साहित्य - संस्कृति

‘ मजदूरों से प्रेम करना ही सही मायने में देशप्रेम है ‘

कविता पाठ करते बृजेश यादव

उना आंदोलन के समर्थन में जन संस्कृति मंच और बुद्धिष्ट सोसायटी ने किया  कविता पाठ और परिचर्चा का आयोजन

रामनरेश
नई दिल्ली, 23 जुलाई. जन संस्कृति मंच और बुद्धिष्ट सोसायटी की तरफ से उना आंदोलन के समर्थन में सुल्तानपुरी आंबेडकर पार्क में 21 जुलाई की शाम 4 बजे कविता पाठ और परिचर्चा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुवात में लोगों ने एक दूसरे को अपना परिचय दिया.

कवि शम्भू यादव ने कविता पाठ की शुरुवात करते हुए अपनी कविता ‘ वे सम्हालते हैं दुनिया तथा ‘वे तीन जन’ का पाठ किया। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से मजदूरों की त्रासदी भरी दुनिया को सामने रखा। कहानीकार टेकचंद ने अपनी कविता ‘खतरनाक समय’ पढ़ा । उसमें ‘खामखाह नहीं लगते हमें लोग, उनके लौटने का खटका … उनके जैसा न होने के जुर्म में, जैसी पंक्तियों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया । दूसरी कविता देर से जीवन मिला हमें, हमारे बच्चे डेर से जवान होंगे , लेकिन कायदे से जवान होंगे ‘ के माध्यम से दलित समाज में होने वाले ऐतिहासिक और स्थायित्व वाले परिवर्तन के प्रति आस्वस्त किया। कवि संजीव कौशल ने ‘देशप्रेम के मायने’ शीर्षक कविता के माध्यम से कहा ‘करना है तो इन्हीं से करो प्रेम। उन्मादी देश प्रेम के इस दौर में यह कविता देशप्रेम का असली मायने बताती है। कविता की प्रस्तावना है कि मजदूरों से प्रेम करना ही सही मायने में देशप्रेम है।
कवयित्री अनुपम सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से कहा ‘मेरे बच्चे कभी मत देखना देवताओं की ओर, पीछे समय से संवाद करना’ दूसरी कविता नीद और जागरण में कहा ‘ नहीं है मेरे पास कोई रक्षा कवच, मैं बिना आँख वाली औरत , अब तक जिनको शांति के लिए पूजती रही वही युद्ध के लिए तैयार हैं।’ इन कविताओं के माध्यम से वर्तमान और इतिहास के प्रति अपनी भावी पीढ़ी को सचेत किया। कवियित्री सुनीता ने ‘मैं लिखना चाहती हूँ और ‘हम गुनाहगार औरतें’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया और इनके माध्यम से दलितों और महिलाओं के ऊपर हो रहे हमले के प्रति अपना प्रतिरोध दर्ज किया।

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कविता की अपनी विशेष शैली के लिए प्रसिद्ध कवि बृजेश यादव ने अपनी कविता ‘ कब आएंगे गाने वाले’ का सस्वर पाठ करके लोगों को मंत्रमुगद्ध कर दिया तथा ‘जियो बहादुर निक्करधारी’ के माध्यम से मनुष्यविरोधी फासीवादी शक्तियों के षड़यंत्र को उजागर किया। उनकी कविताओं में वर्तमान और भविष्य को बचाने की चिंता अभिव्यक्त हुई। कवि जगदीश ने ‘राम लला हम आएंगे’ के माध्यम से पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद के गठजोड़ से बनने वाली स्थितियों के प्रति चेतनासम्पन्न व्यंग्य किया .
उभरते हुए चर्चित युवा कवि अदनान ने ‘1992’ और ‘वे जमा होंगे एक दिन’ जैसी कविताओं के माध्यम से साम्प्रदायिकता की अनवरत चल रही परियोजना की ओर ध्यान आकर्षित करके स्रोता समुदाय को संवेदना की गहराई तक पहुंचा दिया। लावनी गाने के लिए प्रसिद्ध कवि सतवीर श्रमिक ने अपनी कविताओं को गाकर सुनाया और वर्तमान परिस्थिति को बदलने के लिए आज़ादी की दूसरी लड़ाई को प्रस्तावित किया । कवि रोशन ने अपनी कविताओं के माध्यम से गौतम बुद्ध के सामाजिक सांस्कृतिक अवदान को याद किया। राम सिंह, राजवर्त ने भी अपनी अपनी कविताओं का पाठ किया और उना आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए बदलाव की इस सांस्कृतिक मुहीम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

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साक्षी ने अपनी कविताओं के माध्यम से दलित और सवर्ण स्त्री के सामंती शोषण को सामने रखा. कई शैलियों में कविता लिखने और गाने के लिए प्रसिद्द कवि मृत्युंजय ने ‘बंद करो, बंद करो, बंद करो यह विकास ’ तथा ‘ बम बम लहरी ’ और बेताल के पद- बिक्रम मरघट बनि गा देश का पाठ किया. इन कविताओं के माध्यम से उन्होंने विनाशकारी विकास के खिलाफ आम जन की प्रतिरोधी एकता को व्यक्त किया.

कार्यक्रम के परिचर्चा वाले सत्र में आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम और भी जगहों पर आयोजित होने चाहिए. उन्होंने कहा कि आज टेलीविजन की संस्कृति हमारी सबसे बड़ी दुश्मन हो गयी है. ये सिर्फ यौन हिंसा और उन्माद परोस रहे हैं। कहीं और जाने की जगह नहीं है। इस तरह की संस्कृति के खिलाफ लड़ाई एक बड़ी लड़ाई है। जो सच्चाइयां छुपा दी जाती हैं ये कवितायेँ उनको उजागर करती हैं. जो कवितायेँ यहाँ पढ़ी गयीं उन कविताओं में सपने थे। सपना अभी जिन्दा है. अच्छे दिनों की कल्पना को जिन्दा रखना जरुरी है। आजादी के साथ देश बटवारे को भी याद रखना चाहिए. किसी को अंदाज नहीं था कि इस बंटवारे में 10 लाख लोग मारे जायेंगे. बंटवारे की यह प्रक्रिया अभी भी वह जारी है। सत्ताधारी शक्तियां धर्म के आधार पर समाज को बाँट रही हैं.  विभाजन के समय जो हुआ उसके लिए माहौल पहले से तैयार किया गया था. लोग हत्या और हिंसा के लिए पहले से तैयार किए गए थे। गुजरात में भी इसी तरह की तैयारी थी। कुछ भी अचानक नहीं हुआ वहां इस एहसास को लोगों तक ले जाना जरूरी है। यह काम बहुत बड़ी लड़ाई है. यहीं से हमें यह लड़ाई लड़नी है। कवितायेँ जब पढ़ी जा रहीं थीं तो विद्रोही की याद आ रही थी. उनको लागतार हाशिये पर डाला गया। लेकिन कविताओं में विद्रोही मौजूद हैं.

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परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए युवा आलोचक अतुल सिंह ने कहा कि इस तरह के आयोजन के लिए आप सब को बधाई। कविता को जहाँ पहुँचाना चाहिए वहां पहुँचने का उपक्रम है यह कार्यक्रम. हमारे पास संवाद स्थापित करने का माध्यम कहानी और कविता ही है. उना आंदोलन पिछले साल जो घटा वह भारतीय राजनीति की बड़ी घटना है। यह आंदोलन, जो भारतीय राजनीति में ठहराव आया हुआ था उनको तोड़ता है। इस आन्दोलन में प्रतिरोध का तरीका नया था। इस आंदोन का प्रभाव यह है कि मायावती जी को अपना स्तीफा देना पड़ गया. आज की जो कवितायेँ पढ़ी गयी। उनमे अनुपम की कवितायेँ कविता के नए भूगोल की तरफ ले जाती हैं। प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कार्यक्रम को अपने कैमरे के माध्यम से दस्तावेजित किया. कार्यक्रम का सञ्चालन राम नरेश ने किया . इस कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से आयोजित किया सत्यप्रकाश बौद्ध जी ने. इंदिरागांधी शारीरिक शिक्षा कालेज के प्रो. राजबीर सिंह, बुद्धिस्ट सोसायटी के संचालक , राम सिंह , राजवर्त, रोशन, कवि शम्भू यादव तथा स्थानीय श्रोता मौजूद थे. इसमें महिलाओं की भागीदारी ने कार्यक्रम को और भी सार्थक बना दिया.