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थैलीसीमिया पीड़ित बच्चे को डा. कफील के छोटे भाई कासिफ और तारिक ने दिया खून

पिता द्वारा सोशल मीडिया पर की गई अपील पर दिया खून
गोरखपुर। जमुनहिया बाग गोरखनाथ का रहने वाला तीन साल दो माह का बच्चा थैलीसीमिया बीमारी से पीड़ित है। दो माह में तीन बार उसे खून चढ़ाया जाता है। इस बार उसे खून की बेहद जरुरत थी लेकिन कोई मिल नहीं रहा था। बच्चे के पिता बहुत परेशान थे। इसी बीच उनके लिए डा. कफील अहमद खान के छोटे भाई कासिफ जमील अहमद व रसूलपुर के तारिक आशा की किरण बनकर आए। पिता द्वारा सोशल मीडिया पर डाला गया मैसेज बहुत काम का साबित हुआ और कासिफ व तारिक ने गोरखनाथ चिकित्सालय पहुंचकर खून दान दिया।

बच्चे को शुक्रवार को अहमद हास्पिटल में खून चढ़ाया जायेगा। दूसरा बचा खून सेफ रख लिया जाएगा जिसे पन्द्रह दिन बाद चढ़ाया जायेगा।

इस बच्चे की हालत गुरुवार से खराब थी। बच्चे के पिता मोहल्ले वालों व रिश्तेदारों से कई बार खून ले चुके थे। इस बार कोई खून देने वाला मिल नहीं रहा था। तो मजबूरन उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। यह मैसेज जब डा. कफील अहमद खान के भाई कासिफ जमील अहमद व तारिक ने पढ़ा तो वह खून देने  गोरखनाथ चिकित्सालय पहुंच गए।

गोरखपुर न्यूज़ लाइन ने जब बच्चे के पिता से बात की तो उन्होंने बताया कि बेटे को को पैदाइश के पांचवें माह में मेजर थैलीसीमिया जैसी बीमारी ने चपेट में ले लिया। डॉक्टर बताते है कि 25 लाख में किसी एक को यह बीमारी होती है। इस बीमारी में खून की कमी हो जाती है। बच्चे को अभी तक  50 बोतल खून चढ़ाया जा चुका है।

उन्होंने बताया कि हर बार खून के लिए रक्तदाता की जरुरत पड़ती है। पास-पड़ोस, रिश्तेदारों से कई बार खून ले चुके है। गोरखनाथ चिकित्सालय वालों ने भी कई बार मदद की है। आज बच्चे की तबियत बिगड़ी थी। तो खून की जरुरत पड़ गयी। रमजान भी करीब है। रमजान में खून मिलना और भी मुश्किल था। इसलिए बेचैनी थी लेकिन कासिफ व तारिक ने वह बेचैनी काफी हद तक कम कर दी।

उन्होंने बताया कि इस बीमारी का गोरखपुर में इलाज नहीं है। पीजीआई लखनऊ ने फाइनली बोनमैरो ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दी है जिसका खर्चा करीब 15 लाख रुपया है। जिसका इंतजाम करना फिलहाल मुश्किल है।

उन्होंने बताया कि वह 2010 से ‘एम फातिमा निस्वां उर्दू स्कूल’ में केंद्र सरकार की मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत शिक्षक है। दो साल से केंद्र सरकार ने मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों का मानदेय नहीं भेजा है। एक साल का मानदेय लैप्स भी हो चुका है। ऐसे में बच्चे का इलाज कराने में काफी दुश्वारी हो रही है। बच्चे को दो माह में तीन बार खून चढ़ता है।

हर बार 2, 500 से 3,000 रुपया खर्च होता है। प्रदेश सरकार द्वारा मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों को दिया जाने वाला अंशदान (3000 प्रति माह) मार्च 2018 तक का मिल चुका है लेकिन केंद्र सरकार का मानदेय अभी तक बकाया है। मानदेय कई साल बीत जाने के बाद कभी तीन माह का तो कभी छह माह का आता है। आखिरी बार मानदेय कई साल पहले का बकाया दिसंबर 2017 में मिला था। ऐसे में इलाज व घर का खर्चा चलाना मुश्किल होता है। ऐसे में बेटे की बीमारी पर काफी खर्च होता है। मेरा एक बेटा और है जो सात साल का है और कक्षा 4 में पढ़ता है।