साहित्य - संस्कृति

याद की गयीं बेगम हामिदा हबीबुल्लाह

लखनऊ, 19 मार्च। बेगम साहिबा के नाम से मशहूर बेगम हामिदा हबीबुल्लाह को 19 मार्च को यहां प्रेस क्लब में इंसानी बिरादरी द्वारा आयोजित शोक सभा में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने खिराजे अकीदत पेश की। सभा का संचालन वरिष्ठ वकील अमीर हैदर ने और संचालन सृजनयोगी आदियोग ने किया ।

शोक सभा की शुरूआत इंसानी बिरादरी के इस बयान से हुई कि बेगम हामिदा हबीबुल्लाह का नाम लखनऊ की पहचान में शामिल था। वह अवधी तहजीब की अलमबरदार और इंसानी क़द्रों की मिसाल थीं। तालुक्केदार घराने से थीं, सियासत में लंबा समय गुज़ारा, विधानसभा और राज्य सभा में रहीं लेकिन उसके रूआब से बहुत दूर थीं। नफीस तबीयत की और तहदार जुबान की मालकिन थीं। ख़ास लोगों के बीच भी ख़ास थीं और कमाल यह कि गुरूर का कहीं से कोई छींटा भी नहीं। बड़ा होते हुए बड़ा होने के अहसास से अनजान। इस फितरत ने उन्हें आम लोगों की चाहतों, मुश्किलों, जरूरतों के साथ खड़ा कर दिया। गरीबों, दुखियारों, जरूरतमंद महिलाओं और विकलांगों का मसीहा बना दिया। ऐसी अजीम शख्सियत को बारहा सलाम….

शोक सभा में जनवादी महिला समिति की आशा मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कपूर, उबैद नासिर और हसीब सिद्दीकी, इंडियन वर्कर्स यूनियन के मोहम्मद मसूद समेत बेगम साहिबा की पौत्रवधू ज्योत्सना कौर हबीबुल्लाह और उनकी सचिव रहीं अफसर जहां ने उनके समाजी सरोकारों और अनूठे कामों का जिक्र किया। इस बेमिसाल किरदार को याद करते हुए उनकी जिंदादिली और दरियादिली की तस्वीर खींची।

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शोक सभा में प्रस्ताव आया कि किताब की शक्ल में बेगम साहिबा की जीवनी प्रकाशित हो, उनके नाम से ट्रस्ट बने और जो वंचित समाज के लोगों, ख़ास कर महिलाओं और बच्चों के हित में काम करे, उनकी याद में सालाना लेक्चर सिरीज की शुरूआत हो और बाराबंकी स्थित उनके पैत्रिक गांव सैदनपुर को जाती लिंक रोड उनके नाम किये जाने की मांग हो।

शायर सैफ बाबर ने उनके नाम शेर पढ़ा- सांसें नहीं हैं ज़िंदा मगर काम से तो है, वो याद सबको अपने किसी काम से तो है। सभा में रफत फातिमा, मोहम्मद अहसान, राजीव यादव, संजोग वाल्टर, वीरेन्द्र त्रिपाठी, शरद पटेल, तारिक सिद्दीकी, राजीव ध्यानी, वीरेन्द्र कुमार गुप्ता आदि सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे।

 

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