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हाँ, ज़ुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जाएँगे- प्रो चमनलाल

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जन संस्कृति मंच का 15वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन

सवर्ण संस्कृति लोकतंत्र से अपना प्रतिशोध चुका रही है- ज़्याँ द्रेज

व्यवस्था बदलने के लिए आंदोलनों को साझेदारी विकसित करनी होगी- कविता कृष्णन

पटना, 29 जुलाई.  जन संस्कृति मंच का 15वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन पटना में 29 -31 जुलाई को संपन्न हुआ। उद्घाटन सत्र विद्यापति भवन में हुआ जो बाहर और भीतर विभिन्न कवियों के कविता-पोस्टरों से सजा हुआ था जिनमें प्रगतिशील, लोकतांत्रिक प्रतिरोधी परम्परा के स्वर थे। सम्मेलन में दिल्ली, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि प्रदेशों से प्रतिनिधि शामिल हुए।

' हिरावल ' का गायन
‘ हिरावल ‘ का गायन

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र की शुरुआत हिरावल व अन्य साथियों के गायन से हुई। हिरावल के साथियों ने रमाकान्त द्विवेदी रमता की ‘क्रांति के रागिनी हम त गइबे करब’, मुक्तिबोध की ‘पूँजीवादी समाज के प्रति’ और त्रिलोचन की ‘पथ पर चलते रहो निरंतर’ जैसी कविताओं की सांगीतिक प्रस्तुति की।

सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए वरिष्ठ आलोचक और भगत सिंह पर अपने काम के लिए जाने जाने वाले प्रोफ़ेसर चमनलाल ने कहा कि जसम, जन की आवाज़ बुलंद करने वाला संगठन है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर का शासन अंग्रेजी शासन से भी भयावह है क्योंकि निर्दोषों की हत्याएँ, जन संहार, ज्ञान की संस्थाओं पर हमला किया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में टैंक घुसाए जा रहे हैं। यह हिटलर और मुसोलिनी की मानसिकता है।

pr chaman lal

बिहार की क्रांतिकारी जन परम्परा और समृद्ध साहित्यिक सांस्कृतिक परम्परा को याद करते हुए प्रोफ़ेसर चमनलाल ने कहा कि इस समय देश के लोगों को जनविरोधी राष्ट्रवाद की शूली पर टाँग दिया गया है। महान क्रांतिकारी कवि पाश की कविता उद्धृत करते हुए कहा कि भारत का अर्थ किसी दुष्यंत से नहीं, उसका अर्थ खेतों-किसानों में है। आज भारत की चिंता किसी को नहीं। अदानी अम्बानी अमीर हुए जाते हैं और किसान ख़ुदकुशी कर रहे हैं।

अंग्रेज़ों से लेकर आपातकाल तक, सफ़दर और पाश की हत्याओं तक हमने बहुत से दमन झेले पर अब का दमन अलग है। साम्प्रदायिकता को अब सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। गोरक्षा आदि के नाम पर अब नई सत्ता संरक्षित निजी सेनाएँ बन गयी हैं। कलबुर्गी, दाभोलकर से लेकर पहलू खान जैसे लोग इस हत्या अभियान के शिकार हुए। तमिल लेखक मुरुगन को इन्हीं ताक़तों ने ‘लेखकीय आत्महत्या’ के लिए मजबूर किया। रोहित वेमुला को इन्हीं ताक़तों ने आत्महत्या की ओर धकेला। लेकिन इस अंधेरे से लड़ाई भी जारी है। साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों ने पुरस्कार लौटाकर और लिखकर प्रतिरोध दर्ज कराया। फ़िल्म संस्थान से लेकर जेएनयू तक इनके अभियानों के बावजूद छात्र लड़ रहे हैं। स्पेन में फ़ासीवादी हमले के ख़िलाफ़ कलम और हथियार से लड़ाई लड़ी और शहीद हुए। हमारे सामने भी ऐसी ही परिस्थितियाँ दरपेश हैं। हमें अपने मुल्क की लड़ाई लड़नी होगी। हमारे राष्ट्रवाद का नारा हसरत मोहानी के दिए गया ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ है, ‘साम्राज्यवाद का नाश हो!’ है, जिसे भगतसिंह ने असेंबली में बम फेंकते हुए लगाया था।

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जन-अर्थशास्त्री ज़्याँ द्रेज

उन्होंने कहा कि संस्कृतिकर्मियों ने हमेशा ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है। इस दौर की लड़ाई बड़ी है और हम मिलकर इस लड़ाई को लड़ेंगे। प्रसिद्ध नाटककार अजमेर सिंह औलाख को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि इस दौर में समाज में कट्टरता बढ़ी है। पंजाब में, जहाँ अलग सरकार है, वहाँ भी लेखकों के प्रति असहिष्णुता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इस दौर के सबसे बड़े ख़तरों में से एक है धार्मिक कट्टरता। यह लोगों को मानसिक रूप से पंगु बनाती है। इससे लड़ने के लिए हमें ज्ञान की, जन एकता की मशाल जलानी होगी। तमाम लोकतांत्रिक ताक़तों, अमनपसंदों की विराट जन एकता के ज़रिए इस अंधेरे दौर में रोशनी के लिए, भगत सिंह के सपनों के देश के लिए लड़ाई जारी रहेगी।

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कविता कृष्णन

उद्घाटन सत्र में बोलते हुए प्रख्यात जन-अर्थशास्त्री ज़्याँ द्रेज ने कहा कि आज का दौर इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि अल्पसंख्यकों पर हमला अब एक सरकारी नीति बना दिया गया है। भारत के मौजूदा सत्ता-प्रतिष्ठान के लिए भारतीय संस्कृति का मतलब है ब्राह्मण-प्रधान या सवर्ण संस्कृति। इस समय जो कुछ हो रहा है, उससे ज़ाहिर है कि यह सवर्ण संस्कृति लोकतंत्र पर पलटवार कर रही है और उससे अपना प्रतिशोध चुका रही है। आज़ादी के पहले मार-पीट, शोषण, उत्पीड़न और हत्या के ज़रिए दमित समाज को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती थी ; मगर अब इन हथियारों के साथ-साथ लोगों के दिमाग़ पर भी शासन करने की कोशिश की जा रही है। इसकी बुनियाद में एक ओर संघ की विचारधारा है, तो दूसरी ओर आरक्षण के चलते कमज़ोर हुई आर्थिक स्थिति से उपजा सवर्ण समाज का ग़ुस्सा है। हालाँकि उनका आर्थिक वर्चस्व अभी भी है, मगर पहले वाली बात नहीं रही।

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प्रो राजेन्द्र कुमार

अमर्त्य सेन की किताब पर बनी डाक्यूमेंट्री फ़िल्म में गाय, गुजरात, हिंदुत्व और हिंदू इंडिया जैसे शब्दों को सेंसर करके सत्ता-प्रतिष्ठान दरअसल यह जता रहा है कि ‘आप क्या कह सकते हैं, क्या नहीं—यह हम तय करेंगे !’

आधार को प्रत्येक सेवा के लिए अनिवार्य बना देने का मक़सद है नागरिकों पर संपूर्ण निगरानी और नियंत्रण, क्योंकि इसका सारा डाटाबेस सरकार के पास है। यह इन्फ्रास्ट्रक्चरल आफ सर्विलांस है और ब्राह्मण-संस्कृति के छाते के नीचे बाक़ी सबको घेरकर लाने का उपक्रम।

अकारण नहीं कि ऐसे में लोकतंत्र और भारतीय संविधान के समर्थकों, विवेकवादी बुद्धिजीवियों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हुए हैं।

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मंगलेश डबराल

लिबरेशन पत्रिका की सम्पादक और प्रख्यात महिला नेता कविता कृष्णन ने कहा कि हमें इस ख़तरनाक दौर में लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए हमें अपने ऊपर, जनांदोलन के ऊपर भरोसा करना होगा। प्रख्यात अंग्रेजी कवि यूनुस डिसूज़ा को श्रद्धांजलि देते हुए कविता ने उनके हवाले से प्रथम विश्वयुद्ध के ‘वार पोयट्स’ की याद की जिन्होंने युद्ध की विभीषिका को महसूस किया और संवेदनशील कविताएँ लिखीं। आज हमें युद्ध और सेना के बारे में अपनी तरह से, सम्वेदना के साथ सोचने नहीं दिया जा रहा। उन्होंने संस्कृति के भीतर महिलाओं की आज़ादी के सवाल पर बोलते हुए कहा कि शासक वर्ग की इन भयावह नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों के भीतर विक्षोभ रहता है। उसे गोलबंद करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि शासक वर्ग इस समाज की सबसे पिछड़ी ताक़तों को इकट्ठा करके हमलावर है। हमारा आंदोलन सिर्फ़ बचाव का आंदोलन नहीं होना चाहिए, हमारा सांस्कृतिक आंदोलन आक्रामक होना चाहिए। हम सिर्फ़ इस सरकार के ख़िलाफ़ नहीं, व्यवस्था बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें देश बदलने की लड़ाई किसी इन-उन शक्तियों के हाथों नहीं छोड़नी है, हमें अपने भरोसे इस व्यवस्था को बदलने की लड़ाई लड़नी होगी। हमें शासक वर्ग से लड़ने और समाज बदलने के लिए आंदोलनों को आपस में समझदारी और साझा विकसित करनी होगी। दलित समाज और काशमीर में उत्पीड़न के रूपों में समानता है, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर होने वाले उत्पीड़न में समानता है। ये सारे आंदोलन आज़ादी के, बराबरी के आंदोलन हैं।  ऐसे में संकीर्णता छोड़कर इन आंदोलनों को एक दूसरे से साझा करना होगा, साथ लड़ना होगा। सांस्कृतिक आंदोलन का यह एक महत्वपूर्ण कार्यभार है कि हम यह साझा विकसित करें।

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प्रणय कृष्ण

बिहार की राजनीति में मौजूदा राजनैतिक अवसरवाद पर सवाल करते हुए उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिक ताक़तों से हाथ मिलाना राजनैतिक घोटाला है। ऐसे लोगों पर साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार से लड़ने की उम्मीद करना बेमानी है। साथ ही उन्होंने बथानी टोला नरसंहार की याद की और कहा कि दलित और अल्पसंख्यकों की उस साझा लड़ाई का इन्हीं लोगों ने दमन किया। हम ऐसी ताक़तों पर कभी भरोसा नहीं कर सकते। हमें अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी।

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कामरेड महबूब आलम

उर्दू आलोचक अफ़्सा ज़फ़र ने उद्घाटन सत्र में बोलते हुए कहा कि हिंदू-मुसलमान नहीं, मुझे ऐसा इंसान चाहिए जिसकी ज़मीन पूरी दुनिया हो। हमें युद्ध और हथियारों के ख़िलाफ़ इंसाफ़ और विवेक का रास्ता चुनना होगा। हमें संकीर्ण मतभेदों को भुलाकर इंसानियत की लड़ाई लड़नी होगी।

प्रलेस के राजेंद्र राजन ने कहा कि यह ख़तरनाक दौर है। नई दुनिया का सपना देखने वालों का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि टुकड़े में आज़ादी नहीं मिलती। मुकम्मल आज़ादी के लिए मुकम्मल लड़ाई लड़नी होगी और उसका वक़्त सामने है। आज़ादी और इंसानियत व इंसाफ़ ख़तरे में है, इसके ख़िलाफ़ लड़ाई में हम आपके साथ हैं। हम एकजुट होकर ही इस लड़ाई को लड़ सकते हैं।

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सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर उपस्थित लोग

भाकपा माले विधायक दल के लोकप्रिय जननेता महबूब आलम ने कहा कि हालात बेहद नासाज़ हैं। फ़ैज़ को याद करते हुए उन्होंने कहा कि ये वो सहर तो नहीं जिसका हमें इंतज़ार था। उन्होंने कहा कि समाज को बदलने को हिम्मत चाहिए। उन्होंने बिहार के मौजूदा राजनीतिक अवसरवाद पर हमला करते हुए कहा कि लोकतंत्र में तख़्तापलट की का मज़ाक़ खेला जा रहा है। जनता ने साम्प्रदायिकता से लड़ने के लिए जो सरकार चुनी थी, उसने जाकर साम्प्रदायिकता से हाथ मिला लिया है। सरकार जनता के जीवन के मुद्दों, ज़मीन, शिक्षा, स्वास्थ्य पर पूरी तरह विफल साबित हुई है। हमारे मुल्क की विविधता, बहुरंगीपने पर हमला किया जा रहा है। इसके ख़िलाफ़ हमें जनता की व्यापक गोलबंदी के सहारे संघर्ष करना होगा। साहिर को याद करते हुए उन्होंने आह्वान किया कि ‘सितारों से आगे जहान और भी हैं’।

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हिरावल का गीत नाटक

अध्यक्षता करते हुए जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष व विख्यात आलोचक राजेंद्र कुमार ने कहा कि इस ज़मीन को मोदी मर्दित न होने देने वाले मोदी मुदित हो रहे हैं तो हम यह शपथ लेते हैं कि हम जम्हूरियत की लड़ाई को हर दम तक लड़ेंगे। आशंका है कि संस्कृति का बहुरंगापन ख़त्म हो जाए, आशंका है कि एक देश, एक भाषा, एक पहनावा सब पर लाद दिया जाय। लोकतंत्र के नाम पर फ़ासीवादी सम्भावनाओं की खेती कर रहे हैं। ये सम्भावनाएँ आशंका से भरी हुई हैं। सत्ता वर्ग की घोषणाओं का हमें जनता की भाषा में पर्दाफ़ाश करना पड़ेगा। जनता को सम्मोहन से मुक्त कराना हमारा कार्यभार है।

स्वागत वक्तव्य देते हुए अवधेश प्रीत ने इस दौर में अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने की ज़रूरत को चिन्हित किया। उन्होंने कहा कि हमें मिलजुल कर इस अघोषित आपातकाल से लड़ना होगा। प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि इस तानाशाही से लड़ने का रास्ता खोजने के काम में यह सम्मेलन हमारी मदद करेगा।

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कविता पाठ करते अलोक धन्वा

इस सत्र में ‘बसंत वज्रनाद की अनुगूँज’ (संकलनकर्ता अनिल अंशुमन), अल्लम राजैया के अनूदित कहानी संग्रह ‘कमला’, राणा प्रताप के कहानी संग्रह ‘आग और अन्य कहानियाँ’ व भगवान स्वरूप कटियार के कविता संग्रह ‘अपने अपने उपनिवेश’ का लोकार्पण हुआ। प्रोफ़ेसर यशपाल, महाश्वेता देवी, वीरेन डंगवाल, बी पी केशरी, धर्मवीर, कुमार सत्येन्द्र, पंकज सिंह, नीलाभ, श्रीलता स्वामीनाथन सहित जल-जंगल-ज़मीन बचाने में शहीद हुए लोगों, ख़ुदकुशी करने वाले किसानों और गोगुंडों द्वारा मारे गए लोगों के प्रति सम्वेदना व्यक्त करते हुए एक मिनट का मौन रखा गया। जलेस की ओर से आए शुभकामना संदेश का पाठ और सत्र का संचालन सुधीर सुमन ने किया।

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