साहित्य - संस्कृति

व्यवस्था की त्रासदी को समझने और उसे बदलने की बेचैनी नजर आई कविताओं में

मुक्तिबोध स्मृति दिवस पर जसम की ओर से 18 कवियों का कविता-पाठ

राजेश कमल

पटना, 11 सितंबर. आज जन संस्कृति मंच की ओर से हिंदी के प्रख्यात कवि मुक्तिबोध के स्मृति दिवस के अवसर पर आईएमए हाॅल, पटना के सभागार में युवा कवियों के कविता पाठ का आयोजन किया गया, जिसका संचालन कवि राजेश कमल ने किया।
इस आयोजन में आशिया, विक्रांत, शशांक मुकुट शेखर, सुधाकर रवि, शोभित श्रीमंत, प्रिंस कुमार मिश्रा, सत्यम, सना, कुमार राहुल, कृष्ण सम्मिद्ध, विकास, अस्मुरारी रंजन मिश्र, सुनील श्रीवास्तव, उपांशु, उत्कर्ष यथार्थ, ऋचा, अंचित और सुधीर सुमन ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

इन कविताओं पर बोलते हुए कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा कि इनमें हमारे समय का स्वर है। यह ऐतिहासिक मौका है, जब पटना में अठारह कवियों को एक साथ सुनने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि जो कविताएं पाठक की संवेदनाओं का हिस्सा बन जाएं, वही कविताएं अच्छी होती हैं। इन कवियों ने शब्दों के नए इस्तेमाल और नए मुहावरे रचने की कोशिश भी की है। व्यवस्था की त्रासदी को समझने और उसे बदलने की बेचैनी अधिकांश कविताओं में नजर आती है।

समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि हमारा समय भाषा और रचना दोनों में अपने बच्चों के मुंह से बोलता है। आज जिन कवियों ने कविताएं पढ़ीं वे बिहार से आने वाले हिंदी के भविष्य के कवि हैं। कई कविताएं चेतन की नहीं, अवचेतन की ओर से लिखी हुई लग रही हैं। इन सारे कवियों को अपना अभ्यास जारी रखना चाहिए, अपनी राह पर कायम रहना चाहिए, क्योंकि राह बहुत कठिन है।
शायर संजय कुमार कुंदन ने कहा कि आज के आयोजन में पढ़ी गई कविताओं में हमारे समय की बेचैनियां अधिक हैं। हमें ऐसा समाज रचने की जरूरत है जहां प्रेम की स्वछंदता हो। कवियों को व्याकरण संबंधी त्रुटियों से बचना चाहिए।
गजेंद्र शर्मा ने कहा कि इन सारे कवियों में समकालीनता है। गांव की संस्कृति का रंग इनमें है। इनमें ग्रामीण समाज में प्रचलित शब्दों का उपयोग किया गया है।
जसम के राज्य सचिव कवि-आलोचक सुधीर सुमन ने कहा कि इन कविताओं में अपनी जड़ों से उखड़ने और अपने गांवों से बिछड़ जाने की कसक भी है और नगर में अपने अस्तित्व और पहचान की जद्दोजहद भी। इनमें सांप्रदायिक विभाजन, अशांति, उन्माद, हिंसा, अकेलापन, बच्चों की मौत, किसानों की आत्महत्या आदि के संदर्भ हैं.  बकौल मुक्तिबोध इनमें फिक्र से फिक्र लगी हुई है। इनमें हिंदू-उर्दू यानी हिंदुस्तानी भाषा का इस्तेमाल हुआ है, यह चिह्नित करने लायक है। धन्यवाद ज्ञापन भी सुधीर सुमन ने किया।
आयोजन की शुरुआत में कन्नड़ की चर्चित पत्रकार गौरी लंकेश को श्रद्धांजलि दी गई। इस मौके पर रंगकर्मी संतोष झा, अभिनव, समता राय, नवीन, अभ्युदय, कौशलेंद्र आदि मौजूद थे।