साहित्य - संस्कृति

‘ प्रेम, संघर्ष व श्रम से मिलकर बनी है तश्ना आलमी की शायरी ‘

स्मृति सभा  आयोजित कर संस्कृति कर्मियों, लेखकों ने  तश्ना आलमी को याद किया

लखनऊ, 22 सितम्बर। कवि के लिए जरूरी है कि वह पहले इंसान हो। इंसानियत ही किसी कवि को बड़ा बनाती है। तश्ना आलमी ऐसे शायर थे जिनमें इन्सानियत कूट-कूट कर भरा था। जैसा उनका जीवन था, सच्चाइयों से भरा वैसी ही उनकी शायरी थी। कोई फांक नहीं। ये खूबियां ही उन्हें दुर्लभ और बड़ा बनाती है। वे मुशायरों के नहीं आम लोगों के शायर थे। वे दुष्यन्त और अदम की परम्परा में आते हैं। उनकी शायरी में सहजता ऐसी कि वह लोगों की जुबान पर बहुत जल्दी चढ जाती। इसमें एक तरफ इंकलाब है तो वहीं उसमें प्रेम व करुणा भी भरपूर है।

यह बात तश्ना आलमी को याद करते हुए उनकी स्मृति में आयोजित सभा में लोगों ने कही। स्मृति सभा का आयोजन इप्टा कार्यालय, कैसरबाग में जन संस्कृति मंच और इप्टा ने संयुक्त रूप से किया था। इसकी अध्यक्षता इप्टा के महासचिव राकेश ने की तथा संचालन किया जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर ने। इस मौके पर ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक सुभाष राय, कवि भगवान स्वरूप कटियार, डण्डा लखनवी व डॉ तुकाराम वर्मा, नाटककार राजेश कुमार, संस्कृतिकर्मी आदियोग व कल्पना पाण्डेय, भाकपा माले के नेता राजीव गुप्ता व मो शकील कुरैशी, रिहाई मंच के शहनवाज आलम व लक्ष्मण प्रसाद, कलाकार धर्मेन्द्र कुमार, जसम के डॉ संदीप कुमार सिंह, रतन शुक्ला आदि ने अपना श्रद्धा सुमन अर्पित किया तथा तश्ना आलमी के साथ की यादों को साझा किया।

तश्ना आलमी की शायरी पर बात करते हुए लोगों ने कहा कि उनकी शायरी प्रेम, संघर्ष व श्रम से मिलकर बनी है। इसमें श्रम का सौंदर्य है। उन्होंने समाज की बुराइयों, शोषण की दारुण स्थिातियों, गरीबी, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं को उभारा है। उनकी शायरी आम आदमी की दशा व दुर्दशा से ही नहीं, उसके अन्दर की ताकत से परिचित कराती है। यह तश्ना की ‘तश्नगी’ है जो पाठक व श्रोता को तश्ना के सफर का हमराह बनाती है: ‘तुम्हारे चांद की शायद हुकुमत चांदनी तक है/मगर अपना सफर दूसरी रोशनी तक है।’ इस तरह उनकी शायरी हमारी चेतना को दूसरी रोशनी के सफर के लिए तैयार करती है।
इस मौके पर लेखकों की उन समस्याओं व दुश्वारियों पर भी चर्चा हुई जिनका जीवन की अन्तिम बेला में उन्हें सामना करना पड़ता है। अदम गोण्डवी व मुद्राराक्षस के लिए तो थोड़ा-बहुत किया जा सका लेकिन वह अपर्याप्त था लेकिन ऐसे बहुत से लेखक-रचनाकार हैं जिन्होंने अपना जीवन साहित्य व समाज में लगा दिया लेकिन अन्तिम समय में उन्हें अकेलेपन, आर्थिक अभाव व अन्य तरह की दिक्कतों में जीना पड़ता है। जब कोई हमारे बीच से जाता है तो हम इस विषय पर चर्चा करते हैं और उसके बाद इस विषय को भूल जाते हैं। इस बारे में यह विचार आया कि इसे निरपेक्ष तरीके से नहीं देखा जा सकता है। यह हमारे सामाजिक ढांचे से जुड़ा है। इस संबंध में क्या नीति व योजना ली जा सकती है, उस पर जरूर विचार किया जाना चाहिए।
ज्ञात हो कि तश्ना आलमी का गहरा जुड़ाव भाकपा (माले) से था और इसके सक्रिय व समर्पित कार्यकर्ता थे।

पार्टी की ओर से लेनिन पुस्तक केन्द्र में शोक सभा हुई जिसमें पार्टी के नेताओं ने उन्हें भाव भीनी श्रद्धान्जली अर्पित की और उनके संस्मरण रखे । माले नेताओं ने कहा कि पार्टी और सर्वहारा वर्ग ने एक महान और इंकलाबी शायर खो दिया है। उन्होंने सर्वहारा का जीवन जिया और उसी वर्ग की शायरी की। उनका निधन पूरे वाम लोकतांत्रिक आन्दोलन की अपूर्णीय क्षति है।

शोक सभा में पार्टी के जिला प्रभारी रमेंश सिंह सेंगर, राज्य स्थाई समिति के सदस्य अरुण कुमार, जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर, एपवा की जिला संयोजिका मीना सिंह, युवा नेता राजीव गुप्त, आर के सिन्हा, सूरज प्रसाद, साहित्यकार भगवान स्वरूप कटियार व श्याम अंकुरम, मधुसूदन कुमार मगन, अनिल कुमार, आइसा के नितिन राज, शिवा रजवार, डाक्टर अमित आदि प्रमुख लोग मौजूद थे।
ताश्ना आलमी का निधन बीते 18 सितम्बर को हो गया । उनको कुछ महीने पहले पक्षाघात हुआ था तब से वे लगातार कमजोर होते जा रहे थे । ताश्ना जी का जन्म देवरिया जिले के सलेमपुर, लार में 25 अप्रैल 1943 को हुआ था । करीब 40 वर्ष पहले उनका परिवार लखनऊ के बशीरतगंज में आकर रहने लगा था । ताश्ना जी को प्यार से कोई मास्टर जी, कोई डाक्टर साहब तो कोई कामरेड कहकर बुलाता था। उर्दू शायरी के क्षेत्र में ताश्ना जी की ख्याति दूर-दूर तक थी । उनकी शायरी सरल और आम जन को आसानी से समझ में आने वाली थी । एक शेर में वह लिखते हैं -तरक्की खूब की है गांव से अब शहर में आकर -वहां हम हल चलाते थे ,यहां रिक्शा चलाते है। उनकी शायरी की एक किताब ‘बतकही’ जसम की पहल पर छपी तथा ‘अतश’ नाम से उनके जीवन व शायरी पर एक दस्तावेजी फिल्म भी बनी।

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