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87 साल पुरानी शहीदों की निशानी घंटाघर का हो रहा ‘ भगवाकरण ‘

गोरखपुर, 26 नवम्बर। प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद सचिवालय से लेकर बसों तक का भगवाकरण बहुत तेजी से हुआ। भगवाककण की मुहिम ने गोरखपुर में भी दस्तक दे दी है। एेतिहासिक घंटाघर के भगवाकरण का काम तेजी से चल रहा हैं।

यह घंटाघर एेतिहासिक होने के साथ शहीदों के बलिदानियों की आखिरी सांस का चश्मदीद भी हैं। इसी के पास ऐतिहासिक मुगलिया शाही मस्जिद भी है। इन दोनों के बीच चंद कदम का फासला है। इस वक्त  घंटाघर को हल्के भगवा रंग में रंगा जा रहा है।

इससे पहले शहर के कई इलाकों का नाम बदले जाने को भी लेकर विवाद खड़ा हो चूका है. उर्दू बाजार को हिंदी बाजार, मियां बाजार को माया बाजार आदि नाम में बदलने की कोशिश की गयी। यानी नाम के बाद इमारतों का भगवाकरण शुरू हो गया है। अब अगली बारी किस इमारत की है। यह देखना दिलचस्प है।
घंटाघर की ऐतिहासिकता
इंटेक गोरखपुर चैप्टर की पुस्तक के मुताबिक महानगर के उर्दू बाजार स्थित घंटाघर देश भक्त वीरों के गौरवगाथा का यादगार है। घंटाघर के स्थान पर पतजू (पाकड़) के पेड़ पर 1857 के क्रांतिवीर अली हसन और तमाम देशभक्तों  को 31 मार्च 1859 को फांसी दी गयी थी। उसी स्थान पर सेठ रामखेलावन और ठाकुर प्रसाद ने 1930 में घंटाघर का निर्माण कराया। एक अन्य जानकारी के मुताबिक क्रांतिकारी पं. राम प्रसाद बिस्मिल ने 16 दिसम्बर 1927 को देश के नाम गोरखपुर जिला जेल की फांसी कोठरी से लिखित अंतिम संदेश दिया। उनकी शव यात्रा निकाली गयी जो जिला जेल से शुरू हुई फिर धर्मशाला अलीनगर, बक्शीपुर, नखास, घंटाघर होते हुये राप्ती तट पर पहुंची। घंटाघर स्थित पतजू के पेड़ के पास शव को रखा गया। पं. बिस्मिल की शायद मां ने ओजस्वी भाषण दिया। यह घंटाघर और वह रास्ते उस अजीम आजादी के मतवाले  के गवाह हैं।

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