विचार

गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं शोध संस्थान : तेरे अंजाम पे किसी को रोना न आया

मनोज सिंह

कुशीनगर जनपद स्थित गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं शोध संस्थान सेवरही अपनी विपन्नता पर आंसू बहा रहा है. यह फाजिलनगर विधानसभा क्षेत्र में स्थित है.  आवश्यक संसाधनों, वरिष्ठ, सहायक वैज्ञानिकों, कर्मचारियों की कमी व निदेशक का  पद समाप्त होने के वजह से खस्ताहाल है.

इसकी स्थापना के समय बनाये गए 21 अनुभागों में आज सिर्फ 9 अनुभाग ही काम कर रहे हैं. शेष बंद हो चुके हैं. महज तीन वैज्ञानिकों के भरोसे संस्थान का शोध कार्य होने के कारण नई प्रजातियों की खोज बाधित हो गई है. व्यवस्था सुधार की दिशा में शाहजहांपुर से निदेशक का दौरा हुआ, नोडल अधिकारी की नियुक्ति भी हुई पर यहाँ के हालात में कोई सुधार होता नहीं दिखाई देता.

कभी एशिया स्तर पर शोध संस्थान के रूप में पहचान बनाने वाले इस संस्थान ने वर्ष 1988 में जब काम शुरू किया तो यहा 40 वैज्ञानिकों की तैनाती हुई थी. संस्थान में कुल 21 अनुभागों मे प्रजनन, बीज, जेनेटिक, टीशू कल्चर,प्रसार, अर्थशास्त्र, फोटोग्राफी, मृदा रसायन, पादप रोग, बायोकमेस्ट्री, कीट, पेस्ट्रीसाइड रसायन, दैहिक, भंडार, सांख्यिकी, कार्यालय, प्रक्षेत्र, गार्डेनिग, वाहन, विद्युत, सचल संपत्ति सहित अलग-अलग विभाग थे.

इनमें सभी पदों पर वैज्ञानिकों व कर्मचारियों की तैनाती हुई थी. किंतु इन अनुभागों में आज सिर्फ 9 अनुभाग में सिर्फ तीन वैज्ञानिकों और कुछ सहायक कर्मचारियों के भरोसे किसी तरह संचालित हो रहा है.

गन्ने की कई प्रजातियां-कोसे 92429, 11453, 08452 आदि यही से पैदा हुई जो गन्ना किसानों में आज भी लोकप्रिय है. यह सारे शोध कार्य निदेशक की तैनाती के समय ही हुआ. निदेशक के पद होने के कारण शासन से धन की मांग एवं उसे व्यय करने का पूरा अधिकार मिला हुआ था किंतु इसकी बदहाली का दौर वर्ष 1998 में तब शुरू हुआ जब निदेशक का पद समाप्त कर इसे शाहजहांपुर से जोड़ दिया गया.

हालात यह है कि यहां बिजली का टूटा तार, दीवार का उखड़ा प्लास्टर ठीक कराना हो तो शाहजहांपुर में तैनात निदेशक से अनुमति लेनी पड़ती है.

चार सौ की जगह अब सिर्फ 88 कर्मचारी यहाँ कार्य कर रहे हैं. पहले सभी अनुभागों में कुल 400 पदों पर अधिकारियों एवं कर्मचारियों की तैनाती थी. शोध कार्य व बीजों का संब‌र्द्धन वैज्ञानिकों के अभाव में पूरी तरह ठप हो गया है. यहाँ तैनात वैज्ञानिक, अधिकारी व कर्मचारी सिर्फ फील्ड के कार्य पर अपनी ड्यूटी बजा रहे हैं.

निदेशक पद समाप्त होने के साथ शोध बंद

निदेशक का पद समाप्त होने के बाद आज तक यहां से गन्ने की कोई नई प्रजाति नहीं निकली,जो यहां के गन्ना किसानों के हित में हो. पुस्तकालय, प्रयोगशाला, पाली हाउस ,टीशू कल्चर, वाहन, विद्युत बायोकमेस्ट्री जेनेटिक जैसे संस्थान की प्रमुख इकाई वैज्ञानिकों कमी के कारण बंद हो चुकी हैं.

वैज्ञानिकों और अधिकारियों के अभाव में नई प्रजाति की खोज कैसे हो जब शेष वैज्ञानिक संस्थान में लगे गन्ने की पुरानी किस्मों की देख रेख में ही व्यस्त रहते हैं. इससे उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती कि गन्ने की नई प्रजाति की तलाश कर सके. शेष बचे अधिकारी व कर्मचारी अपनी सेवानिवृत्ति के समय का इंतजार कर रहे हैं.

इस संस्थान को पुनः पटल पर लाने के लिए विगत कई वर्षों से कृषि विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने के लिए अभियान चल रहा है. चुनाव में किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में इस क्षेत्र के लिए कोई ठोस मुद्दा नही है जबकि कृषि विश्वविद्यालय की मांग पूर्वांचल के लिए संजीवनी है. क्षेत्रीय जनता को भी विचार कर हवा-हवाई मुद्दों के बजाय शिक्षा और कृषि के मुद्दों पर राजनीतिक दलों को चर्चा करने और कार्य करने के लिए दबाव बनाना चाहिए. जब तक इन दोनों क्षेत्र में मजबूत कदम नही उठेगा इस क्षेत्र का विकास सम्भव नही है.

 

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और गेंदा सिंह गन्ना प्रजनन एवं शोध संस्थान को कृषि विश्वविद्यालय में बदलने की मांग को लेकर आन्दोलन चला रहे हैं )

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