जनपद

मुस्लिम पर्सनल लॉ में संशोधन का हक न हुकूमत को और न ही उलेमा को : मुफ्ती जैनुल इस्लाम

 

सैयद फरहान अहमद

गोरखपुर, 8 अप्रैल। शुक्रवार देर रात एमएसआई इंटर कालेज के प्रांगण में आयोजित एक कार्यक्रम में मुस्लिम धर्मगुरुओं ने साफ तौर पर कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ और तीन तलाक में एक नुक्ता भी बदलने की गुंजाइश नहीं हैं। यह रब का कानून हैं। हुकूमत और पूरी दुनिया के सारे उलेमा मिलकर भी इस्लामी कानून में बदलाव नहीं कर सकते हैं।

इदारा नसरुल कुरआन के तत्वावधान में एमएसआई इंटर कालेज बक्शीपुर में  ‘तलाक की शरई हैसियत और मुस्लिम पर्सनल लॉ ’ विषय पर आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता  दारुल उलूम देवबंद के मुफ्ती जैनुल इस्लाम इलाहाबादी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ दरहकीकत उन कवनीन को कहा जाता हैं जो मुसलमानों के कानूनी मसाइल से मुत्ताल्लिक होते हैं और इस मसाइलों में सिर्फ निकाह और तलाक ही शामिल नहीं हैं। बल्कि वसीयत, विरासत, बच्चों की परवरिश का मसला, औरतों के भरण पोषण का मसला और औकाफ का मसला भी इसमें शामिल हैं। यह वह मसाइल हैं जिसको हिन्दुस्तान के आजाद होने से पहले दस्तूरे हिंद में जमानत दी गई थीं कि मुसलमान अपने पर्सनल लॉ में अमल पैंरा करने के लिहाज से पूरे तौर पर आजाद होंगे । मुसलमानों का पर्सनल लॉ इस्लामिक कानून का एक हिस्सा हैं। पर्सनल लॉ हिन्दुस्तानी दस्तूर के कानून का एक हिस्सा है।

उन्होंने कहा तीन तलाक का मिस यूज हो रहा है जिसके नतीजे में तमाम बातें पैदा हो रही हैं। कुरआन व हदीस में तलाक देने का सिंपल तरीका हैं। किसी अन्य अहम मसले में उतना आसान नमूना आप पेश नहीं कर सकते हैं। इस्लाम में तलाक के तीन तरीके दिए गए है। पहला तलाक-ए-अहसन है। जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। अच्छी बात यह है कि इद्दत तक अगर दोनों में समझौता हो जाता है तो दोनों फिर से अपनी जिंदगी शुरू कर सकते हैं। इद्दत के बाद उनको फिर से निकाह करना होगा। इस्लाम में तलाक का सबसे बेहतर तरीका तलाक-ए-अहसन है। इसके बाद तलाक-ए-हसन। इसमें पति तीन अलग-अलग समय में पत्नी को तलाक देता है। इसमें भी तलाक-ए-अहसन की तरह फिर से निकाह किया जा सकता है।तीसरा तलाक-ए-सलासा (तीन तलाक) को इस्लाम में हराम करार दिया गया है। लेकिन यह शरीयत का हिस्सा हैं। जिसे बदला नहीं जा सकता हैं।

मुफ्ती हम्जा  ने स्पष्ट रूप से कहा कि तीन तलाक को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। तीन तलाक  पर पाबंदी लगाना शरीयत में दखलंदाजी करना हैं जो किसी भी कीमत पर संभव नही हैं।

उन्होंने कहा कि कई उदाहरण ऐसे भी सामने आए हैं जिसमें तीन तलाक ने कई महिलाओं को जीवन बचाया है। उन्होंने कहा कि इस वक्त इस्लाम को बदनाम करने के लिए तीन तलाक को मुद्दा बनाया जा रहा है। भोपाल में लागू नियम का उदाहरण देते हुए उक्त तरह के नियम की जरुरत बतायी कि निकाह और तलाक रजिस्टर्ड होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस नियम पर फैसला लेने का हक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को हैं। उन्होंने एक पार्टी विशेष पर तीन तलाक पर प्रोपगंडा करने का आरोप मढ़ा। उन्होंने लोगों के सवालों के जवाब भी दिए।

इस मौके पर मदीना मस्जिद के खतीबों इमाम मौलाना अब्दुल्लाह बरकाती ने कहा कि कुरआन में साफ तौर पर बयां किया गया है कि तलाक से पहले रिश्ते को बचाने के लिए सभी कोशिशें करनी चाहिए। महिलाएं अदालत का दरवाजा न खटखटा कर दारुल उलूम, दारुल कजा में आयें उन्हें इंसाफ मिलेगा। शरई अहकाम पर मुसलमान अमल पैरा हो जायें तो सारी परेशानियां ही खत्म हो जायें।

सेमिनार में जमाते इस्लामी हिंद के अब्दुल करीम ने कहा कि तीन तलाक पर पाबंदी लगाकर शरीयत में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने सभी से अपील किया कि सभी मुसलमान शरीयत पर पाबंदी से अमल करें तो कोई दिक्कत नहीं आयेगी।

इस मौके पर शहर काजी वलीउल्लाह,  महमुदुर्रहमान, खालिद रजा आजमी, गुफरान अहमद, मोहसिन खान, आसिफ, खालिद मौजूद रहे। बड़ी संख्या में औरतों ने भी हिस्सा लिया।

Add Comment

Click here to post a comment