साहित्य - संस्कृति

प्रेमचंद ने बहुत पहले सामाजिक-आर्थिक न्याय की बात की: रविभूषण

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‘आज का समय और प्रेमचंद’ विषय पर संगोष्ठी के साथ जन संस्कृति मंच का सम्मेलन संपन्न

पटना , 3 अगस्त. जन संस्कृति मंच के 15 वें राष्ट्रीय सम्मेलन के आखिरी दिन  31 जुलाई 2017 को प्रेमचंद जयंती केे अवसर पर बिहार चेंबर आॅफ काॅमर्स के सभागार में ‘आज का समय और प्रेमचंद’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। इसके पूर्व प्रेमचंद रंगशाला के पास स्थित प्रेमचंद की प्रतिमा पर जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रविभूषण, वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, वरिष्ठ कवि अजय कुमार, कवि मदन कश्यप, ‘अभिनव कदम’ पत्रिका के संपादक जयप्रकाश धूमकेतु, ‘जनमत’ के प्रधान संपादक रामजी राय, जसम, बिहार के राज्य सचिव सुधीर सुमन और युवा रचनाकार अंशुमान ने माल्यार्पण किया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए आलोचक रविभूषण ने कहा कि प्रेमचंद का केवल साहित्यिक पाठ नहीं होना चाहिए। वे भारतीय समाज के राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पाठ यानी समग्र पाठ के लिए हमें आमंत्रित करते हैं। 21वीं सदी के हमारे समय के ज्यादातर सवालों के संदर्भ में प्रेमचंद का साहित्य और उनके विचार सर्वाधिक प्रासंगिक हैं। प्रेमचंद ने राजनैतिक पार्टियों से बहुत पहले सामाजिक-आर्थिक न्याय की बात की। आज का समय प्रतिगामिता, कुतर्क, झूठ, उन्माद, अंधआस्था, मिथ्यावाद और छद्म राष्ट्रवाद का समय है, जिनसे संघर्ष की दृष्टि प्रेमचंद ने हमें दी है। उनके पास स्पष्ट इतिहास-दृष्टि, समाज-दृष्टि, वर्ग-दृष्टि और नैतिक-दृष्टि है। वर्ण-व्यवस्था और सांप्रदायिक कट्टरता के वे मुखर विरोधी हैं। न्याय और समानता उनके साहित्य के केंद्रीय तत्व हैं।
प्रेमचंद के हवाले से उन्होंने कहा कि उन्होंने गाय के बजाय मनुष्य को पवित्र मानने की बात कही, उन्होंने कहा कि इस्लाम तलवार की बल पर नहीं फैला, बल्कि इसकी वजह ऊंची जातियों द्वारा नीची जाति के लोगों पर किया गया अत्याचार था। प्रेमचंद एक नए भारत, एक वैकल्पिक भारत की तलाश करते हैं और हमें उसका निर्माण करने के लिए प्रेरित करते हैं।
इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक खगेंद्र ठाकुर ने कहा कि प्रेमचंद स्वाधीनता के लेखक थे। उन्होंने साम्र्राज्यवाद और सामंतवाद से समाज की स्वतंत्रता के साथ-साथ स्त्रियों के लिए भी लिखा। अपने जमाने की नब्ज पर उनकी गहरी पकड़ थी। वे गतिशील यथार्थ के लेखक थे। प्रेमंचद गांधीवाद से प्रेरित जरूर थे, पर गांधी जी के कई विचारों के आलोचक भी थे। खासकर असहयोग आंदोलन को वापस लेने और 1934 में बिहार में आए भूकंप को पाप का दंड कहे जाने की उन्होंने आलोचना की थी। उन्होंने अपनी कहानियों के जरिए जनता की भूमिका को साहित्य के केंद्र में ले आए।
जसम के नवनिर्वाचित अध्यक्ष वरिष्ठ आलोचक राजेंद्र कुमार ने कहा कि प्रेमचंद गहरी राजनीतिक चेतना के लेखक हैं। वे भले आजादी के पहले हमसे जुदा हो गए, पर 70 साल बाद भी हमफिक्र हैं। आज जिस तरह बहुमत के दावे के आधार पर सरकारें तमाम जनविरोधी कृत्य कर रही हैं, प्रेमचंद ने उसकी ओर अपने समय में भी संकेत किया था। प्रेमचंद आर्थिक विषमता को सबसे बड़ा पाप मानते थे, वह पाप आज इस देश और समाज में पहले से अधिक है। उन्होंने कहा था कि अब न कही हिंदू संस्कृति न मुस्लिम संस्कृति है, दुनिया भर में आर्थिक संस्कृति है। उन्होंने हिंदी-उर्दू में समान रूप से लिखा। दोनों भाषाओं का बंटवारा उन्हें बर्दाश्त नहीं था, पर आज दीनानाथ बत्रा कह रहे हैं कि पाठ्यक्रम से उर्दू को हटा दो। राजेंद्र कुमार ने कहा कि प्रेमचंद केवल हृदय परिवर्तन के लेखक नहीं हैं, बल्कि बुद्धि-परिवर्तन के लेखक हैं। वे हमें विवेकवान और तर्कशील बनाते हैं।
उर्दू के आलोचक प्रो. अफसा जफर ने कहा कि प्रेमचंद हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं। हमें याद रखना चाहिए कि कैसी परिस्थिति में उन्होंने लेखन किया और अपने विचारों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने कहा कि ‘कफन’ जैसी कहानी न प्रेमचंद से पहले लिखी गई, न बाद में। प्रेमचंद ने उर्दू भाषा में अपने लेखन की शुरुआत की थी और उर्दू के भी महान लेखक हैं, लेकिन उन्हें वहां वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वो हकदार थे।
समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि प्रेमचंद हमारे लिए जीवित संदर्भ हैं। हमारे हमसफर हैं। उन्होंने अपने पात्रों का सचेत चुनाव किया था, वैसे पात्र जो समाज में उपेक्षित हैं, पर जिनके बारे में उनका मानना था कि वही स्वतंत्रता को संभव कर सकते हैं। उन्होंने उन उपेक्षित लोगों की आंख से ही राष्ट्र, आर्थिक प्रबंधन और समाज के ढांचे को देखा और उनके पुनर्गठन की जरूरत पर जोर दिया। वे स्त्रियों और दलितों के हितैषी लेखक थे।
कहानीकार अवधेश प्रीत ने कहा कि प्रेमंचद मनुष्य की गरिमा की बहाली के लेखक थे। उस समय जो भी मनुष्यता विरोधी शक्तियां थीं, उनको डंके की चोट पर ललकारते हुए अभिव्यक्ति के खतरे उठा रहे थे। ब्राह्मणवाद और पोंगापंथ के खिलाफ उन्होंने हर तरह की जोखिम उठाकर लिखा। पिछले साल ऊना में दलित नौजवानों के साथ जो घटना घटी और उसके बाद दलित समुदाय द्वारा मरी हुई गाय न फेंकने का जो आंदोलन शुरू हुआ वह प्रेमंचद की कहानी ‘सद्गति’ की याद दिलाता है। प्रेमचंद ने कहा था कि जब तक समाज में असमानता है तब तक राष्ट्रवाद का कोई मतलब नहीं? आज जिस तरह नौकरशाह रिटायरमेंट के बाद कारपोरेट की शरण में जा रहे हैं, उस प्रवृत्ति को भी प्रेमंचद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ से बखूबी समझा जा सकता है।
संगोष्ठी का संचालन अहमद सगीर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सुुधीर सुमन ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन, ‘अभिनव कदम’ के संपादक जयप्रकाश धूमकेतुु, वरिष्ठ कवि श्रीराम तिवारी, मदन कश्यप, राणा प्रताप, भरत मेहता, अजय कुमार, जावेद इस्लाम, लोकयुद्ध संपादक बृजबिहारी पांडेय, अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव राजाराम सिंह, पत्रकार पुष्पराज, अरुण कुुमार मिश्रा, अनीश अंकुुर, हरेंद्र सिन्हा, राजेश कमल, संतोष सहर, प्रीति प्रभा, संतोष झा, केके पांडेय, सुमन कुमार, कुमुद रंजन, नवल किशोर सिंह, समता राय आदि भी मौजूद थे।

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