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लोकरंग संगोष्ठी में नव लोक संस्कृति के निर्माण का आह्वान

जोगिया (कुशीनगर), 12 अप्रैल। लोकरंग के दूसरे दिन दोपहर में ‘ हाशिए का समाज और लोक संस्कृति ’ विषय पर गोष्ठी हुई जिसमें साहित्याकारों, लेखकों, संस्कृति कर्मियों ने अपने विचार प्रकट किए।
गोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो चैथी राम यादव ने कहा कि श्रम करने वाला ही संस्कृति का निर्माण करता है। लोक संस्कृति जीवन के अनुभव पर आधारित है और सहज है। यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति साहित्य को लोक साहित्य कहा। दुर्भाग्य से हिन्दी का मौलिक आलोचना का शास्त्र विकसित नहीं हुआ जिसके कारण लोक की दृष्टि से समीक्षा नहीं हुई। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक की चिंता से साहित्य को देखा। लौकिक प्रतिमान बनाने पर सगुण-निर्गुण सब उसके दायरे में आ गया। निर्गुण भक्ति आंदोलन जाति के खिलाफ लड़ने वाला सबसे बड़ा आंदोलन था। निर्गुण और सूफी साहित्य प्रगतिशील साहित्य का पहला चरण है।
वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि अतीत की संस्कृति नष्ट हो रही है, उसमें क्षरण हो रहा है। लोक संस्कृति में सब कुछ प्रगतिशील नहीं होता। हमें लोक संस्कृति में प्रगतिशील तत्वों को लेते हुए नव लोक संस्कृति का निर्माण करना होगा जो बहुसंख्य जनता के मुक्ति के लिए जरूरी है।
आदिवासी साहित्य के विशेषज्ञ एके पंकज ने संकट हाशिए के समाज का नहीं वर्चस्वशाली अभिजनों का है और उन्होंने ही हमारे संकट का एजेंडा पेश किया है। हम हाशिए पर नहीं मुख्य धारा में है। हमें अपने को हाशिए का समाज कहना बंद करना होगा क्योंकि प्रत्येक शब्द एक पोलिटिकट थाट की उपज है। हमें खण्ड-खण्ड में देखना बंद करना है क्योंकि पूरा जीवन एक दूसरे से गूंथा हुआ है। उन्होंने आदिवासी संस्कृति को आदर्श बताया।
इसके पहले बीज वक्तव्य देते हुए कथाकार सृंजय ने कहा कि लोक साहित्य समानता, साम्य का हिमायती है। लोक और शास्त्र में आवाजाही होते रहना चाहिए। लोक, शास्त्र को समृद्ध करता है। हाशिए का समाज ही संस्कृति और सभ्यता का सर्जक है।
अलवर से आयी डा सर्वेश जैन ने कहा कि महिलाए चाहें हाशिए के समाज की हों या अभिजन समाज की, दोनो जगहों पर वह हाशिए पर ही हैं। रंगकर्मी दीपक सिन्हा ने
सवाल उठाया कि क्या कारण है कि नाटकों की महिला पात्र सेकुलर हैं और पुरूष धर्म की ध्वजा उठाए घूम रहे हैं।
अन्तर्राष्टीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के हिन्दी विभाग के प्रो शंभू गुप्त ने अंधलोकवाद संस्कार के रूप में बचा हुआ है। जरूरत लोक संस्कार की संरचना, स्वरूप और संवेद को बदलने की है। रामजी यादव ने कहा कि लोकसाहित्य में संघर्ष से निकली धारा हमारे काम की है। लोकसंस्कृति में सभी को लेने के बजाय चयन करना पड़ेगा और मनुष्य को बराबरी की तरफ प्रेरित करने वाले साहित्य को जनता के बीच ले जाना होगा। अपसंस्कृति के खिलाफ समानान्तर ताकतवर जन संस्कृति को खड़ा करना होगा। सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत ने कहा कि आज संघर्ष का अराजनीतिकरण किया जा रहा है, जिससे सतर्क रहने की जरूरत है। भाग्यवाद के विरूद्ध बौद्विकता मुख्या धारा में हो, इसकी लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे तैयब हुसैन ने आलेख पढा और कहा कि जिस बात को दबाया गया, उसे लोकसाहित्य ने जगह दी।
गोष्ठी में अनिल विश्रांत, कहानीकार शिवकुमार, पत्रकार मनोज कुमार सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता शाह आलम, अखिलेश्वर पांडेय ने भी अपनी बात रखी।
संचालन महेन्द्र कुशवाहा ने किया।

कार्यक्रम शुरू होने के पहले हिरावल पटना के संतोष झा ने त्रिलोचन की कविता ‘ पथ पर चलते रहो निरंतर’  और वीरेंद्र डंगवाल की कविता ‘ इतने भले मत बन जाना साथी ……’ गाकर सुनाया।

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