हाल ए कृष्णानगर : छोटे बच्चों के हाथों में डंडा पकड़वाने वाले हाथों को पहचानिए

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कहते हैं जब संवाद टूटता है तो दुष्प्रचार फैलता है।बेहतर और मजबूत रिश्तों के लिए ज़रूरी है आपसी संवाद। इसलिए संवाद बनाये रखना बहुत ज़रूरी है। संवाद से ही हम एक दूसरे की भावनाओं को समझ पाते हैं। अफसोस की बात है यह कि समाज में संवादहीनता बढ़ रही है जिसका लाभ सियासी लोग अपने फायदे के लिए उठा रहे हैं।

नेपाल का कृष्णानगर शायद इसी संवादहीनता का शिकार हो गया है। दशहरे में कुछ शरारती तत्वों ने माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन अमन पसंद जनता ने इनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।फिलहाल शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है। तीन दिनों तक मूर्तियां विसर्जित नहीं हो पायीं थीं।रविवार देर रात मूर्तियां विसर्जित की गयी।समाज के प्रबुद्ध वर्ग अपने अपने घरों में कैद रहे । न किसी ने किसी से संवाद किया और न कोई पहल। न सद्भाव की अपील और न अगुवाई। प्रशासन और जनप्रतिनिधि ही समाधान का रास्ता खोजते दिखे।सिविल सोसाइटी कहीं नहीं दिखी। इसका फायदा असामाजिक तत्वों ने खूब उठाया।

आइये, अब आपको ले चलते हैं फ़्लैश बैक में।राजतंत्र में राजा और रानी का जन्मोत्सव बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता था।उस जन्मोत्सव में तत्कलीन कृष्णनगर के प्रधान सरदार मेहर सिंह जो करीब दो दशकों तक प्रधान रहे ,कांछा बाबू, मथुरा प्रसाद गुप्ता, मौलाना हकीकुल्लाह ,बबर कहाँ, डॉ रुद्र प्रताप शाह, मौलाना मेहबूब साहिब,मौलाना अब्दुल्लाह मदनी आदि जैसी शख्सियतें जुलूस की रहनुमाई करती थीं। यह परंपरा ईद मिलादुन्नबी और दशहरे के जुलूस में भी काफी समय तक बनी रही। ईद मिलादुन्नबी में हिन्दू समाज के बड़े लोग काफी दिनों तक शामिल होते रहे। जब तक विभिन्न समाज के प्रबुद्धजनों ने रहनुमाई की,सब कुछ ठीक ठाक रहा।

धीरे-धीरे हमारे धार्मिक जुलूसों को तथाकथित सियासतदानों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। लोग जाने अनजाने इनके मोहरे बनते गए। धर्म और आस्था पीछे खिसक गया और सियासतदानों की महत्वाकांक्षा परवान चढ़ने लगी। हालात यह हो गए कि धीरे धीरे धार्मिक जुलूस ,धार्मिक त्यौहार सियासी रंग में रंग गए। अपने आराध्य के स्थान पर हम तथाकथित नेताओं का गुणगान करने लगे, उनकी ब्रांडिंग करने लगे। हमारी आस्था का सियासी दलों ने दोहन किया और हम उनके कुत्सित मंसूबों को समझने में नाकाम रहे और हो रहे हैं। जिन धार्मिक पंडालों से भक्ति की गंगा बहती थी, धार्मिक भजन समाज मे समरसता पैदा करते थे उन्ही पंडालों से नफरत के गीत गूंजने लगे।

कहीं सुना है आप ने महान कवि और गायक प्रदीप कुमार का भजन. “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गयी भगवान”याद करिए आपको अनूप जलोटा को “ऐसी लगी लगन,मीरा हो गयी मगन “जैसे भजन सुने कितने दिन और बरस गुज़र गए हैं। मालूम नहीं आपको लख्खा सिंह याद है कि नहीं ?नई पीढ़ी तो शायद इनका नाम भी नहीं जानती होगी।

खैर,अभी भी समय है देर नहीं हुई है।नेताओं के मकड़जाल से अपने नौनिहालों को निकालिये ।पहचानिए ऐसे तत्वों को जो आपके मासूम बच्चों के दिलों में नफरत का ज़हर घोल रहे हैं। उन्हें दंगाई बना रहे हैं। ज़रा मालूम करिए जिस मासूम बच्चे को चोट आई है वह किसी नेता का बेटा तो कत्तई नहीं होगा यह मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ। छोटे-छोटे मासूम बच्चों के हाथों में डंडा जो लोग पकड़ा रहे है उनके हाथों में कलम और पीठ पर बस्ता होना चाहिए।सोंचिये क्या हासिल होगा।उस समाज से जहाँ अशांति और नफरत होगी। अभी भी संभल जाइए और दूसरों को संभालिये ,भाई मेरे! इससे पहले कि बहुत देर हो जाये !

उनका जो काम है वो अहले सियासत जानें
अपना पैग़ाम मोहबत है जहाँ तक पहुंचे।

 

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