स्मृति

हम और हमारे जैसे कई माता-पिता डॉ साहब के ऋणी हैं

डॉ वाई डी सिंह के आकस्मिक निधन की खबर से मेरा पूरा परिवार मर्माहत है। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में 25 जुलाई 1990 की रात मेरी पुत्री ऑपेरशन से पैदा हुई । जन्मते ही उसे सीवियर जॉन्डिस हो गया। मां फीमेल वार्ड में भर्ती हुई और न्यूबॉर्न चिल्ड्रन वार्ड के इनक्यूबेटर में बच्ची को रख दिया गया।

मौके पर मौजूद जूनियर डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। रात किसी तरह उहापोह में कटी।अगली सुबह डॉ सिंह जो कि उस वक्त हेड ऑफ डिपार्टमेंट थे ,वार्ड में आए। मैं निराश सशंकित खड़ा था। बच्ची का निरीक्षण करने के बाद बड़ी आत्मीयता से मेरे कंधे पर हाथ रखकर डॉ साहब ने दिलासा दी। इसके बाद तत्काल विभाग के डॉक्टरों को भी वहीं बुला लिया । काफी समय तक उनमें आपसी विचार विमर्श हुआ।अंत में डॉ साहब ने कहा कि एक कोशिश करते हैं, इसे एक्सपेरिमेंट मान लीजिये, बाकी भगवान के हाथ में है।

मेरे खून से कई चक्र में बच्ची के खून का ट्रांसफ्यूजन किया गया।दिन में चार से छह बार डॉ साहब देखने आते रहे।कई बार तो रात में 12 से 2 बजे के बीच भी आए। मेरी ड्यूटी थी हर घंटे पर इस नन्हीं सी जान को सुरक्षित ढंग से उसकी मां के पास फीडिंग के लिए ले जाना और फिर वापस लाना।उस समय आंधी तूफान के साथ बारिश की झड़ी लग रही थी।ऐसे में दोनों वार्ड के बीच ओवरब्रिज जैसे रास्ते को पार करके आना जाना भी दुष्कर था।दस दिन अनवरत यह क्रम चलता रहा।

यह सिर्फ और सिर्फ डॉ वाई डी सिंह की देन थी जो ग्यारहवें दिन बच्ची को सही सलामत घर वापस लाना संभव हो सका। हम और हमारे जैसे कई माता पिता डॉ साहब के ऋणी हैं।

ऐसे यशस्वी और धुन के पक्के चिकित्सक का निधन समाज की अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं । हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि !

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