से बीयूएमएस किया है. इन्होंने ‘हिजामा’ की पढ़ाई के साथ  केरल के डा. केटी अजमल से प्रशिक्षण भी हासिल किया है. उन्होंने शाहमारुफ में मई 2016 में क्लीनिक खोली. उनका अलीगढ़ दवाखाना 100 साल पुराना है. इनके दादा मरहूम वसी अहमद जाने माने हाकिम थे. पिता हकीम मोहम्मद अहमद  भी हकीम हैं.

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