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गोरखपुर में 25 साल पहले गूंजती थी ‘ वक्त-ए-सेहर है, तुम्हें कोई जगाए ‘ की आवाज़

-याद-ए-रमज़ान 
गोरखपुर। माह-ए-रमज़ान रहमत, बरकत के अलावा अपने दामन में बहुत सी पुरानी यादें भी समेटे हुए है। कुछ ऐसी ही याद साझा की नार्मल पर चाय की दुकान चलाने वाले 72 वर्षीय शाकिर अली ने।

इन्होंने करीब 25 सालों तक पूरे रमज़ान माह में लोगों को सहरी के लिए जगाया है। शायद ही शहर का कोई कोना इनसे छूटा हो। सहरी के वक्त जगाने का अंदाज शानदार व निराला था। एक ठेला, माइक, ठेले पर कव्वाली के साजो सामान व रौशनी के लिए गैस वाली लैम्प। 20-25 लोगों का ग्रुप।

शाकिर अली के नेतृत्व में तुर्कमानपुर से यह काफिला चलता था। शाकिर कभी नात पढ़ते तो कव्वाली गाते और साथी अन्य साजो सामान पर संगत देते। शाकिर अली ने बताया कि उनकी जुबान पर “नूर ढ़ला जाए, मुसलमां उठो हाय, वक्त-ए-सेहर है तुम्हें कोई जगाए” और ” लाखों में मिलेगी न हजारों में मिलेगी, फूलों में मिलेगी न बहारों में मिलेगी, वहदत की अदा हक के इशारों में मिलेगी, ये चीज तो कुरआन के पारों में मिलेगी” नात हमेशा जारी रहती थी।

इसके अलावा भी बहुत से कलाम पढ़े जाते थे। उन्होंने बताया कि 22 साल की उम्र में सहरी में जगाने का आइडिया आया। उन्होंने अपने दोस्तों से बताया। फिर क्या था। आज से करीब 50 साल पहले सहरी में जगाने का सिलसिला शुरु हुआ।

हर दिन का अलग-अलग रुट रहता था। रात 1 बजे से 20-25 लोगों की टोली नात व कव्वाली पढ़ते हुए निकलती। इस टोली के जाने से हर मोहल्ले में रौनक छा जाती थी। शाकिर बताते हैं कि जिस मोहल्ले में टोली जाती तो हमें सहरी भी खाने को मिलती। करीब 20 साल पहले सहरी में जगाने का सिलसिला खत्म हो गया। शाकिर अली के साथ रफीउल्लाह, सफीउल्लाह, बिस्मिल्लाह, हनीफ, नईम अहमद पुराने दौर की याद को आज भी सजोये हुए हैं।

एक बात और सहरी में जगाने के दौरान दीनी कामों के लिए चंदा भी किया जाता था। चंदा नेक कामों में लगाया जाता था। 73 वर्षीय नईम अहमद कहते हैं कि अतीत बहुत शानदार था। गुजरे जमाने में माह-ए-रमज़ान के दौरान फिज़ा देखने के काबिल थी। सहरी में जगाने का अंदाज एकदम अनोखा व निराला था। नए दौर में सब पुरानी बातें हो गई है।

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