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7200 फुट की ऊंचाई पर स्थित हनुमान टोक से दिखता है गंगटोक का खूबसूरत नजारा

सिक्किम यात्रा-एक

सगीर ए खाकसार

यह है हनुमान टोक। यह मंदिर सिक्किम के गंगटोक शहर से करीब 09 किमी दूर है। मेरे ड्राइवर ने बताया कि टोक का अर्थ होता है ऊंचाई या फिर टॉप। इससे पहले मैंने यहां के मंदिरों के नाम हनुमान टोक और गणेश टोक से अंदाज़ा लगाया था कि शायद टोक का अर्थ होता है मंदिर।

गंगटोक के स्थानीय पर्यटन स्थलों को देखने के क्रम में मेरे टैक्सी ड्राइवर जेपी जो बाद में दोस्त बन गए,सबसे पहले मुझे हनुमान टोक ही ले गए।मंदिर का पूरा परिसर बेहद साफ सुथरा और शांत,और पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त दिखा।सेना का एक जवान फूलों की क्यारियों और झाड़ियों की सफाई करते दिखा। यह मंदिर करीब 7200 फुट की ऊंचाई पर है। यहां से कंचनजंगा, गंगटोक शहर का खूबसूरत नजारा और शाही कब्रिस्तान को भी देखा जा सकता है।

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मंदिर में खास बात यह थी कि यहां तो न कोई पुजारी दिखा और न ही मंदिर के बाहर कोई भिखारी। कर्मकांड के नाम पर यहां कुछ भी नहीं था।
बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 1950 में कई गई थी। भारतीय सेना 1968 से इस मंदिर की देखभाल व रखरखाव की ज़िम्मेदारी स्थानीय लोगों की सहायता से निभा रही है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि रामायण काल मे रावण के पुत्र मेघनाद के साथ युद्ध के दौरान लक्ष्मण जब बुरी तरह घायल हो गए थे तब उनकी जान बचाने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी लाने हिमालय की तरफ भागे।

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हनुमान जी को यह निर्देश दिया गया था कि रात्रि समाप्त होने पूर्व अगर संजीवनी  लेकर नहीं लौटे तो लक्ष्मण की मृत्यु हो जाएगी। रावण ने हनुमान को विफल करने के लिए एक कुटिल चाल चली और अपने एक सहयोगी “कालनेमि” को हनुमान के पीछे लगा दियालेकिन हनुमान को एक अप्सरा जिसे उन्होंने शाप से मुक्ति दिलाई थी के ज़रिए इस कुटिल चाल की भनक लग गयी और उन्होंने कालनेमि को पराजित कर दिया और द्रोणागिरी पर्वत की और बहुत ही तीव्र  गति से भागे।वहां पहुंच कर हनुमान जी के लिए जड़ी बूटी की पहचान करना जब मुश्किल हुआ तो फिर वो पर्वत का एक टुकड़ा लेकर ही उड़ चले।यही नहीं उन्होंने समय की गति को रोकने के लिए भगवान सूर्यदेव का एक अंश भी पकड़कर अपनी एक भुजा में बंद कर लिया।

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मान्यता है कि संजीवनी लेकर इसी स्थान पर हनुमान ने कुछ क्षण के लिए विश्राम किया था ।फिर यहां से दक्षिण की तरफ उड़ गए थे। इसी वजह से इस मंदिर का नाम हनुमान मंदिर पड़ा।

 

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