Templates by BIGtheme NET
Home » विचार » मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है: रामजी राय
marx and our time 3

मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है: रामजी राय

गोरखपुर। मार्क्स ने मुनष्य को एक समुच्चय में नहीं एक सम्पूर्ण इकाई के रूप में समझा और कहा कि वह एक ही समय में आर्थिक, राजनीतिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक होता है। उसे टुकड़ो-टुकड़ों में अलग-अलग नहीं देख सकते। सम्पूर्णता की अवधारणा मार्क्स की यह अवधारणा उस समय के दर्शन में मौजूद नहीं थी। मार्क्स का चिंतन सिर्फ आर्थिक चिंतन नहीं सम्पूर्ण मनुष्यता का चिंतन है।

यह बातें समकालीन जनमत के प्रधान सम्पादक रामजी राय ने आठ जून की शाम गोरखपुर के गोकुल अतिथि भवन में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित ‘ मार्क्स और हमारा समय ’ विषयक संगोष्ठी में व्यक्त किया। यह आयोजन कार्ल मार्क्स के जन्म के़ि द्विशतवार्षिकी के आयोजनों की श्रृंखला के तहत किया गया था।

संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरूआत मार्क्स के भारत के बारे में व्यक्त किए गए विचारों से की। उन्होंने कहा कि मार्क्स ने 1853 में ही भारत के बारे में लिखना शुरू कर दिया था क्योंकि वह उपनिवेशवाद और पूंजीवाद के बारे में सोच रहे थे और इसलिए भारत के बारे में सोच रहे थे। जो पूंजीवाद अपने को बहुत उदारवादी और कानून का राज वाल पेश करता है, अपने उपनिवेशों में चरम बर्बरता और पांखड के लिए जाना जाता है। भारत में ब्रिटिश शासकों ने यही किया।

marx and our time

मार्क्स ने ‘ कैपिटल ‘ में लिखा है कि उस वक्त दुनिया का सोना चलकर भारत आता तो था, लेकिन यहां से बाहर नहीं जाता था। भारत उस समय आयातक नहीं निर्यातक देश था। भारत उस समय सूत्री वस़्त्रों की जन्मस्थली थी। विदेशी इतिहासकार लिखते हैं कि सामान से भरे जहाज जब विदेशी तटों पर उतरते थे ऐसा लगाता था कि मानो कि तोप के गोले आ गए हों। अंग्रेजी शासन ने उत्पादन के इन सभी स्रोतों को नष्ट कर दिया। मार्क्स लिखते हैं कि औपनिवेशिक भारत में बुनकरों की हड्डियां बिखरी हुई हैं।

वह यह भी लिखते हैं कि भारत इसलिए गुलाम है क्योंकि वह जातियों में बंटा हुआ है। मार्क्स ने कहा कि भारतीय अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गए तो उन्हें आजाद होने से कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने 1857 के विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा।

रामजी राय ने कहा कि मार्क्स सही मायने में विश्व चिंतक थे। ज्ञान के क्षेत्र को जो सीमाओं में बांटता है वह कट्टरता और संकीर्णता को को जन्म देता है।

उन्होंने कहा कि अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले तक मार्क्स जर्मनी के मजदूरों और रूसी बुद्धिजीवियों में काफी लोकप्रिय थे लेकिन लंदन जहां उन्होंने आधी जिंदगी गुजारी, वहां के बौद्धिक परम्परा का अंग नहीं बन पाए थे। उस वक्त वहां हरर्बट स्पेन्सर को अरस्तु के बराबर समझा जाता था लेकिन 1883 में मृत्यु के बाद मार्क्स जबर्दस्त रूप से उभर कर सामने आए और उनका 20वीं सदी के सबसे बड़े चिंतक के रूप में उदय हुआ। सोवियत संघ के पतन के बाद मार्क्स कुछ समय के लिए गुमानमी के अंधरे में चले गए और समाजवाद की मृत्यु और ग्लोबलाइजेशन के जन्म व पूंजीवाद के विजय का सोहर गान शुरू हो गया लेकिन जल्द ही एक दशक के अंदर 2007-2008 आते-आते पूंजीवाद संकट में फंस गया और 1930 की तरह मंदी का दौर शुरू हो गया। यह संकट आया तो एक बार फिर मार्क्स को नए सिरे से समझने का दौर शुरू हुआ। फ़्रांस के राष्ट्रपति से लेकर पोप तक ने मार्क्स को पढ़ना शुरू कर दिया।
ऐसा इसलिए है क्योंकि मार्क्स के बगैर अपने समय को समझना मुश्किल है और मार्क्स के बगैर नए समाज की परिकल्पना भी संभव नहीं है। शूम्पीटर ने कहा कि यह जो विकास है वह ‘ अनंत सृजनात्मक विनाश ’ है। मार्क्स ने कम्युनिस्ट मेनीफेस्टो में इसका संकेत कर दिया था। इसमें उन्होंने पूंजीवादी समाज का चित्र खींचते हुए कहा कहा था कि यह अंतहीन संकटों से गुजरने वाली, बड़े-बड़े संकटो को जन्म देने वाली व्यवस्था है। यह लोभ-लाभ और शोषण की व्यवस्था है। इसको बचाने का कोई रास्ता नहीं है। इसका अंत ही इसका समाधान है।

श्री राय ने थामस पिकेटी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि दो विश्वयुद्धों को समय को छोड़कर ऐसा कोई समय नहीं है जब जनता संकट में रही हो और पूंजीपतियों का मुनाफा कम हुआ हो। पूंजीपतियों का मुनाफा निरंतर बढ़ता गया है और समाज में अमीरी-गरीबी की खाई भी निरन्तर बढ़ती गई है। पिकेटी इसका समाधान यह सुझाते हैं कि मुनाफा कमाने वालों पर भारी टैक्स लगाया जाय लेकिन इससे भी बात बन नही सकती और अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई को कम नहीं किया जा सकता। भारत में 57 फीसदी पूंजी एक प्रतिशत लोगों के हाथ में संकेन्द्रित हो गई है। पूँजी का संकट बढ़ता जा रहा है और वह अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। इसको नष्ट होना ही है। मुक्तिबोध ने अपनी कविता में -‘ तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ, तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ ’  में बहुत ठीक से व्यक्त किया है।

उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर पूँजीजीवादी लूट को देखना हो तो झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीसा के आदिवासी इलाकों में जाकर देखिए। इन प्रदेशों में आबादी की आबादी विकास के नाम पर विनाश के मुंह में धकेल दी गई है। तूतीकोरिन के लोगों ने तांबा गलाने वाली फैक्टी के प्रदूषण से हो रही बीमारियों और मौतों पर सवाल उठाया, विरोध-प्रदर्शन किया तो राज्यसत्ता ने पुलिस से गोली चलवाकर उनकी हत्या कर दी।

मार्क्स ने पहले ही चेताया था कि पूंजीवाद सिर्फ मेहनतकश लोगों का ही शोषण नहीं करता बल्कि प्रकृति और पर्यावरण का भी नाश कर देेता है। उन्होंने कहा कि मार्क्स ने कहा था कि पुरूष और औरत के बीच सम्बन्ध, आदि और प्राकृतिक है और पहला श्रम विभाजन भी पुरूष और औरत के बीच हुआ और धरती पर पहला उत्पीड़न पुरूष द्वारा स्त्री का किया गया। किसी भी समाज को समझना है कि वह इतिहस की किस अवस्था में है तो स्त्री-पुरूष का सम्बन्ध कैसा है, इसको जानना चाहिए। यदि स्त्री-पुरूष का सम्बन्ध शोषण, दमन, बलात, भोग, झूठ पर आधारित है तो पुरूष-पुरूष के बीच और पूरे समाज का प्रकृति के सम्बन्ध भी ऐसा ही होगा। वर्तमान समाज इसी की कीमत चुका रहा है।

उन्होंने कहा कि मार्क्स ने जोर दिया था कि द्वंद्वाद से दुनिया को समझ सकते हैं लेकिन पूरी तरह समझ नहीं सकते क्योंकि वह गतिमान है। हम अपने समय का अध्ययन करें और जो भी निष्कर्ष निकल रहे हैं, उसमें पूर्व निष्कर्ष को बाधा न बनने दें और सत्ता के आंतक से झुके नहीं क्योंकि सत्य को सत्ता से हमेशा युद्ध करना पड़ा है। आजादी, सत्य की सेज सूली पर है।

marx and our time 2

उन्होंने कहा कि मार्क्स का कथन कि ‘ धर्म जनता के लिये अफीम’ है ’ कि गलत व्याख्या की जाती है। मार्क्स का यह मुहावरा एक पैराग्राफ के अंत में आता है, जिसमें कहा गया है, ”धार्मिक पीड़ा एक ही साथ वास्तविक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है, और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिवाद भी है. धर्म उत्पीड़ित मनुष्य की आह है, हृदयहीन विश्व का हृदय है, और निष्प्राण स्थितियों की आत्मा है. यह जनता के लिये अफीम है। ” मार्क्स ने धर्म को उल्टी विश्वचेतना कहा।

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि मार्क्स ने जीवन के प्रत्येक पक्ष पर विचार किया और उस पर रोशनी डाली हं। उन्होंने संभावनाओं के अनंत द्वार खोले।  संगोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने किया।

About गोरखपुर न्यूज़ लाइन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*