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बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति रोकेंगे ‘ मनदूत ’ व ‘ मनपरी ’

 

71 स्कूल-कालेज में बच्चों को दूत के तौर पर तैयार करने के लिए प्रशिक्षित हुए नोडल शिक्षक

बच्चों में मानसिक रोग की पहचान व इलाज के लिए भी दी गयी विस्तार से जानकारी

गोरखपुर. जिले के 71 स्कूल-कालेज के पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच ‘मनदूत’ व ‘मनपरी’ बनाए जाएंगे। इस संबंध में इन विद्यालयों के नोडल शिक्षकों को मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. श्रीकांत तिवारी की अध्यक्षता में प्रेरणा श्री सभागार में मंगलवार को प्रशिक्षित किया गया। सभी नोडल शिक्षक संबंधित विद्यालय में विद्यार्थियों के बीच से मनदूत व मनपरी ढूंढ कर उन्हें इस प्रकार प्रशिक्षित करेंगे कि अगर किसी साथी छात्र-छात्रा में आत्महत्या, अवसाद या मानसिक रोग की प्रवृत्ति दिखे तो वह शिक्षक को सूचित करें ताकि समय रहते विद्यार्थी की मदद की जा सके।

सीएमओ ने प्रशिक्षित शिक्षकों से अपील की कि वह बच्चों को इस प्रकार का वातावरण प्रदान करें जिससे वह खुल कर अपनी बात रख सकें। बच्चों में मानसिक बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग हर प्रकार का सहयोग देने को तैयार है।

राष्ट्रीय मानसिक रोग कार्यक्रम के नोडल अधिकारी एसीएमओ डॉ. आईवी विश्वकर्मा ने कहा कि आने वाले समय में गैर संचारी रोगों की समस्या बढ़ेगी। मानसिक रोग भी एक प्रमुख गैर संचारी बीमारी के तौर पर उभर रहा है।

मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित शाही ने बताया कि 50 फीसदी मानसिक रोगों की शुरुआत किशोरावस्था में 13 से 19 वर्ष के बीच होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वे के अनुसार 7.5 फीसदी लोग मानसिक रोग से ग्रसित हैं, जबकि 50-60 फीसदी लोग तनाव में रहते हैं। ऐसे में अगर अध्ययन काल में ही मानसिक रोगों पर ध्यान दिया जाए तो हालात बदल सकते हैं।

मुख्य प्रशिक्षक नैदानिक मनोवैज्ञानिक रमेंद्र त्रिपाठी ने विद्यार्थियों के सामने आने वाली समस्याएं जैसे सीखने की अक्षमता, पढ़ाई छोड़ देना, शैक्षणिक पिछड़ापन, व्यवहार विकृति, भाषा दोष, प्रतिभाशाली बालकों, मानसिक दुर्बल बालक, शारीरिक दिव्यांग, अलाभांवित बालकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चों की पहचान कर उनको उचित मार्गदर्शन व परामर्श देने के अलावा विहित परिस्थितियों में मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सक के पास अवश्य भेजें। उन्होंने बच्चों में प्रमुख तौर पर होने वाली दो बीमारियों ऑटिज्म व अटेंशन डेफीशीट हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर (एडीएचडी) के बारे में बताया और कहा कि भारत में दस हजार लोगों में से 20 लोग ऑटिज्म के शिकार हैं। वहीं 1 से 12 प्रतिशत बच्चों में एडीएचडी की समस्या है और यह बीमारी प्रायः 7 वर्ष से 12 वर्ष की अवस्था के बीच में होती है। उन्होंने लाइफ स्किल्स के माध्यम से बच्चों में अवसाद, आत्महत्या व अन्य मानसिक बीमारियों की रोकथाम के बारे में भी जानकारी दी।

कार्यक्रम को जिला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी केएन बरनवाल ने भी संबोधित किया। प्रशिक्षक ने नोडल शिक्षकों की तरफ से पूछे गए सवालों का भी जवाब दिया। इस अवसर पर एनसीडी सेल से अजय सिंह, मानसिक रोग कार्यक्रम टीम से संजीव कुमार, प्रदीप वर्मा, विष्णु शर्मा प्रमुख तौर पर मौजूद रहे।

मोटिवेटर की भूमिका में आना होगा

अभयनंदन इंटर कॉलेज के नोडल शिक्षक दीप्तिमान श्रीवास्तव ने कहा कि प्रशिक्षण में कई उपयोगी व नयी बातें जानने का मौका मिला है। शिक्षक को विद्यार्थी के मोटिवेटर के तौर पर सामने आना होगा। जीजीआईसी की शिक्षिका उमेश्वरी गुप्ता ने बताया कि यह उनके लिए बिल्कुल नया प्रशिक्षण है। बच्चों को सभी बातें सिखानी हैं और बताना है कि जीवन में चाहे कितनी भी समस्याएं हों, कूल रहना चाहिए। नवल्स एकेडमी के शिक्षक सुरेंद्र यादव ने बताया कि जिन मानसिक बीमारियों के लक्षण बताए गए हैं वह आसपास दिखती हैं। प्रशिक्षण के बाद इनकी रोकथाम में सभी को मदद मिलेगी

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