समाचार

पक्ष चुनना ही राजनीति है : प्रो राजेन्द्र कुमार

हिंदी विभाग में ‘ समाज ,राजनीति और लेखक ‘ विषय प्रो राजेन्द्र कुमार का व्याख्यान

गोरखपुर. आज हिंदी विभाग में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष तथा प्रसिद्ध आलोचक प्रो राजेन्द्र कुमार का व्याख्यान आयोजित किया गया । ‘ समाज ,राजनीति और लेखक ‘ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए प्रो राजेन्द्र कुमार ने अपने समय के संकटों की चर्चा करते हुए लेखकीय दायित्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पक्ष चुनना ही राजनीति है.

प्रो राजेन्द्र कुमार ने कहा कि भौतिक वस्तुओं के निर्माण के लिए कल – कारखानों की भूमिका बन सकती है , पर मनुष्यता के निर्माण के लिए हमे साहित्य चाहिए । वह साहित्य ही है , जिससे हम भावों – संवेदनाओं की दुनिया की रचना कर सकते हैं । इसके बिना आदमी केवल मशीन हो सकता है , आदमी नहीं ।

उन्होंने नवजागरण के दौर से लेकर आजादी के बाद तक के भारत में लेखक और राजनीति के घनिष्ठ संबंधों के अनेक संदर्भ दिए और बताया कि साहित्य के मशाल के रूप में राजनीति के आगे- आगे चलने या राजनीति के लड़खड़ाने पर साहित्य द्वारा आगे बढ़कर संभाल लेने की बातें इन्हीं संबंधों के गहरे अनुभव की उपज थीं ।

उन्होंने कहा कि राजनीति के पतनशील रूपों के कारण लोगों ने उसे त्याज्य समझ लेने की भूल की है । राजनीति एक पक्ष में खड़े होने के निर्णय – विवेक का नाम है । राजनीति पीड़ित समुदाय की सामाजिक – सांस्कृतिक मुक्ति के संघर्ष की पद्धति और दिशा का नाम है । राजनीति जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण है और साहित्य के लिए भी । राजनीति किसी राजनेता के लिए जितनी उपयोगी और ज़रूरी है , लेखक के लिए उससे जरा भी कम नहीं ।

प्रो राजेन्द्र कुमार ने कहा कि आज हमारे सामने राष्ट्रीय पैमाने पर को बड़ी चुनौतियां हैं , उनका सामना कोई लेखक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के बिना नहीं कर सकता । राजनीतिक प्रपंच को समझने के लिए भी राजनीतिक दृष्टि की ज़रुरत है । इस दौर में लेखक का काम इसके बिना असम्भव है ।

अध्यक्षता करते हुए प्रो चित्तरंजन मिश्र ने राजनीतिक तंत्र और व्यवस्था द्वारा लेखकों के सामने परोसे जाने वाले प्रलोभनों की चर्चा करते हुए बताया कि बड़े साहित्यकारों ने हमेशा इस आकर्षण और फिसलन से अपने को दूर रखा है । उनका मानना था कि ऐसे लेखक संस्कारों का निर्माण करते हैं और सरकारों के निर्माण में लगे हुए साहित्यकार दूसरे होते हैं । सरकारों की निगाहों में ऐसे लोभी – लालची लेखकों की चाहे जो भी हैसियत हो , जनता की नजरों में वे दो कौड़ी के लेखक होते हैं ।

हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो अनिल राय ने इस विषय को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सत्ता-केंद्रों के साथ लेखकों के बनते हुए सुविधाजनक सम्बन्धों के कारण जनता का साहित्य और लेखकों पर से भरोसा टूटता गया है और इसीलिए लेखक के सरोकार का सवाल लगातार ज़रूरी बनता गया है । लेखकीय सरोकार का प्रश्न सामाजिक – राजनीतिक प्रश्न है और आज के नए संदर्भों में इसपर विचार करने की ज़रुरत बढ़ गई है ।

प्रो आर डी राय ने पूरे आयोजन के निष्कर्षों पर प्रकाश डालते हुए सबके प्रति आभार व्यक्त किया । आयोजन में बड़ी संख्या में हिंदी विभाग के , शिक्षकों, शोधार्थियों , स्नातकोत्तर एवं पत्रकारिता के छात्र-छात्राओं के अलावा नगर के अनेक बुद्धिजीवियों की उपस्थिति रही ।

Leave a Comment