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दीन-ए-इस्लाम ने औरतों का दर्जा ऊंचा किया, भेदभाव मिटाया : ग़ाजिया खानम

दरगाह मुबारक खां शहीद पर मुस्लिम औरतों का जलसा

गोरखपुर। तालीम, दीनी व दुनियावी फराइज, निकाह, तलाक, दहेज सहित तमाम सामाजिक मुद्दों को लेकर नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां पर रविवार को मुस्लिम औरतों का ‘बज़्मे ख्वातीन बनाम इस्लाहे मआशरा’ नाम से एक भव्य जलसा हुआ।

मुख्य अतिथि इस्लामिक स्कॉलर ग़ाजिया खानम ने कहा कि ईद मिलादुन्नबी महज पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की पैदाइश का दिन ही नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत की आजादी का दिन है। पैगंबर-ए-आज़म ने दुनिया से भेदभाव को मिटाया। दीन-ए-इस्लाम ने औरतों का दर्जा ऊंचा किया और मां के पैरों के नीचे जन्नत करार दिया। दीन-ए-इस्लाम व पैगंबर-ए-आज़म ने अमन व सलामती का पैगाम दिया। मुसलमान वही है, जिससे उसका पड़ोसी सुरक्षित रहे।

उन्होंने कहा कि पैगंबर-ए-आज़म ने फरमाया है कि ‘तुमने अगर एक मर्द को पढ़ाया तो सिर्फ एक इंसान को पढ़ाया, लेकिन एक औरत को पढ़ाया तो एक खानदान, एक नस्ल को पढ़ाया।’ हमें पैगंबर-ए-आज़म के बताये रास्ते पर चलना है। दीन-ए-इस्लाम ने औरतों को शैक्षिक व सामाजिक सभी अधिकार दिए हैं। बच्चे की पहली दर्सगाह मां की गोद होती है इसलिए मां को पढ़ा-लिखा होना बेहद जरुरी है। मुस्लिम बच्चियों की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए अच्छी तालीम व दीनदारी जरुरी है। आधी रोटी खाईये, बच्चों को पढ़ाईये। आखिरत संवारने के लिए शरीयत का दामन थामना जरूरी है।

विशिष्ट अतिथि आलिमा नाजिश फातिमा ने कहा कि नमाज़ इंसान को हर बुराई से दूर रखती है। नमाज़ पैगंबर-ए-आज़म हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के आंखों की ठंडक है। नमाज़ खुद भी अदा कीजिए और घर वालों से भी कहिए नमाज़ पढ़ने के लिए। शादी में फिजूलखर्ची अल्लाह व पैगंबर-ए-आज़म को पसंद नहीं है इसलिए शादियों को पैगंबर-ए-आज़म के सुन्नत के मुताबिक अमल में लाया जाए।

विशिष्ट अतिथि आलिमा नूर अफशां ने कहा कि दीन-ए-इस्लाम औरतों को सम्मान के नजरिए से देखता है। परिवार में मर्दों की तरह औरतों को समान अधिकार प्राप्त है। हम दीन-ए-इस्लाम का अध्ययन करें तो पता चलता है कि दीन-ए-इस्लाम ने औरतों को चौदह सौ साल पहले वह स्थान दिया है जो आज के कानून दां भी उसे नहीं दे पाए। दीन-ए-इस्लाम लोकतांत्रिक मज़हब है और इसमें औरतों को बराबरी के जितने अधिकार दिए गए हैं उतने किसी भी मजहब में नहीं हैं। दीन-ए-इस्लाम ने औरत को उसका पूरा जायज़ अधिकार और न्याय दिया व उसके नारित्व की सुरक्षा की। शरीयत पर अमल करके ही मुस्लिम औरतें आगे बढ़ेंगी।

जलसे का आगाज तिलावत-ए-कुरआन से हुआ। नात शरीफ आलिमा शमीना ज़बी, नौशीन फातिमा व मेहनाज़ फातिमा ने पेश की। अंत में सलातो-सलाम पढ़कर अमन, सलामती व तरक्की की दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई। इस मौके पर मुस्कान आलम, नीलू तबस्सुम, आसिया जमाल सिद्दीकी, हनी तबस्सुम, उरुज आलम, नाहिद आसिम, सलमा नवाब, फातिमा बेगम, नादिरा खातून, मरियम फातिमा सहित बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद रही।

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