साहित्य - संस्कृति

नफरत के खिलाफ अदब का प्रोटेस्ट है ‘ मै मुहाजिर नहीं हूं ’ – शारिब रुदौलवी

लखनऊ, 10 जून। कथाकार-उपन्यासकार बादशाह हुसैन रिजवी के उपन्यास ‘मै मुहाजिर नहीं हूं’ के उर्दू संस्करण का 9 जून को यूपी प्रेस क्लब में विमोचन हुआ। इस उपन्यास का हिन्दी संस्करण 2011 में आ चुका है। इसका उर्दू अनुवाद डाॅ वजाहत हुसैन रिजवी ने किया है।

इप्टा व प्रलेस द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की सदारत उर्दू के मशहूर अदीब शारिब रुदौलवी ने किया। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में जिस हल्लौर की कथा है, वह पूरे हिन्दुस्तान का प्रतीक है। हमारी मिली-जुली विरासत को यह सामने लाता है। उर्दू में इसका संस्करण आना जरूरी था। आज नफरत का जिस तरह का माहौल है, यह उपन्यास रचनाकार का प्रोटेस्ट है। जरूरी है कि हिन्दी अदब को उर्दू में तथा उर्दू अदब को हिन्दी में लाया जाय ताकि अदब दोनों जबान तक पहुंच सके।

समारोह को संबोधित करते हुए आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा कि यह उपन्यास बादशाह हुसैन रिजवी के व्यक्तित्व का विस्तार करता है। देश का विभाजन पोलिटिकिल ट्रेजडी ही नहीं, वह पर्सनल ट्रेजडी भी रही है। इस उपन्यास में इसका यही रूप सामने आता है। उपन्यासकार का अपनी जड़ों की तलाश है। इसके साथ ही बेहतर समाज की कामना भी है। इसमें रचनाकार की सकारात्म अभिव्यक्ति है, साथ ही उसके प्रतिरोध का बयान भी।

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स्वप्निल श्रीवास्तव ने बादशाह हुसैन रिजवी के साथ को साझा करते हुए रोचक संस्मरण सुनाये। उनकी ‘मछली’, ‘खोखली आवाज’, ‘दुश्मन’ आदि कहानियों की चर्चा करते हुए कहा कि इनकी कहानियां अपने पर तंज कसती हैं। ये दूख काो व्यक्त  करने तथा जीवन को छु लेने वाली कहाानियां है। इस मौके पर उन्होंने बादशाह हुसैन रिजवी पर उनके जीवन काल में एक कविता का पाठ भी किया।

जसम के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर का कहना था कि यह मजहब के नाम पर देश के बंटवारे के खिलाफ हिन्दुस्तान की उस संस्कृति के पक्ष में है जो बहुलतावाद व इन्द्रधनुषी छटा वाली है। इसमें अपनी जड़ों से कट जाने का दर्द है। इसी दर्द को हम तस्लीमा नसरीन और मकबूल फिदा हुसैन में भी पाते हैं। यह उपन्यास मुसलमानों की हालत को भी सामने लाता है जिन्हें पाकिस्तान में मुहाजिर, बांगला देश में बंगाली मुसलमान तो वहीं आज के हिन्दुस्तान में उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है। यह उपन्यास इसके प्रतिवाद में है, एक जिद्द की तरह। देने की।इसमें लेखक का जिद्द और प्रतिवाद व्यक्त हुआ है।

कथाकार किरण सिंह ने कहा कि यह आत्मकथात्मक शैली में लिखा उपन्यास है जिसमें विरासत व इतिहास के साथ जो आधुनिकता आ रही है, उसका वर्णन है। मीरा बाबा ने हल्लौर कस्बा बसाया, इससे लेकर मोहर्रम का समृद्ध वर्णन इसमें मिलता है। इसमें पात्रों के रूप में ‘ लेखक स्वयं मौजूद है। उसके आबजर्वेशन व विचार पात्रों के माध्यम से व्यक्त होता है।

लमही’ के संपादक विजय राय का कहना था कि लेखक अपने अतीत के प्रति काफी भावुक है। आजादी के पहले जो मानव मूल्य थे, आपसी भाईचारा था, उसे लेखक बचाना चाहता है। उसी में वह असली हिन्दुस्तान को देखता है। इप्टा के महासचिव राकेश ने कहा कि हमारी साझी संस्कृति की जो विराट परम्परा है, यह उपन्यास उसी की रचनात्मक अभिव्यक्ति है।

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उपन्यास के अनुवादक डाॅ वजाहत हुसैन रिजवी ने भी अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि अनुवाद कार्य के लिए मेरे चचा जान बादशाह हुसैन रिजवी ने मुझे प्रेरित किया। आज मै जो भी हूं उनकी वजह से हूं। बोलते हुए वे इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखें छलछला आई और आगे नहीं बोल पाये।

कार्यक्रम का संचालन लेखक शकील सिद्दीकी ने किया। इस मौके पर बादशाह हुसैन रिजवी के बेटे व इप्टा के प्रान्तीय सचिव शहजाद रिजवी के साथ बड़ी संख्या में हिन्दी व उर्दू के रचनाकार माौजूद थे जिनमें हिना रिजवी, मोहसिन खां, उषा राय, वीरेन्द्र सांरग, श्याम अंकुरम, अशोक श्रीवास्तव, रिषी श्रीवास्तव, सुशील सीतापुरी, ज्ञानचन्द्र शुक्ल, राजेश श्रीवास्तव, संतोष डे, राजू पाण्डेय आदि प्रमुख थे।