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भारी बारिश में ऐतिहासिक बसंतपुर सराय का एक हिस्सा ढहा

तीन वर्ष पहले इनटेक ने सराय के संरक्षण और विकास की योजना बनायी थी
नगर निगम, जीडीए ने नहीं रूचि ली इस योजना में

जन प्रतिनिधियों ने भी बसंतपुर सराय को बचाने की पहल नहीं की
गोरखपुर, 10 जुलाई। भारी बारिश के बीच 400 वर्ष पुराने ऐतिहासिक बसंतपुर सराय का एक हिस्सा आज ढह गया। गनीमत रही कि इस हासदे में कोई घायल नहीं हुआ। इस पुराने बिल्डिंग में 300 लोग रहते हैं।
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फार आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज ( इनटेक ) ने इस बिल्डिंग को ऐतिहासिक धरोहर बताते हुए इसको दिल्ली हाट की तरह विकसित करने की योजना बनायी गई और एक रिपोर्ट दिया है। इस योजना के लिए न तो नगर निगम, न जीडीए या प्रदेश सरकार ने रूचि दिखाई जिसके कारण इस पर अमल नहीं हो सका। आज भारी बारिश के कारण जिस तरह इस ऐतिहासिक भवन का एक हिस्सा गिरा, उससे इस भवन के अस्तित्व पर संकट और गहरा गया है।

basantpur saray

यह ऐतिहासिक भवन तीन वर्ष पहले उस समय चर्चा में आया था जब नगर निगम ने इसे ध्वस्त कर कामर्शिलय काम्पलेक्स बनाने का निर्णय किया। नगर निगम की कार्यकारिणी ने 26 अगस्त 2014 की बैठक में इस ऐतिहासिक इमारत को ध्वस्त कर यहां पर काम्पलेक्स बनाने का निर्णय लिया था। जब इसकी जानकारी हुई तो नागरिक संगठनों के पुरजोर विरोध किया। इनटेक और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी हस्तक्षेप किया जिसके कारण नगर निगम को अपने कदम पीछे हटाने पड़े। इस प्रकरण में नगर निगम की काफी भद पिटी।
गोरखपुर और आस-पास के जिलों में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए कार्य करने वाले इंजीनियर महावीर कंदोई और पीके लाहिड़ी के प्रयास से इनटेक की तीन सदस्यीय टीम ने 10 सितम्बर को गोरखपुर का दौरा कर बसंतपुर सराय का निरीक्षण किया था। इस टीम में इनटेक के आर्किटेक्चरल हेरिटेज विभाग के प्रमुख निदेशक दिव्य गुप्ता, वरिष्ठ संरक्षण आर्किटेक्ट रूकनुद्दीन मिर्जा और अर्किटेक्ट ऋषभ शर्मा थे। इस टीम ने तभी इस स्थान को दिल्ली हाट की तरह विकसित करने की राय जाहिर की थी और इसके संरक्षण व विकास के लिए विस्तृत योजना बनाकर अक्टूबर माह में ही नगर निगम को भेज दिया लेकिन नगर निगम ने इस योजना के लिए धन देने में कोई रूचि नहीं दिखाई। किसी भी जनप्रतिनिधि ने किसी और माध्यम से भी धन दिलाने की पहल नहीं की। इस योजना पर अमल हो गया होता तो आज इस ऐतिहासिक बिल्डिंग का यह हिस्सा ढ़हने से बच जाता।

इनटेक की टीम ने अपने निरीक्षण के दौरान ही बसंतपुर सराय की वर्तमान स्थिति का चिंता जतायी थी। टीम ने कहा कि इमारत के कई हिस्से आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हैं। प्लास्टर उखड़ गए हैं और दीवारों में पेड़ पर जंगली खर-पतवार उग आए हैं। इससे इमारत के स्थापत्य और सौैन्दर्य पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा है। दीवारें काई और शैवाल से काली पड़ गई हैं। गैलरी के कालम ढ़ह गए हैं। इमारत के अंदर पुराने चैम्बर के पास इसमें रहने वाले लोगों ने पक्के निर्माण करा लिए हैं।

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बसंतपुर सराय का इतिहास
बसंतपुर सराय गोरखपुर के मध्यकालीन इतिहास का जींवत दस्तावेज है। सतासी के राजा बसंत सिंह ने 1610 में यहां बसन्तपुर मुहल्ला बसाया था और यह विशाल किला बनाया जिसे बसन्तपुर सराय का नाम दिया गया। हालांकि बसन्तपुर सराय और बसन्तपर मुहल्ले को बसाए जाने के समय को लेकर एक मत नहीं है लेकिन इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि इसे सतासी के राजा बसंत सिंह ने स्थापित किया था। उस समय गोरखपुर पर उन्ही का राज था। इतिहासकार राजबली पांडेय ने अपनी पुस्तक में कहा है कि श्रीनेता राजा बसंत सिंह ने अचिरावती राप्ती और रोहिणी नदी के संगम पर इस विशाल मजबूत दुर्ग का निर्माण 1417-1458 में कराया था। बाद में मुगलों की पलटन यहां रही। 1801 से ईस्ट इंडिया कम्पनी ने राप्ती नदी के जरिए तिजारत करने वालों के ठहराने के लिए इसे सराय के बतौर प्रयोग किया। तभी से इसे बसन्तपुर सराय कहा जाने लगा। आजादी के बाद यह रैनबसेरा बन गया। गोरखपुर गजेटियर में कहा गया है कि अकबर के समय में गोरखपुर एक बड़ा कस्बा था। 1610 में राजा बसन्त सिंह ने बसन्तपुर मुहल्ला बसाया और एक बड़े किले का निर्माण किया। बसन्तपुर सराय के आस-पास रहने वाले कुछ लोग इसे औरंगजेब के बेटे मुअज्जम शाह द्वारा बनाया बताते हैं लेकिन ऐतिहासिक तथ्य इसकी पुष्टि नहीं करते हैं क्योंकि मुअज्जम शाह 17वीं ई के अंत में गोरखपुर आया था और तब तक बसन्तपुर मुहल्ला और बसन्तपुर किला अस्तित्व में था। यह जिक्र भी जरूर मिलता है कि औरंगजेब द्वारा 1680 में नियुक्त किए गए चकलेदार काजी खलीलुर्रहमान अयोध्या से एक बड़ी सेना लेकर गोरखपुर आया था और गोरखपुर से राजा सतासी को बेदखल कर यहां फौजी चैकी बनायी। उसने बसन्तपुर के किले की मरम्मत भी करायी। मुअज्जम शाह के यहां आने के बाद ही गोरखपुर का नाम कुछ समय के लिए मुअज्जमाबाद रखा गया और सभी सरकारी रिकार्डों में यह नाम दर्ज हुआ लेकिन यह नाम प्रचलित नहीं हो सका। 1801 ई में अवध के तत्कालीन नवाब सदात अली खान ने इस क्षेत्र को ईस्ट इंडिया कम्पनी के हवाले कर दिया। इसके बाद सिविल स्टेशन कप्तानगंज मंे बना लेकिन गर्मियों के दिनों में अंग्रेज अफसर इसी बसन्तपुर सराय में रहने के लिए आ जाते थे।
लाखौरी ईंटों से बना है बसंतपुर सराय
चारो तरह से चहारदीवारी से घिरा आयताकार बसंतपुर सराय का कुल क्षेत्रफल तीन एकड़ है। इसमें 67 कोठियां बनी हुई है। इसकी लम्बाई 77.3 मीटर और चैड़ाई 62 मीटर है। लकड़ी का बड़ा मुख्य दरवाजा है। इसके अलावा एक और दरवाजा है। बसंतपुर सराय की तीन ओर सड़क है। चैथी तरफ शौचालय है।  परिसर के बीचोबीच शाही मस्जिद है। इसके अलावार चार पेड़ भी हैं। पूरी इमारत लाखौरी ईंटों से बनी है और गारे के तौर पर चूना और सुर्खी का उपयोग किया गया है। छत का सहारा देने के लिए 12 सेमी मोटे लकड़ी के बीम लगे हैं। इसके परिसर में तीन दर्जन गरीब परिवार रहते हैं जो नगर निगम को किराया देते हैं। यह इमारत चारो तरह घनी आबादी के बीच है जो मुख्यतः गरीब और निम्न मध्य वर्ग के हैं।
क्या थी इनटेक की योजना
इनटेक की योजना में इमारत के क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत करने, छतों व दीवारों की सफाई कर उन्हें वारट प्रूफ बनाकर उसे पुराने स्वरूप में बहाल करने के साथ-साथ इसके परिसर में 40 क्राफट व फूड स्टाल बनाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा इन्टेस प्लाजा, बैठक के लिए ओपेन और क्लोज्ड स्पेस, म्यूजियम, प्रशासनिक कक्ष, फूड कोर्ट, एम्फी थियेटर, दस्तकारों के लिए डारमेटी तथा यहां आने वाले पर्यटकों व लोगों के लिए जरूरी सुविधाएं विकसित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए इमारत के मूल स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। इनटेक ने इस प्रोजेक्ट को कम से कम हस्तक्षेप, संरक्षण, पुनः उपयोग के लिए विकसित करने के बुनियादी सिद्धान्त पर तैयार किया है। इसका विकास समुदाय आधारित होगा और यहां पर विकसित किए जाने वाले क्राफट स्टाल से इस इमारत की मरम्मत में भविष्य में होने वाला खर्च भी निकल आएगा।

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