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300 साल पुरानी सुरंग है मियां साहब इमामबाड़ा में

सुरंग का बाहरी दरवाजा

 

गोरखपुर। मियां साहब इमामबाड़ा इस्टेट के दामन में बहुत सारे वाकयात ऐसे है जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं या बिल्कुल ही नहीं जानते। यह तो सबको पता है कि हजरत सैयद रौशन अली शाह का हुक्का, चिमटा, खड़ाऊ, तस्बीह, दांत, बर्तन, धूनी, सोने-चांदी-लकड़ी की ताजिया आदि आज भी इमामबाड़ा में मौजूद है। लेकिन हजरत सैयद रौशन अली से जुड़ी सुरंग के बारे में किसी को पता नहीं है।

सुरंग का मुख्य दरवाजा

अभी तक आप लोगों ने गोरखपुर इमामबाड़ा से वाबस्ता तमाम वाकया व तारीख के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन आज हम आपको इमामबाड़े मे एक सुरंग होने के बारे में बताने जा रहे हैं। जी हां यहां पर एक सुरंग भी है जिसे सालों पहले बंद कर दिया गया है। इमामबाड़ा में करीब तीन सौ साल पुरानी एक ऐसी सुरंग है जिस पर पर्दा पड़ा हुआ है।

मियां साहब इमामबाड़ा इस्टेट के मुख्तार-ए-आम आबिद अली हैं। जो सन् 1970 से लेकर अब तक यानी करीब 49 सालों से मुख्तार-ए-आम की अहम जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 1970 से अब तक मुख्तार-ए-आम रहे आबिद अली की ज़बानी, सुरंग के राज खुले हैं। साल 1970 से इमामबाड़े के मुख्तार-ए-आम आबिद अली ने बताया कि सैयद जव्वाद अली शाह के दौर मे तीन माह मुख्तार-ए-आम की जिम्मेदारी निभाने का मौका उन्हें हासिल हुआ। उनके बाद वह साल 1974 से 1988 तक सैयद मज़हर अली शाह के दौर में मुख्तार-ए-आम रहे और साल 1988 से लेकर अब तक अदनान फर्रुख शाह दौर के मुख्तार-ए-आम हैं। इमामबाड़े की देख रेख की जिम्मेदारी आबिद अली की ही सरपरस्ती में होती है। आबिद अली बताते हैं कि इमामबाड़ा मे एक सुरंग है। जिसके बारे में बुज़ुर्गों ने बताया था। सुरंग यहां से कुसम्ही जंगल मे निकलती थी। मौजूदा वक्त मे सुरंग का मोहाना सील है। तस्वीरों में आपको एक हरे रंग का दरवाज़े का चौखट बाज़ू नज़र आ रहा होगा, यह वही सुरंग का बाहरी दरवाज़ा है। दूसरी तस्वीर में आप गौर करेंगे तो आपको एक छोटा दरवाज़ा नज़र आ रहा होगा, जिस पर कुछ मज़हबी (अल्लाह-मोहम्मद का) पोस्टर चस्पा है, यह सुरंग को जाने वाला मेन दरवाज़ा है।

हजरत सैयद रौशन अली शाह की मजार

उन्होंने बताया कि मियां साहब इमामबाड़ा में मौजूद सुरंग के जरिए ही हजरत सैयद रौशन अली अक्सर कुसम्ही जंगल जाया करते थे। कुसम्ही जंगल मे जहां पर सुरंग निकलती थी, वहीं साखू के दो दरख्त हुआ करते थे। हज़रत रौशन अली ने दरख्त का नाम सुंदर-मुंदर रखा हुआ था, उसी दरख्त के साये में ही बने चौबूतरे पर हजरत सैयद रौशन अली शाह बैठकर अल्लाह की इबादत मे मशगूल रहते थे।

आबिद अली एक वाकया याद कर बताते हैं कि बहुत साल पहले उन्हे जानकारी मिली की हज़रत सैयद रौशन अली के चबूतरे के पास लगे सुंदर-मुंदर दरख्त को काटा जा रहा है। इसी बीच उन्हें जानकारी मिली की दरख्त पर जिस-जिस जगह पर टांगी से वार किया गया था वहां खून जैसा पदार्थ निकलने लगा, जिसके बाद दरख्त को काटने से रोक दिया गया था। वह बताते हैं कि बाद में सुंदर-मुंदर दरख्त खुद ब खुद सूख गया। यह भी बताया जाता है कि हजरत रौशन अली शेर की सवारी करते थे।

गूगल मैप के अनुसार मियां साहब इमामबाड़ा से कुसम्ही जंगल की दूरी करीब 11. 2 किलोमीटर है। आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि सुरंग कितनी लंबी होगी। यह सुरंग कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना रही होगी। इमामबाड़ा के चार दरवाज़े हैं। जिनका रुख पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की ओर है। इमामबाड़ा में ही एक ओर कब्रिस्तान है। जहां जव्वाद अली शाह समेत खानदान के दीगर लोगों की कब्र है। वहीं हजरत रौशन अली शाह और उनके शागिर्द अहमद अली शाह व वाजिद अली शाह की कब्र इमामबाड़ा की दूसरे स्थान पर है। आबिद अली ने बताया कि जहां हजरत सैयद रौशन अली शाह की मजार है उसी के करीब एक दरवाजा है। जो हरे रंग का है। वह अमूमन बंद रहता है। सुरंग का बाहरी दरवाजा करीब तीन फिट चौड़ा और पांच फिट ऊंचा है। उसके अंदर दाखिल होने पर सुरंग का मुख्य दरवाजा बिल्कुल सामने नज़र आता है। सुरंग का मुख्य दरवाजा करीब 2.5×3 फिट है।

सुरंग के मुहाने पर लगे छोटे दरवाजे पर लटका हुआ ताला आसानी से देखा जा सकता है। यह भी जानकारी मिली है कि सुरंग के मुख्य द्वार के अंदर एक कमरा है और उसमें एक दीवार ऐसी है जो चुनवायी गयी है। जिसे खोलने का प्रयास कभी नहीं किया गया। संभव है यही सुरंग का मार्ग हो। आबिद अली ने सुरंग के जरिए हजरत सैयद रौशन अली शाह के कुसम्ही जंगल जाने का वाकया बुजुर्गों से पीढ़ी दर पीढ़ी सुना है। मशायख-ए-गोरखपुर किताब में लिखा है कि हजरत सैयद रौशन अली शाह को इमामबाड़ा से बाहर जाते नहीं देखा जाता था। इससे इस बात को बल मिलता है कि हजरत सैयद रौशन अली बाहर जाने के लिए सुरंग का प्रयोग करते रहे होंगे।

मौजूदा भव्य इमामबाड़ा की तामीर अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने करवायी थी। अवध के नवाब जब कोई इमामबाड़ा या इमारत तामीर करवाते थे तो उसमें सुरंग भी बनवाते थे। पूरी संभावना है कि हजरत रौशन अली की सहूलियत के लिए यह सुरंग बनवायी गयी हो। लखनऊ के मशहूर इमामबाड़ा में भी सुरंग है।  मियां साहब इमामबाड़ा के गेट पर अवध का राजशाही चिन्ह मछली बना हुआ है।

आबिद अली

इमामबाड़ा इस्टेट के सज्जादानशीं सैयद अदनान फर्रुख शाह से हकीकत जाननी चाही तो उनका कहना था कि हम भी अपने बुज़ुर्गों से सुरंग के बारे मे सुनते तो आए हैं लेकिन, हकीकत का पता आज तलक नहीं चल सका है। उन्होंने बताया कि पहले दरवाज़े के सामने जो छोटा दरवा़ज़ा नज़र आता है उसके पीछे भी कुछ जगह है, छोटे दरवाज़े के भी आगे वाली जगह की दीवार से चुनाई की हुई दिखाई देती है। उससे पहले एक फर्श भी है।

जब रिपोर्टर ने उनसे दीवार के पीछे की हकीकत जाननी चाही तो उनका कहना था कि आपको तो पता ही होगा कि यह संपत्ति वक्फ है। इसलिए दीवार खुलवाना हमारे लिए मुनासिब नहीं है। उन्होंने ने यह भी कहा कि दीवार हटाने के बाद न जाने वहां क्या हो, ज़हरीली गैस भी निकल सकती है, जिससे जानी नुकसान भी हो सकता है। इसलिए हमनें ऐसी कोशिश कभी नहीं की।

मियां साहब इमामबाड़ा स्टेट के संस्थापक हजरत सैयद रौशन अली शाह ने 1717 ई. में इमामबाड़ा तामीर किया। विकीपीडिया में भी इमामबाड़ा की स्थापना तारीख 1717 ई. दर्ज है। वहीं ‘मशायख-ए-गोरखपुर’ किताब में इमामबाड़ा की तारीख 1780 ई. दर्ज है। हजरत सैयद रौशन अली शाह बुखारा के रहने वाले थे। वह मोहम्मद शाह के शासनकाल में बुखारा से दिल्ली आये। दिल्ली पर अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय इस परम्परा के सैयद गुलाम अशरफ पूरब (गोरखपुर) चले आये और बांसगांव तहसील के धुरियापार में ठहरे। वहां पर उन्होंने गोरखपुर के मुसलमान चकलेदार की सहायता से शाहपुर गांव बसाया। इनके पुत्र सैयद रौशन अली अली शाह की इच्छा इमामबाड़ा बनाने की थी। गोरखपुर में उन्हें अपने नाना से दाऊद-चक नामक मोहल्ला विरासत में मिला था। उन्होंने यहां इमामबाड़ा बनवाया। जिस वजह से इस जगह का नाम दाऊद-चक से बदलकर इमामगंज हो गया।

मियां साहब की ख्याति की वजह से इसको मियां बाजार के नाम से जाना जाने लगा। उस समय अवध के नवाब आसिफुद्दौला थे। जिन्होंने दस हजार रुपया इमामबाड़ा की विस्तृत तामीर के लिए हजरत सैयद रौशन अली शाह को दिया। हजरत रौशन अली शाह की इच्छानुसार नवाब आसिफुद्दौल ने छह एकड़ के इस भू-भाग पर हजरत सैयदना इमाम हुसैन की याद में मरकजी इमामबाड़े की तामीर करवाया। करीब 12 साल तक तामीरी काम चलता रहा। जो 1796 में मुकम्मल हुआ। अवध के नवाब आसिफुद्दौला की बेगम ने सोने-चांदी की ताजिया यहां भेजीं। जब अवध के नवाब ने गोरखपुर को अंग्रेजों को दे दिया तब अंग्रेजों ने भी इनकी माफी जागीर को स्वीकृत प्रदान कर दी। इसके अतिरिक्त कई गुना बड़ी जागीर दी।
“मशायख-ए-गोरखपुर” किताब में आपकी जिंदगी पर विस्तृत रोशनी डाली गयी है। हजरत सैयद रौशन अली का निधन 1818 में हुआ। सुरंग में हजरत रौशन अली शाह की यादें समाई हुई है।

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