पर्यावरण समाचार

नदी सम्मेलन में उठी आवाज-पानीदार इलाके को बेपानी नहीं होने देंगे

गोरखपुर। पूर्वांचल नदी मंच द्वारा आज तारामंडल स्थित सभागार में आयोजित नदी सम्मेलन में नदियों, तालों को बचाने के लिए आवाज उठी और इसके लिए आंदोलन छेड़ने पर बल दिया गया। देवरिया, कुशीनगर, महराजगंज, देवरिया, संतकबीरनगर से आए विभिन्न नदियों व जलाशयों के किनारे रहने वाले गांवों के लोगों व कार्यकर्ताओं ने कहा कि जीवनदायिनी नदियां प्रदूषण, अवैध कब्जे, अतिक्रमण, बालू खनन, तटबंधों के निर्माण आदि से अपने अस्तित्व से जूझ रही हैं। इन्हें अविरल, अतिक्रमण मुक्त और प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए एक संगठित आंदोलन की जरूरत है। हम पानीदार इलाके को बेपानी नहीं होने देंगे।
नदी सम्मेलन के प्रारम्भ में संचालन कर रहे पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने पूर्वांचल नदी मंच के गठन और प्रस्तावित पूर्वांचल नदी यात्रा के उद्देश्यों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि आमी नदी और रामगढ़ ताल को बचाने के संघर्ष और उसकी सफलता से उत्साहित होकर विभिन्न संगठनों, पर्यावरणविदों, नागरिक समूहों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन को विस्तारित व व्यापक बनाने का फैसला किया है और इस निमित्त पूर्वांचल नदी मंच का गठन किया है। आज का नदी सम्मेलन पहला कार्यक्रम है जिसमें गोरखपुर-बस्ती मंडल में नदियों और जलाशयों को संरक्षित करने की लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसमें आमंत्रित किया गया है ताकि पूर्वांचल नदी यात्रा व आगे की आंदोलन की रणनीति और मुद्दे पर आपसी समझ बनायी जा सके।

गोरखपुर इनवायरमेंट एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डा. सिराज वजीह ने बातचीत को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सरयूपार मैदान का 60 फीसदी भूभाग नदियों, छाड़न झीलों, तालाबों से आच्छादित है और इस क्षेत्र के बहुतायत जनता इन्ही जल स्रोतों के जरिए कृषि पर निर्भर है लेकिन हाल के वर्षों में काफी परिवर्तन आया है। आज देश के अन्य हिस्सों की तरह पूर्वाचल की नदियों को बाढ़ बचाव और सिंचाई के नाम पर तटबंधों, ठोकरों का निर्माण और नदियों की धारा को मोड़ने का काम किया जा रहा है। इससे नदियां पतली हो रही हैं। फौरी तौर पर इससे बाढ़ से बचाव तो दिखता है लेकिन आगे चलकर भारी नुकसान होगा। उन्होंने बिहार में कोसी नदी पर बाढ़ बचाव के लिए बनाए गए तटबंध और ब्रिज के कारण सैकड़ों एकड़ खेत के रेत में बदल जाने का जिक्र करते हुए कहा कि लोगांे को नदियों से काटा जा रहा है। नदियों की देखभाल सरकारें नहीं कर सकती। स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने पूर्वांचल की नदियों के अविरलता के लिए लिए नेपाल-भारत में सरकारी स्तर के अलावा नागरिक स्तर पर संवाद पर बल दिया।
देवरिया के बनकटा ब्लाक में स्याही नदी को बचाने के लिए आंदोलन चला रहे छोटेलाल कुशवाहा ने स्याही नदी के सूख जाने की व्यथा सुनायी। उन्होंने कहा कि कुछ बड़े लोगों ने अपने फायदे के लिए स्याही नदी के प्रवाह क्षेत्र को अवरूद्ध कर दिया है। स्याही नदी के सूख जाने से भूजल स्तर नीचे चला गया है और लोगांे को पेयजल और किसानों को सिंचाई के संकट से जूझना पड़ रहा है। विविध प्रकार के जलीव जीव व वनस्पतियां विलुप्त हो रही हैं। संतकबीरनगर जिले के कोपिया से आए अरविंद पाठक ने कहा कि आमी नदी के प्रदूषण से खेतों की उर्वरता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। कृषि पैदावार कम हो गई है। इंडिया मार्का हैण्डपम्प और टयूबवेल सूख रहे हैं।

भौवापार से आए आलोक शुक्ल ने नदोर ताल पर हो रहे अवैध कब्जे की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए कि करीब दो हजार एकड़ के इस ताल में हरदम पानी रहता था लेेकिन अब इसको राप्ती नदी और ताल के बीच तटबंध बना दिया गया है जिससे यह ताल सूख रहा है और बिल्डर इस पर कब्जा जमा रहे हैं। उन्होंने बिना अध्ययन और प्रभाव के मूल्यांकन बिना बालू खनन से राप्ती नदी पर पड़ रहे प्रभावों का भी जिक्र किया। भीटी खोरिया के दीपक पांडेय ने भगवानपुर नदी और चैरहिया ताल पर कब्जे और प्रदूषण का मुद्दा उठाया और कहा कि प्रदूषण के कारण पीने का पानी भी पीने लायक नहीं रह गया है।
कुशीनगर जिले के नौरंगिया से आए नरेन्द्र प्रताप शर्मा ने बांसी नदी के प्रदूषण और उसके सूखते जाने की कहानी बयां की। उन्होंने बताया कि यह नदी यूपी और बिहार की सीमा तय करती है। यह ऐतिहासिक नदी है और इसके तट पर आज भी बड़ा मेला लगता है लेकिन नदी इस कदर प्रदूषित हो गई है कि नदी तट पर खड़ा नहीं रहा जा सकता। रेगुलेटर बनने से गंडक नदी का पानी इसमें नहीं आ रहा है जिससे नदी अब काफी कम पानी रह गया है। कबीर मठ, मगहर से आए हरिशरण शास्त्री ने मगहर नदी को प्रदूषण मुक्त और अविरल बनाने की दिशा में नेशनल ग्रीन टिब्यूनल द्वारा गठित मानीटरिंग कमेटी द्वारा उठाए गए कदमों की प्रशंसा की और कहा कि नदियों को बचाने का कार्य एक सांस्कृतिक आंदोलन भी है।

आमी बचाओ मंच के अध्यक्ष विश्वविजय सिंह ने आमी को बचाने के 12 वर्ष के संघर्षों के अनुभव साझा किए और कहा कि नदियां वोट नहीं उगलती, इसलिए राजनीतिक तंत्र को इनकी परवाह नहीं है। आमी नदी को बचाने के लिए सीटीपी सहित तमाम उपायों को कराने के लिए शासन और प्रशासन से आज भी हर कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है। अभी भी आमी को प्रदूषण मुक्त व अविरल बनाने के लिए स्थायी समाधान नहीं हुआ है और जब तक यह नहीं होता है आंदोलन चलता रहेगा। हम इस आंदोलन को अब पूरे पूर्वांचल मे विस्तारित करेंगे। उन्होंने कहा कि आरती करने और दिए जलाने से नदियां पुनर्जीवित नहीं होंगी। इसके लिए ठोस वैज्ञानिक योजना बनानी होगी और इसमें स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों की सम्मिलित भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। श्री सिंह ने कुंभ मेला में छोटी नदियों के संरक्षण के लिए हुए सम्मेलन में हुई चर्चा की जानकारी साझा की और कहा कि पूर्वांचल नदी यात्रा पानीदार इलाके को बेपानी होने से बचाने का आंदोलन है।
सामाजिक कार्यकर्ता चतुरानन ओझा ने देवरिया में कुर्ना नदी की वर्तमान हालत बयां करते हुए कहा कि आज से नाला बना दिया गया है और इस नाले में देवरिया नगर का अपशिष्ट जल प्रवाहित हो रहा है। इसके किनारे की भूमि पर कब्जे हो रहे हैं। उन्होंने गांवों के पोखरे-तालाबों के संरक्षण को भी इस आंदोलन का एजेंडा बनाने का वकालत की। श्री ओझा ने घाघरा के वेट लैंड में विकास की विभिन्न परियोजनाओं पर सवाल उठाया और कहा कि इन परियोजनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
समाजवादी नेता फतेहबहादुर सिंह ने महराजगंज जिले के महाव नदी के प्रवाह क्षेत्र को अवरूद्ध करने और उस पर बने तटबंध के टूटने-बनाने में हर वर्ष हो रहे भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए कहा दुनिया भर में सबसे ज्यादा खेल पानी को लेकर हो रहा है। नदियों को बचाने की लड़ाई पानी पर हमारे अधिकार की लड़ाई है और मानवता की रक्षा के लिए यह आवश्यक है। उन्होंने पानी के विक्रय पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चैधरी ने रामगढ़ ताल परियोजना के विरोध में 1984 में चले आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि कार्पोरेट लूट ने हमारी नदियों और जलाशयों को खतरे में डाला है और इसका प्रभाव सबसे अधिक सामान्य लोगों पर पड़ा है।

अध्यक्षीय सम्बोधन में पूर्व कुलपति प्रो राधेमोहन मिश्र ने कहा कि जहां जल नहीं वहां जीवन नहीं है। जल जैसा कोई और द्रव्य नहीं है। पूर्वांचल नदियों और जलाशयों से सम्पन्न है लेकिन इस क्षेत्र में आज कई नदियां व जलाशय विलुप्त हो रहे हैं। हम आज जिन्हें नाला कह रहे हैं वे दरअसल विलुप्त होती नदियां हैं। प्रो मिश्र ने नदियों, जलाशयों पर कब्जे को आपराधिक कृत्य करार दिया और कहा कि यह कार्य भविष्य की पीढी को संकट में डालने जैसा है। उन्होंने कुशीनगर में हिरण्यवती व कुकुत्था नदी की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डाला और कहा कि पूर्वांचल नदी यात्रा की शुरूआत इसी स्थान से होनी चाहिए।
नदी सम्मेलन में खजनी से आए रामजी वर्मा, उनवल से आए प्रेम साहनी, हरपुर बुदहट से आए जीपी शुक्ला जलरही से आए सुग्रीव सिंह ने भी अपनी बात रखी और इस आंदोलन में अपनी सहभागिता की घोषणा की। इस मौके पर इंकलाबी नौजवान सभा के सुजीत श्रीवास्तव, लेखक आंेकार सिंह, सत्येन्द्र, सत्येन्द्र सार्थक आदि उपस्थित थे

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