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डा. कफील ने बीआरडी के प्रधानाचार्य से मिल निलम्बन अवधि का देय निर्वाह भत्ता 16.66 लाख मांगा

आक्सीजन कांड की सीबीआई जांच और स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त करने की मांग दुहरायी

गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के निलम्बित प्रवक्ता डा. कफील खान ने आज मेडिकल कालेज जाकर कार्यावाहक प्रधानाचार्य को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति देते हुए निलम्बन अवधि के सभी देय निर्वाह भत्ता 16.66 लाख का जल्द से जल्द भुगतान करने की मांग की.

बीआरडी मेडिकल कालेज से वापस लौटने के बाद उन्होंने प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता की। पत्रकार वार्ता में उन्होंने आक्सीजन त्रासदी की सीबीआई जांच की मांग करते हुए इस घटना के लिए स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त करने की मांग की।

डा. कफील ने बताया कि निलम्बन के बाद उन्हें वेतन के बेसिक का आधा मिल रहा है जिसमें जीवन निर्वाह मुश्किल है. सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका पर सभी देय निर्वाह भत्तों के भुगतान का आदेश दिया है. उन्होंने आज अपने सभी बकाये का विस्तृत विवरण कार्यवाहक प्रधानाचार्य को दिया. हमारा अभी तक का बकाया 16.66 लाख रूपए होते हैं.

उन्होंने कहा कि अपने खिलाफ विभागीय जांच जल्दी पूरी करने के लिए उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिस पर उच्च न्यायालय ने विभागीय जांच तीन महीने में पूरी करने का आदेश दिया है. यह अवधि सात जून को पूरी हो रही है.

उन्होंने आक्सीजन कांड का चर्चा करते हुए कहा कि इस घटना में  जिन माता-पिता ने अपने मासूम को खो दिया, वे अभी भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं. सरकार को इस घटना के लिए माफी मांगनी चाहिए और पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि बीआरडी के आक्सीजन त्रासदी के लिए वे सभी लोग दोषी हैं जिन्होंने लिक्विड ऑक्सिजन सप्लायर के 14 पत्रों के बाद भी कमीशन के चक्कर में पेमेंट नहीं किया. इनमे हेल्थ मिनिस्टर भी शामिल हैं. उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री को तुरंत बर्खास्त करना चाहिए और पूरे मामले की सीबीआई जाँच होनी चाहिए.

इस मौके पर उन्होंने हेल्थ फॉर आल कैम्पेन की बुकलेट भी जारी की. उन्होंने कहा कि देश के जाने मने हेल्थ एक्टिविस्ट ने स्वस्थ भारत नीति का प्रस्ताव तैयार किया है. इसके जरिये हमने मांग की है कि स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाय और बिना किसी वित्तीय कठिनाई के सभी तक अच्छी गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवा की पहुँच होनी चाहिए. इसके लिए जरुरी है कि सार्वजनिक व्यय को जीडीपी का तीन फीसदी किया जाय.

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