विचार

समान शिक्षा प्रणाली को लागू करने का संघर्ष

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डॉ संदीप पांडेय (प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता )

मैंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले जिसके तहत सरकारी व्यवस्था में काम करने वाले सभी लोगों को अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही अनिवार्य रूप से पढ़ाना चाहिए को लागू कराने के लिए गांधी प्रतिमा, हजतरगंज, लखनऊ में चल रहे अपने अनशन को दसवें दिन किसी आश्वासन पर नहीं बल्कि अपने साथियों व देश की जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं जैसे न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर, मेधा पाटकर, कुलदीप नैयर, डाॅ. जी.जी. पारिख, योगेन्द्र यादव, आनंद कुमार, राजेन्द्र सिंह, पी.वी. राजगोपाल, सुनीलम, रवि किरण जैन, विजय प्रताप व स्थानीय और देश भर के सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के अपने सहकर्मियों के दबाव में वापस लिया है। पहले न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर के कहने पर मुख्य मंत्री अखिलेश यादव ने मुझे मिलने का समय दिया जिस वार्ता का कोई परिणाम न निकलने पर जनता दल (यू.) के अनील हेगडे के प्रयासों से कुलदीप नैयर की मुलायम सिंह यादव से वार्ता के पश्चात मेरा मुलायम सिंह यादव से फोन पर संपर्क हुआ जिसमें मिलकर इस विषय पर बातचीत करना तय हुआ। यह बैठक अभी होनी शेष है। दिल्ली से आम आदमी पार्टी के विधायक पंकज पुष्कर ने आकर मेरा अनशन समाप्त कराया। किंतु इसकी उम्मीद कम ही है कि उच्च न्यायालय के 18 अगस्त, 2015 का फैसला लागू होगा।
नौकरशाहों की तरफ से जबरदस्त विरोध है। वे तो अपने बच्चों के लिए विशेष ’संस्कृति’ विद्यालय स्थापित करवा रहे हैं। वे शिक्षा व्यवस्था को उच्च न्यायालय के फैसले की मंशा की विपरीत दिशा में ले जाना चाह रहे हैं। फैसला आने पर उ.प्र. के बेसिक शिक्षा मंत्री राम गोविंद चैधरी ने अपनी नातिन का दाखिला सरकारी विद्यालय में करा दिया था व आई.ए.एस. अधिकारियों को एक पत्र लिख उन्हें भी अपने-अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में दाखिला कराने हेतु विचार करने के लिए कहा। नतीजा यह हुआ कि राम गोविंद चैधरी शिक्षा मंत्री पद से हटा दिए गए और उनकी जगह एह सेवा निवृत आई.पी.एस. और अब समाजवादी पार्टी के नेता अहमद हसन को बेसिक शिक्षा मंत्री बना दिया गया। आई.ए.एस. अधिकारियों की लाॅबी की ताकत को कम नहीं आंका जा सकता। लेकिन ऐसे समझदार आई.ए.एस. अधिकारी भी हैं, जैसे केरल के मूल की उ.प्र. कैडर में तैनात एस. मिनिस्थी, जो लखनऊ जैसे शहर में तमाम विकल्प होते हुए भी अपने बच्चों को केन्द्रीय विद्यालय में ही पढ़ाती हैं। वे मानती हैं कि एक सरकारी अधिकारी हाने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि सरकारी व्यवस्था को ही पोषित करें।
भारत में दोहरी शिक्षा व्यवस्था लागू है। पैसे वाले, यहां तक कि मजदूर वर्ग के भी जिनके पास कुछ अतिरिक्त आमदनी है, अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। ये बच्चे तो कुछ आगे निकल जा रहे हैं। किंतु सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले गरीबों के बच्चे जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं वे या तो किसी बिंदु पर विद्यालय से बाहर हो जाते हैं अथवा नकल वगैरह करके पढ़ाई पूरी करने पर भी बेरोजगारी या अर्द्ध-बेराजगारी की स्थिति में जीने के लिए मजबूर हैं।
न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने बड़े ही सटीक आदेश में यह कहा है कि जब तक जो इन विद्यालयों के संचालन के लिए जिम्मेदार हैं उनके खुद के बच्चे इन विद्यालयों में नहीं पढ़ेंगे तब तक इन विद्यालयों की स्थिति नहीं सुधरेगी। कुछ लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि किसी को कैसे मजबूर किया जा सकता है कि वह अपने बच्चों को कहां पढ़ाए? क्या बच्चे का कोई अधिकार है या नहीं? बच्चे पर कैसे कोई व्यवस्था थोपी जा सकती है? ये सवाल तो तभी तक हैं जब तक सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता खराब है।
किसी सरकारी व्यक्ति को हवाई यात्रा करनी हो तो उसके लिए एअर इण्डिया से यात्रा करना अनिवार्य है जबकि आमतौर पर एअर इण्डिया का टिकट निजी कम्पनियों से महंगा होता है। यह नीति एअर इण्डिया को जिन्दा रखने के लिए बनाई गई है। सरकारी विद्यालयों को गुणवत्तपूर्ण तरीके से चलाने के लिए ऐसी नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती? यदि सरकारी लोगों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में जाने लगेंगे और प्रत्येक विद्यालय की गुणवत्ता केन्द्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय जैसी हो जाएगी तो कौन नहीं चाहेगा अपने बच्चों को ऐसे विद्यालय में भेजना खासकर निजी विद्यालयों की तुलना में काफी कम खर्च पर। धीरे-धीरे लोग अपने आप निजी विद्यालयों में बच्चों को भेजना बंद कर देंगे। भारतीय संविधान में यह किसी मौलिक अधिकार में शामिल नहीं कि हम अपने बच्चे को अपने मनपंसद विद्यालय में पढ़ाएं। सरकार चाहे तो यह नीति बना सकती है कि सरकारी सेवा में काम करने की अनिवार्य शर्त होगी कि आप अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में पढ़ाएंगे।
जहां तक बच्चे पर थोपने की बात रही तो बहुत सारी अन्य चीजें जैसे उसकी जाति, धर्म, वर्ग, आदि तो उसकी मर्जी के बिना ही तय हो जाते हैं। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के अनुसार जब अमीर-गरीब के बच्चे साथ पढ़ेंगे को इससे सामाजिक समीकरण मजबूत होंगे। इससे सामाजिक क्रांति आएगी।
मुझे अनशन के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर जो समर्थन मिला उसकी उम्मीद नहीं थी। अब मुझे यह उम्मीद है कि जब कई अन्य राज्यों में भी इस मुद्दे पर चर्चा होने लगी है तो कहीं न कहीं तो यह जरूर लागू होगा।   एकदम अप्रत्याशित जो समर्थन मिला वह पड़ोसी विकासशील मुल्कों के संगठनों से था। बंग्लादेश के कपड़ा निर्माताओं का एपारल्स वर्कर्स फेडरेशन, श्रीलंका की कम्युनिटी डेवलेप्मेण्ट सर्विसेज, बंग्लादेश का नारीवादी संगठन ’जागो नारी,’ वियतनाम का सेण्टर फाॅर सस्टेनेबल कम्युनिटी डेवलेप्मेण्ट, बंग्लादेश का कोस्टल एसोशिएसन फाॅर सोशल ट्रांसफाॅरमेशन ट्रस्ट, बंग्लादेश का इक्विटी एण्ड जस्टिस वर्किंग ग्रुप व बंग्लाादेश की ही यूबीनिग (पाॅलिसी रिसर्च फाॅर डेवलेप्मेण्ट आॅलटरनेटिव) ने अनशन का समर्थन किया। न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने भी यह नहीं सोचा होगा कि उनके आदेश का असर सिर्फ भारत के गरीबों पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि दुनिया के गरीबों के लिए उसका महत्व है खासकर जहां समतामूलक समाज रचना के संघर्ष चल रहे हैं।
मैं इस लेख के माध्यम से उन सभी लोगों को धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने अनशन का समर्थन किया। अभी इस संघर्ष को इसके मुकाम का पहुंचाने के लिए सभी के समर्थन की और जरूरत पड़ेगी।