साहित्य - संस्कृति

मंदिर हादसे के पीछे आस्था नहीं, लापरवाही

श्वर पर आस्था का कोई मोल-तोल नहीं है, पर जब हम दुनियावी अर्थों में ईश्वर को तमाशा बनाने लगते हैं, तब मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। केरल के एक मंदिर में पिछले दिनों यही हुआ। कहते हैं कि दर्द की कोई अपनी विशेष जुबान नहीं होती, न ही आंसुओं से दु:ख घटता है। अगर ऐसा होता तो शकुंतला के आंसू और चीख उसके बेटे का दु:ख हर चुके होते और उसके चेहरे पर यों उदासी नहीं होती। लगभग पथरा सी चुकी आंखों से ऑक्सीजन मास्क लगाए, सिर से पांव तक ख़ून से सनी पट्टियों से ढंके और मशीनों के तारों के बीच दर्द से आतंकित अपने बेटे को एकटक देखते हुए रह-रह कर वह चिहुंक उठती है। पटाखों के कानफाड़ू शोर और तेज धमाके के बीच दावानल की तरह बढ़ती, लपलपाती आग ने जैसे केवल उसके बेटे के शरीर को ही नहीं, उसकी उम्मीदों तक को झुलसा दिया है।
‘वह हर जगह से जल गया है, उसके शरीर का हर हिस्सा। मैं क्या करूंगी। मेरे पति ने मुझे कुछ साल पहले छोड़ दिया। अब तक औरों के घरों में काम कर मैं अपना और इसका पेट पालती रही, इसे स्कूल भेजती रही, अब इसका इलाज कैसे करवाऊंगी।’ यह कहते हुए उम्र के दूसरे पड़ाव के बीचोंबीच पहुंची शकुंतला फफक पड़ती है। उसका 14 साल का बेटा शाबिर तिरुवनंतपुरम मेडिकल अस्पताल के बर्न्स आईसीयू में भर्ती है। यहां उसके साथ भर्ती लोगों में से ज़्यादातर के शरीर 90 फ़ीसदी से ज़्यादा जल गए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री ओमान चांडी की जीतोड़ कोशिशों के बावजूद हादसे के शिकार परिवारों के दर्द और चोट की कोई सीमा नहीं।
केरल के पेरावुर शहर स्थित कोल्लम में पुत्तिंगल देवी मंदिर परिसर में दस अप्रैल की भोर में आतिशबाजी शो के दौरान लगी आग में घायल हुए लगभग 300 लोगों में से हर एक की इसी तरह की कोई न कोई अपनी कहानी है। इतना ही नहीं इस हादसे का शिकार हो जो 110 लोग असमय ही इस दुनिया से कूच कर गए, वे भी अब किसी भी तरह अपने घर वालों, दोस्तों, रिश्तेदारों के लिए  लौटने वाले नहीं। कहने के लिए तो इन लोगों के साथ दुख की इस घड़ी में पूरा देश, केंद्र व राज्य सरकार सभी खड़े हैं, पर इससे इन सबके गम तो दूर होने वाले नहीं।
प्रशासन का कहना है कि सामान्य आतिशबाजी के लिए भी किसी तरह की मंजूरी मांगी ही नहीं गई थी और इसलिए इस बात का सवाल ही पैदा नहीं होता कि अफसरों ने मंदिर को ऐसी आतिशबाजी करने की इजाजत क्यों दी? अगर ऐसा है, तो इतनी भारी मात्रा में मंदिर परिसर में आतिशबाजी के बारूद का मौजूद होना क्या यह साबित नहीं कर रहा है कि ऐसे आयोजनों को लेकर हमारा पूरा सिस्टम कितना लापरवाह है?  ऐसी जगहों पर जहां हजारों की संख्या में लोग इक_ा थे, पुलिस प्रशासन, फायर बिग्रेड, चिकित्सकीय सुविधाओं के साथ, आपदा प्रबंधन की मौजूदगी क्या नहीं होनी चाहिए थी? ऐसे कार्यक्रमों में यह क्यों मानकर चला जाता है कि ऐसा हादसा होगा ही नहीं।
सच तो यह है कि यह हादसा आस्था से ज्यादा लापरवाही और भक्ति से ज्यादा प्रदर्शन से जुड़ा हुआ है। केरल के इस मंदिर को अमीर और रसूखदार लोगों द्वारा चलाया जाता है, जो कि अकसर स्थानीय नियमों का उल्लंघन करते रहते हैं। हर साल इस मंदिर में आतिशबाजी से जुड़ी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है और जज इसमें से एक विजेता का चुनाव करता है। आतिशबाजी के लिए बड़े-बड़े पटाखे लाए गए थे। ऐसे ही दर्जनों पटाखों के एक साथ फटने के बाद पटाखों के गोदाम में आग लग गई। जब लोग इतनी बड़ी तादात में हादसे के शिकार हो गए,  तब  पुलिस ने मंदिर प्रबंधन के खिलाफ केस दर्ज किया और प्रबंधकों पर हत्या और एक्सप्लोसिव एक्ट तोडऩे का आरोप लगाया। जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंपा गया।  न्यायिक जांच के भी आदेश हुए हैं।
हादसे के बाद से ही मंदिर प्रशासन से जुड़े वे लोग लापता हैं, जो इस आतिशबाजी कार्यक्रम के लिए जिम्मेदार थे और जिनकी देखरेख में मंदिर परिसर में नववर्ष विशु के मौके पर सात दिवसीय उत्सव ‘मीना भरणीÓ  मनाया जा रहा था। पुलिस अब इन्हें तलाश कर रही है। आतिशबाजी कार्यक्रम से जुड़े दो ठेकेदारों के यहां भी छापेमारी की गई है। इस मामले में केंद्र सरकार ने विस्फोटक नियंत्रण विभाग के मुखिया को भी जांच से जुडऩे के लिए कहा है। कहा जा रहा है कि प्रशासन द्वारा इजाजत न मिलने पर सियासी पैरवी के बाद  शनिवार को एक पेंफलेट बांटा गया जिसमें सर्वश्रेष्ठ आतिशबाजी शो के लिए इनाम की जानकारी दी गई थी। यह शो रात करीब 11 बजे प्रारंभ हुआ और तड़के चार बजे तक चलना था, पर शो खत्म होने के महज 30 मिनट पहले यह हादसा हो गया।
इससे पहले आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में पुष्करम उत्सव में स्नान के दौरान भी एक हादसा हुआ था। जिसमें 13 महिलाओं समेत 29 लोगों की मौत हो गई। मध्यप्रदेश के सतना जिले के प्रसिद्ध तीर्थस्थल चित्रकूट में कामतानाथ मंदिर की परिक्रमा करते हुए अचानक भीड़ में भगदड़ मच जाने से 10 र्शद्घालुओं की मौत हो गई थी। इस के पहले दतिया जिले के प्रसिद्घ रतनगढ़ माता मंदिर में नवमीं पूजा के दौरान  पुल टूटने की अफवाह से मची भगदड़ से 115 लोग मारे गए थे। इसी मंदिर में 3 अक्टूबर 2006 को शारदेय नवरात्रि की पूजा के दौरान हुए हादसे में भी 49  लोग मारे गए थे। फरवरी 2013 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में भी एक हादसा हुआ था, जिसमें 36 लोग मारे गए थे। मथुरा के बरसाना और देवघर के श्री ठाकुर आश्रम में मची भगदड़ से लगभग एक दर्जन श्रद्धालू मारे गए थे।
ऐसे तमाम हादसों से एक ही बात साबित होती है कि भीड़ प्रबंधन के मामले में हमारा प्रशासन- तंत्र न केवल अक्षम है, बल्कि उसकी अकुशलता के चलते लोग बेमौत मारे जा रहे हैं। ऐसे में हमें खुद के स्तर पर भी जागरूक होने की जरूरत है। हालांकि ऐसे हादसों के बाद हम दोष भीड़ और आस्था को देते हैं, पर अपनी हरकतों और लापरवाही पर ध्यान नहीं देते। हम यह भूल जाते हैं कि धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम खुद से भी शालीनता और अनुशासन का परिचय दें। जहां यह नहीं होता वहां हादसे तो होते ही हैं। अफसोस की जो लोग जश्न मना रहे थे, वे दूसरों के नकारेपन के चलते असमय मारे गए। ऐसे हादसों के दोषियों को कड़ी सजा मिले और दूसरे उससे सीख लें, इससे भला गुरेज किसे होगा।

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