साहित्य - संस्कृति

प्रो गिरीश रस्तोगी की तीसरी पुण्यतिथि पर नाटक का मंचन, ‘ अभिव्यक्ति की चुनौती एवं समकालीन रंगमंच ’ विषय पर संगोष्ठी

वक्ताओं ने कहा-रंगकर्म नई दुनिया और उसका सपना रच सकता है
पहला रूपान्तर कला सम्मान वरिष्ठ रंगकर्मी शंभू तरफदार और प्रसिद्ध चित्रकार प्रो मनोज कुमार सिंह को दिया गया
गोरखपुर, 18 जनवरी। प्रख्यात रंगकर्मी और हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो गिरीश रस्तोगी की तीसरी पुण्यतिथि पर रूपान्तर नाट्य मंच ने 17 जनवरी को गोरखपुर विश्वविद्यालय के संवाद भवन में नाटक ‘ सादर आपका ’ का मंचन किया और ‘ अभिव्यक्ति की चुनौती एवं समकालीन रंगमंच ’ विषय पर संगोष्ठी की।

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संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कथाकार प्रो रामदेव शुक्ल ने कहा कि गिरीश रस्तोगी का हिन्दी रंगमंच के लिए दिया योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र का चुनाव किया जिसमें संसाधनों का नितान्त अभाव रहा। विशेषकर इस क्षेत्र में एक महिला रंगकर्मी द्वारा प्राथमिक प्रयास अभूतपूर्व था। उन्होंने जो परम्परा डाली उसका सुपरिणाम आज हम इन उत्साही और समर्पित युवा रंगकर्मियों के रूप में देख रहे हैं। उनकी रंग परम्परा को अक्षुण्ण बनाए रखने की जरूरत है।

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उन्होंने कहा कि रंगकर्म न केवल साहित्यिक और सांस्कृतिक कर्म है बल्कि जनता की चेतना को परिमार्जित करने का साधन भी है। यह जनता की मांग और आवश्यकता से जितना अधिक जुड़ता जाता है शक्ति के स्त्रोतों के लिए उतना ही खतरनाक होता जाता है। रंगकर्म का अनिवार्य हिस्सा अपने समय के अन्याय का विधागत तौर पर प्रतिकार करना भी है।
संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो वीके सिंह ने कहा कि रंगकर्म एक सभ्य और विकसित समाज की पहचान है। भारतीय समाज में शुरू से ही रंगकर्म को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। हमारे साहित्यकारों ने विश्व प्रसिद्ध नाटक लिखे हैं। यह समृद्ध परम्परा की निशानी है। अभिव्यक्ति के रूप में रंगमंच जनमानस में प्रसिद्ध रहा है।  भरत मुनि के नाट्शास्त को सामन्यतया पंचम वेद की संज्ञा दी जाती है। यह दर्शाता है कि रंगकर्म हमारे समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

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हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो चितरंजन मिश्र ने कहा कि गिरीश रस्तोगी का रंगकर्म की स्थापना के लिए किया जाने वाला संघर्ष वास्तव में अभिव्यकित की स्वतंत्रता के लिए किया जाने वाला संघर्ष था। उनका जीवन संघर्ष बड़ा व जटिल था। रंगकर्म नई दुनिया अैर उसका सपना रच सकता है। स्वयं गांधी के जीवन पर नाटक का बहुत प्रभाव पड़ा। यह उसकी सकारात्मक शक्ति है। यह सभी इंद्रियों को एक साथ प्रभावित करता है। यह दर्शक को बदलने वाला माध्यम है। इसका प्रभाव स्थायी होता है। इसलिए इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
रक्षा अध्ययन विभाग के प्रोफेसर हर्ष सिन्हा ने नाटक के क्षेत्र में मैडम गिरीश रस्तोगी के अवदान की चर्चा करते हुए रंगकर्म को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने अपने समय की चुनौतियों का सामना करते हुए रंगमंच को आगे बढ़ाया।

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डा आनन्द पांडेय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनुष्य होने की शर्त के साथ जुड़ी हुई है। सत्ता और शक्ति के प्रतिष्ठान लगातार इस स्वतंत्रता को नियंत्रित करने की कोशिश में रहते हैं। आलोचनात्मक शक्ति के द्वारा ही हम लोकतांत्रिक मूल्य और अभिव्यक्ति की विधाओं को सुरक्षित रख सकते हैं।
इसके पहले कार्यक्रम की शुरूआत में सभी लोगों दम प्रो गिरीश रस्तोगी को श्रद्धाजंलि दी। प्रसिद्ध चिकित्सक एवं रूपान्तर की अध्यक्ष डा. अमृता जयपुरियार ने रूपान्तर नाट्य मंच की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला। धन्यवाद ज्ञापन सचिव निशिकान्त पांडेय ने तथा संचालन डा चेतना पांडेय ने किया
इस मौके पर पहला रूपान्तर कला सम्मान वरिष्ठ रंगकर्मी शंभू तरफदार और प्रसिद्ध चित्रकार प्रो मनोज कुमार सिंह को कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दिया गया।
परिवार में पुराने मूल्यों के टूटने और परम्परागत सम्बन्धों के बिखरने की कहानी है ‘ सादर आपका ’
नाटक ‘ सादर आपका ’ निम्न मध्यवर्गीय परिवार की पृष्ठिभूमि पर आधारित है जसमें घर का मुखिया ब्रह्मानन्द समाज में प्रतिष्ठित स्थिति रखते हुए भी घर में अपनी कामकाजी पत्नी लज्जावती से हीन अनुभव करता है। लज्जावती अधिक कमाती है और अपने स्वाभिमान व स्वतंत्रता को लेकर सजग है। परिवार में उपरी शांति है लेकिन परिवार के सभी सदस्य एक छत के नीचे रहते हुए भी अकेला अनुभव करते हैं।

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लज्जावती का एक परिचित गोपाल उसकी बेटी रेखा पर बुरी दृष्टि रखता है किन्तु रेखा उसे कठोरता से दुत्कार देती है। परिवार के पारिवारिक मित्र रोहित का आगमन इस घर में नई हलचल पैदा करता है। रोहित और रेखा में प्रेम हो जाता है लेकिन जब रोहित को रेखा के पुराने प्रेमी धनेश के बारे में पता चलता है तो वह पुरूष दंभ व ईष्र्या से भर जाता है लेकिन अन्ततः वह इस पर विजय पाता है। रेखा और रोहित परिस्थिति को अपने अनुकूल करते हुए एक हो जाते हैं। यह परिवार में पुराने मूल्यों के टूटने और परम्परागत सम्बन्धों के बिखरने की कहानी है जिसे नई पीढ़ी अपनी सकारात्मकता के साथ आशा पैदा करती है।

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ब्रह्मानन्द के रूप में वरिष्ठ रंगकर्मी अपर्णेश मिश्र ने विवश मुखिया की भूमिका को जीवन्त किया। लज्जावती के रूप में सुरभि अग्रवाल ने दर्शकों को प्रभावित किया। सुरभि अग्रवाल के साथ रेखा के चरित्र में स्वाती पाण्डेय ने अपने रंगमंचीय जीवन की शुरूआत की।

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अविनाश शाही ने रोहित, सत्यम मेहता ने गोपाल तथा अंकित शुक्ला ने धनेश की भूमिका के साथ बखूबी न्याय किया। वरिष्ठ रंगकर्मी रवि प्रताप सिंह ने विलायती की भूमिका निभाते हुए एक बार फिर अपनी अभिनय क्षमता की छाप छोड़ी। नाटक का निर्देशन निशीकान्त पाण्डेय ने किया। ‘ मा निषाद ’ के बाद उन्होंने यह दूसरी नाट्य प्रस्तुति दी।

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वरिष्ठ रंगकर्मी सुनील जायसवाल ने प्रकाश व ध्वनि व्यवस्था की जिम्मेदारी निभायी। नाट्य प्रस्तुति में शान मजुमदार, डा   दुर्गेश पांडेय, जितेन्द्र पांडेय, डा. दिव्यारानी सिंह, पुरूषोत्तम पांडेय, समीक्षा श्रीवास्तव, राजनाथ वर्मा, अमरनाथ श्रीवास्तव तथा राजेश वर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।  अंत में संस्था की अध्यक्ष डा, अमृता जयपुरियार ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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