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‘ पुलिस और दबंगों ने मिलकर अस्थौला के दलितों पर जुल्म ढाया ’

पूर्व आईएएस हरिशचन्द्र और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी के नेतृत्व में फैक्ट फाइडिंग टीम ने अस्थौला के दलितों के पुलिस उत्पीड़न की जाँच कीरिपोर्ट जारी

गोरखपुर, 23 मई. पूर्व आईएएस हरिशचन्द्र और पूर्व आईजी एसआर दारापुरी के नेतृत्व में दलित संगठनों के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 22 मई को गगहा थाना क्षेत्र के अस्थौला गांव का दौरा किया और दलितों पर पुलिस फायरिंग, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, दमन के आरोपों की जांच की।

आज गोरखपुर में प्रेस क्लब में फैक्ट फाइडिंग टीम ने अपनी जांच रिपोर्ट जारी करते हुए इस घटना के लिए गगहा पुलिस और अस्थैला गांव के पूर्व प्रधान वीरेन्द्र चंद्र व उनके साथियों के गठजोड़ को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्ज़ा का विरोध करने पर पुलिस और दबंगों ने ठाणे से लेकर गांव तक दलितों पर बेइंतहा जुल्म ढाए हैं.

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पुलिस की पिटाई से घायल महिलाएं अपनी चोट दिखाती हुईं

जांच टीम ने कहा कि इस घटना के एक सप्ताह बाद भी गांव में दहशत है और गांव के सभी पुरूष गिरफ्तारी व पिटाई के डर से गावं छोड़ कर भागे हुए हैं। अस्थौला दलित बस्ती में पुलिस, वीरेन्द्र चंद व उसके गुर्गोे ने जमकर कहर ढाया है और वे आज भी लोगों को धमका रहे हैं। पुलिस, वीरेन्द्र चन्द्र व उसके गुर्गों की पिटाई से दर्जनों महिलाएं घायल हैं। दो युवा महिलााओं से बदसलूकी की गई। गिरफ्तार लोगों को 24 घंटे तक अवैध हिरासत में रखा गया और उन्हें थाने में जमकर पीटा गया और घायल होने के बावजूद उन्हें जेल भेज दिया गया। दो किशोरों को जुवेनाइल एक्ट का उल्लंघन करते हुए पिटाई कर जेल भेजा गया गया। जेल के अंदर घायलों के इलाज का अभी तक कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है।

जांच दल ने गगहा के एसओ और दोषी पुलिस कर्मियों को निलम्बित करने, उनके खिलाफ एससी एक्ट की धारा 4 के तहत मुकदमा दर्ज करने, वीरेन्द्र चन्द्र और उनके सहयोगगियों के खिलाफ एससी एक्ट में मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार करने और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

डीएम के व्यवहार पर नाराजगी जतायी

पूर्व आईएएस हरशिचन्द्र और आईजी प्रेस वार्ता के पहले फैक्ट फाइडिंग टीम के साथ कमिश्नर और डीएम से मिले और अपनी जांच के तथ्यों से अवगत कराया। दोनों पूर्व अधिकारियों ने डीएम के व्यवहार पर नाराजगी जतायी और कहा कि उन्होंने उन लोगों की पूरी बात नहीं सुनी और बार-बार यह कहते रहते है कि उनका समय नष्ट किया जा रहा है। वे हमें सुने बिना कह रहे थे कि हम गलत तथ्य रख रहे हैं. एक बार तो उन्होंने यह भी कहा कि वह उन्हें जेल भी भेज सकते हैं।

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गांव में फैक्ट फाइंडिंग टीम

जांच दल की रिपोर्ट

1- दिनांक 14.05.2018 को लालचन्द द्वारा वीरेंद्र  चन्द एवं अन्य के सहयोग से खलिहान के जमीन पर निर्माण करके कब्जा करने का प्रयास किया गया जिसका दलितो ने विरोध किया। सूचना मिलने पर पुलिस की 100 नम्बर की गाड़ी आयी तथा निर्माण कार्य को रोकवाकर चली गयी. इसके पश्चात थाना गगहा से दो सिपाही गांव में आये तथा उन्होंने दोनों पक्षों को अगले दिन प्रातः 10 बजे तक थाने पर आने के लिए कहा।

2- पुनः दिनांक 15.05.2018 को दलित पक्ष के 10 से 15 लोग थाने गए जिसमे महिलाएं अधिक थीं.   दूसरे पक्ष के वीरेंद्र चन्द, गुड्डू चन्द पुत्र गण कमलाचन्द, रणधीर चन्द, इन्दर चन्द आदि थाने पर पहले से ही मौजूद थे। जैसे ही बातचीत शुरू हुयी तो बिरेन्द्र चन्द ने जातिसूचक गलियां देना शुरू किया और राम उगान पुत्र बलिराज को पुलिस के डंडे से मारना शुरू कर दिया. इस पर दलितों ने आपत्ति की तो थानाध्यक्ष सुनील कुमार सिंह व् अन्य पुलिस कर्मचारियों ने भी उन्हें मारना पीटना शुरू कर दिया तथा राम उगान को हवालात में बंद कर दिया। वीरेंद्र चन्द्र ने अपने बन्दूक के कुंदे से रामउगन को मारा. इसके बाद औरतों को थाने से भगाने के इरादे से पीटना शुरू कर दिया. जब इसकी सूचना गाँव में पहुंची तो वहां से दलित बस्ती के 25-30 लोग थाने पर पहुंचे. वहां पर जब उन्होंने मारपीट करने पर आपत्ति की तो पुलिस वालों ने उन पर लाठी चार्ज किया तथा उसके बाद अकारण फायरिंग भी कर दी जिससे जीतू पुत्र सुखारी, भोलू पुत्र उमेश तथा दीपक पुत्र गोपाल को गोली लगी एवं काफी लोगों को लाठी डंडे की चोटें भी आयीं. महिलाओं ने बताया कि दलितों पर वीरेंद्र चन्द्र ने भी अपने बन्दूक से फायरिंग की.

3. उपरोक्त घटना के बाद पुलिस ने थाने पर 31 दलितों को नामजद करते हुए दलितों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया जिसमें संपत्ति को नुक्सान, आगजनी, हत्या का प्रयास सहित संगीन धारायों का उपयोग किया गया.

4.इसके पश्चात उसी दिन पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में ग्राम अस्थौला की दलित बस्ती पर चढ़ाई की गयी तथा 27 दलितों को जिसमें दो महिलाएं हैं, गिरफ्तार कर लिया गया. दलित बस्ती पर हमले के दौरान पुलिस द्वारा गाँव में उपस्थित महिलायों, बच्चों तथा वृद्धों की निर्मम पिटाई की गई एवं घरों में तोफोड़ की गयी. इस हंगामे के दौरान अजोरा देवी पत्नी निवास, शांति पत्नी राम गोविन्द, लालमती पत्नी निर्मल, राजमती पत्नी जगदीश, पानमती पत्नी घूरन, सीमा पत्नी अनिल, ज्ञानमती पत्नी हरीश चंद, साधना देवी पत्नी राजेश, किस्मती पत्नी पुरुषोतम, हंसी पत्नी प्रभु, विमला पत्नी उदय, मन्नू पत्नी अमित, राम मिलन पुत्र जोखन, अमित पुत्र सुभाष तथा कुछ अन्य को पुलिस की मारपीट से गंभीर चोटें आयीं. इसमें अजोरा देवी का दाहिना हाथ टूट गया है. इसके अतिरिक्त पानमती पत्नी घूरन राम के कान और गले का मंगल सूत्र भी पुलिस द्वारा छीन लिया गया.

5. इसके अतिरिक्त पुलिस द्वारा राजकुमारी पत्नी रामसकल, पान्मती पत्नी घूरन एवं सीमा देवी पत्नी अनिल के घरों के दरवाजे तोड़े गये और घर के अन्दर नहाती हुयी महिलायों और बच्चियों के साथ छेड़छाड़ की गयी. यह भी उल्लेखनीय है कि उस समय पुलिस के साथ कोई भी महिला पुलिस कर्मचारी नहीं थी. यह भी आश्चर्य की बात है कि उस समय पुलिस के साथ वीरेंद्र चंद तथा उसके सहयोगी भी मौजूद थे.

6. जांच के दौरान पाया गया कि अधिकतर दलितों के घरों में ताले लगे हुए हैं और लोग पुलिस के डर से भागे हुए हैं.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है की गगहा पुलिस द्वारा खलिहान की जमीन पर कब्जा करने.करवाने वाले पक्ष के साथ मिल कर थाने पर दलितों की पिटाई की गयी तथा करवाई गयी. इसके बाद गाँव में दलित महिलायों, बच्चों तथा बुजुर्गों के साथ मारपीट की गयी एवं महिलायों के साथ छेड़छाड़ की गयी.

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जांच टीम की मांग

1. खलिहान पर कब्जे का मामला राजस्व विभाग से सम्बंधित था परन्तु इसमें थानाध्यक्ष गगहा द्वारा बिना किसी अधिकार क्षेत्र तथा कब्जा करने वाले पक्ष की सहायता करने के इरादे से अवैधानिक कार्यवाही की गयी, जिसके लिए उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए .

2. थाने पर अवैध कब्जा करने वाले पक्ष के सहयोगी वीरेन्द्र चन्द द्वारा अनधिकृत ढंग से राम उगान की पिटाई की गयी परन्तु थानाध्यक्ष द्वारा उसे ऐसा करने से रोकने हेतु कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी . जिससे यह स्पष्ट है कि इस कार्य में उसकी पूर्ण सहमति थी . वास्तव में इस कारण ही दलितों में आक्रोश पैदा हुआ तथा उन्होंने विरोध जताया. यदि थानाध्यक्ष ने थाने पर ऐसा न होने दिया जाता तो संभवतः थाने पर टकराव की कोई घटना घटित नहीं होती. अतः इस परिघटना की उच्चस्तरीय जाँच कर थानाध्यक्ष को त्वरित निलंबित कर थाने से हटाया जाए एवं दण्डित किया जाय. थानाध्यक्ष का यह कृत्य अपने कर्तव्य की घोर उपेक्षा है , जिसके लिए उसके विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के अंतर्गत अभियोग चलाया जाय. इसके साथ ही वीरेंद्र  चंद द्वारा थाने पर पिटाई करने के लिए उसके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज करके कार्रवाही की जाये.

3.  थाने पर टकराव की घटना के बाद पुलिस द्वारा दलित बस्ती पर बड़ी संख्या में चढ़ाई की गयी जिसके दौरान महिलाओं, बच्चियों , बुजुर्गों को चोटें आई हैं तथा उनकी बेइज्जती की गयी जिसके लिए दोषी अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर जाँच कर कानूनी कार्यवाही सुनुश्चित की जाय.

4. थाना गगहा पर पुलिस द्वारा दर्ज किया गया मुकदमा अपराध संख्या 152ध/18 की रिपोर्ट के अवलोकन से विदित है कि यद्यपि थाने पर घटना तथा गाँव से दलितों की गिरफ्तारी 15 मई को ही कर ली गयी थी परन्तु थानाध्यक्ष द्वारा थाने पर दिनांक 16 मई को प्रथम सूचना दर्ज करायी गयी. इससे स्पष्ट है कि पुलिस द्वारा जानबूझ कर प्रथम सूचना दर्ज करने में विलंब किया गया तथा 15 मई को ही पुलिस द्वारा गाँव से 27 दलितों को गिरफ्तार कर लिया गया था परन्तु थानाध्यक्ष ने इनकी गिरफ्तारी 16 मई को दिखाई गयी है. इस प्रकार 27 दलितों को थाने पर एक दिन अवैध अभिरक्षा में रखा गया तथा उनके साथ मारपीट की गयी जो कि दंडनीय अपराध है. इसके लिए थानाध्यक्ष के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत केस दर्ज कर कार्रवाही की जानी चाहिए.

5. जांच के दौरान यह ज्ञात हुआ हैकि 29 मई को चन्द्रावती की पुत्री की शादी है परन्तु उसे वीरेंद्र चन्द व् उसके सहयोगियों की तरफ से धमकियाँ दी जा रही हैं. अतः चन्द्रावती को शादी के दौरान सभी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई जाय .

6. जाँच के दौरान ज्ञात हुआ हैकि गांव में दलित बस्ती में जलापूर्ति हेतु लगे हुए सरकारी नलकूप आधे से अधिक खराब पड़े हैं , जिन्हें तुरंत ठीक कराया जय एवं इसके साथ ही गांव की सफाई हेतु नियुक्त सफाई कर्मचारी द्वारा सफाई न करने करने के कारण नालियों में गन्दगी व्याप्त है. इस सम्बन्ध में त्वरित आवश्यक कार्यवाही की जाय .

7. जांच के दौरान यह ज्ञात हुआ कि गांव में मनरेगा के अंतर्गत लोगों को काम नहीं मिला है जिससे उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़  रहा है . अतः उन लोगों को तुरंत मनरेगा के तहत कार्य उपलब्ध कराया जाय .
8. थानाध्यक्ष द्वारा लिखी गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट से स्पष्ट है कि 31 दलितों को नामजद किया गया है जिनमे 27 गिरफ्तार किये जा चुके हैं और 250 अज्ञात दलितों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया गया है , पुलिस की यह कार्यवाही साफ तौर पर दलित उत्पीडन की कार्यवाही है . अतः इस मामले में कोई भी अग्रिम गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए तथा गिरफ्तार शुदा दलितों को जमानत पर रिहा किया जाय .

9. यह ज्ञात हुआ है कि जिन दलितों की गांव तथा थाने पर पिटाई की गयी थी , उनके शारीर पर जेल में दाखिले के समय कोई भी चोट नहीं दिखाई गयी है. जांच के दौरान पाया गया कि दलितों के अधिकतर घरों में ताले लगे हुए हैं और लोग पुलिस के डर से भागे हुए हैं , गांव वालों ने बताया कि पुलिस गांव में बराबर दबिश दे रही है .पुलिस के इस आतंक को तुरंत समाप्त किया जाय ताकि लोग अपने घरों में वापस लौट सकें .

10. पुलिस द्वारा थाने पर घटना के दिन अस्थौला गांव की दलित बस्ती पर बड़ी संख्या में चढ़ाई की गयी जिसके दौरान महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों की निर्ममता की पिटाई की गयी जिससे एक दर्जन से अधिक लोगों को चोटें आई हैं . पुलिस द्वारा उन्हें न तो कोई डाक्टरी सहायता के लिए अस्पताल भेजा गया और न ही उनकी तरफ से कोई रिपोर्ट लिखी गयी और न ही शिवहरी पुत्र जीतू द्वारा इस सम्बन्ध में दिनांक 17 मई को दिए गए प्रार्थना पत्र के आधार पर प्रथम सूचना ही दर्ज की गयी, यह भी उल्लेखनीय है की जिस समय पुलिस ने गाँव में दबिश दी तो उनके साथ कोई भी महिला पुलिस नहीं थी.

जांच दल में ये थे शामिल

हरिश्चन्द्र (पूर्व आईएएस), एस.आर. दारापुरी- (पूर्व आईजी), रामकुमार (निदेशक डायनमिक एक्शन ग्रुप), दौलत राम (निदेशक भारतीय जनसेवा आश्रम), अरविन्द कुमार (एक्शन एड), रीता कौशिक (सचिव, एसकेवीएस), शोभना स्मृति ( राज्य संयोजिका उ.प्र., आल इण्डिया दलित महिला अधिकार मंच), रामदुलार ( प्रदेश संयोजक राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान), आदर्श कुमार ( संयोजक नेटिव एजुकेशनल एण्ड वेलफेयर सोसायटी )

 

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