साहित्य - संस्कृति

‘ काव्य चातुर्य से बाहर निकलकर अपने समय के सच को साहस के साथ कहती हैं सदानन्द शाही की कविताएं ’


प्रेमचंद पार्क में प्रो सदानन्द शाही का कविता पाठ

गोरखपुर। बीएचयू में हिन्दी के प्रोफेसर सदानन्द शाही का कविता पाठ और उस पर बातचीत का आयोजन आज प्रेमचन्द पार्क में किया गया। प्रेमचन्द साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रो शाही ने हाल में प्रकाशित अपने तीसरे कविता संग्रह ‘ माटी पानी ’ से 12 कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ के बाद उनकी कविताओं पर चर्चा हुई।

‘ माटी पानी ’ प्रो शाही का तीसरा कविता संग्रह है। इसके पहले 1999 में उनका पहला कविता संग्रह ‘ असीम कुछ भी नहीं ’ प्रकाशित हुआ था। इसके बाद उनका दूसरा कविता संग्रह ‘ सुख एक बासी चीज है ’ प्रकाशित हुआ। आज कार्यक्रम में प्रो शाही ने  ‘ माटी पानी ’ संग्रह से ‘ ये आवारा फूल क्यों खिले हुए हैं ’ , ‘ चींटियों के लिए दो कविताए ’, ‘ झूठ जी से हालचाल ’, ‘ एक शिवरात्रि इस तरह भी मनाएं ’, ‘ मै कविता की दुनियां का स्थायी नागरिक नहीं हूं ’, ‘ दीवाली मनाएं, राजनीति हम करेंगे ’, ‘ एक कोलाज ’, ‘ काश, मै बनारसी हूं ’, ‘ कवि जी ! आप क्या कर रहे हैं ’, के अलावा दो भोजपुरी कविताएं ‘ हम गाय हंई, हमके गइए रहे द ’ और ‘ राम-रावण की नवकी लड़ाई ’ पढ़ी।

उनकी कविता पर बातचीत का प्रारम्भ रवि श्रीवास्तव के आलेख पाठ के साथ हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अशोक चौधरी ने यह आलेख पढ़ा। इस आलेख में रवि श्रीवास्तव ने कहा है कि सदानन्द शाही के इस संकलन की कविताएं अनूठी हैं। उनमें अनेक गुत्थियां हैं। वहां ठेरों पैबंद वाले लोकतंत्र की उलझने हैं, एक ठहरे हुए समाज की जड़ता को तोड़ने की जिद है, हाथी-दांत के मीनारों पर बैठे बुद्धिजीवी हैं, बीएचयू परिसर में बेटियों के पंख तराशने के महाभियान पर चली पुलिस की लाठियां हैं, देशप्रेम और देशद्रोह का पाखंड है,ठगी हुई जनता है, विज्ञापनों का झूठ है और इन सब पर गांधी की हंसी है। उनकी भोजपुरी की कविताएं गहरी आत्मीयता के अनुभवों से संपृक्त हैं। माटी पानी की कविताएं जीवन के विविध अनुभवों का कोलाज तैयार करती हैं। उनकी कविताओं में उत्साही आवेश दिखायी नहीं देता। वहां वर्तमान भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक संकटों और तर्कों को समझने वाला ठंडा दिमाग है।

चर्चा में भागीदारी करते इंदिरा गांधी राष्टीय मुक्त विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं वरिष्ठ कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि शाही जी की कविताएं काव्य चातुर्य से बाहर निकलकर सहजता के साथ अपने समय के सच को साहस के साथ कहती हैं। सरलता, सहजता उनकी ताकत है।  वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि सदानन्द शाही की कविताओं में व्यंग्य के गहरे तीर हैं, समाज की गंभीर विडम्बनाएं हैं।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर अनिल राय ने कहा कि सदानन्द शाही की कविताएं मुखर हैं और सर्वस्व को खोलकर सामने रख देती हैं। कविता के मर्म, आशय के अन्वेषण, अनुसंधान के लिए बहुत गहराई में उतरने की जद्दोजेहद नहीं करनी पड़ती। अमूर्तन और अस्पष्टता को कविता का गुण माना गया है लेकिन इतिहास के एक दौर में कविता को लाउड होना जरूरी होता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो शाही की कविताएं सद्य संवाद करने के सामथ्र्य से भरी हुई हैं। उन्होंने ‘ काश ’ कविता का उल्लेख करते हुए इस कविता को युद्ध के प्रभाव का मनोविज्ञान रचने वाली कविता बतायी।

आलोचक कपिलदेव ने कहा कि सदानन्द शाही की कविता को पुराने आस्वाद से नहीं पकड़ा जा सकता। जो नए आस्वाद से परिचित होंगे वहीं उनकी कविता को पकड़ पाएंगे। उन्होंने ‘ असीम कुछ भी नहीं ’ से कवि होते जाने की प्रक्रिया में लगातार विकसित होते हुए, कविता की परिभाषाओं से टकराते हुए अपनी जगह बनाई है। वह अपनी यात्रा में सिद्धान्त और विचारधारा से जीवन की ओर लौटने वाले कवि के बतौर चिन्हित हो रहे हैं।

बातचीत में हिस्सा लेते हुए प्रेमव्रत तिवारी ने सदानन्द शाही की कविता ‘ मंथराएं ’ का उल्लेख किया और उसका पाठ किया। संदीप राय, भानुप्रताप सिंह ने भी अपनी बात रखी। संचालन प्रेमचन्द साहित्य संस्थान के सचिव मनोज कुमार सिंह ने किया। इस अवसर पर डा. आनंद पांडेय, विकास द्विवेदी, सुजीत श्रीवास्तव, बैजनाथ मिश्र, बेचन सिंह पटेल, हरिद्वार, सुरेश सिंह, आनन्द राय, ओंकार  सिंह, महेश शुक्ल, संजय कुमार श्रीवास्तव, मान्धाता सिंह, अरूण प्रकाश पाठक, सत्येन्द्र सार्थक, विभूति ओझा आदि उपस्थित थे।

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