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प्रेमचंद हमारे इतिहास के नायक थे और हमारे अपने वक्त के भी नायक हैं : प्रो अनिल राय

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प्रेमचंद जयंती पर प्रेमचंद पार्क में प्रेमचंद और आज का समय पर व्याख्यान, नाटक व दास्तानगोई का आयोजन

गोरखपुर, 31 जुलाई। प्रेमचंद अपने समय के बड़े सवालों से टकराने वाले लेखक हैं। किसी भी लेखक के मूल्यांकन की सबसे बड़ी कसौटी यही होती है कि उसने अपने साहित्य में अपने समय, वर्तमान, समकाल, इतिहास के बड़े चुनौतीपूर्ण सवालों को उठाया है कि नहीं। प्रेमचंद इस कसैटी पर एकदम खरे उतरते हें। इसलिए वह जनता के नायक हैं। वह हमारे इतिहास के नायक थे और और हमारे अपने वक्त के भी नायक हैं।
यह बातें गोरखपुर विश्वविद्यलाय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर अनिल राय ने आज प्रेमचंद जयंती पर प्रेमचंद पार्क में प्रेमचंद और आज का समय विषय पर अपने व्याख्यान में कही। यह आयोजन प्रेमचंद साहित्य संस्थान ने किया था।
प्रो राय ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने वैचारिक गद्य लेखन जिसमें टिप्पणियां, लेख, सम्पादकीय, निबंध, भाषण शामिल है-में जीवन के हर पक्ष पर चिंतन किया है। उनके वैचारिक गद्य में विराट संसार का कुछ भी छूटा नहीं है।
उन्होंने कहा कि आज के संकट के बारे में वामपंथ और माक्र्सवाद के विरोधी भी यह स्वीकार करेंगे कि वह अपने समय से संतुष्ट नहीं है। वह यह नहीं कह सकते कि वर्तमान में सब कुछ अच्छा चल रहा है, हमारी जिंदगी बेहतर है ? यदि कोई इस सचाई को स्वीकार नहीं करता है तो उसकी संवेदनशीलता की वैधता पर सवाल उठेगा। आज के समय में संकटों का अंबार है। हालात ऐसे हैं कि हमारा सारा लिबास तार-तार हो रहा है और हमें रफू करने की जगह नहीं मिल रही है।
अलख कला समूह की दास्तानगोई
प्रेमचंद एक ऐसे लेखक हैं जिन्होंने ईश्वारवाद का कीर्तन कर सब कुछ नियति के हवाले करने से इंकार कर दिया था। वह तर्क-विवेक और कार्य कारण श्रृंखला में प्रवेश करते हुए समाज को समझते हैं। वह जानते हैं कि आज का वर्तमान अकस्मात नहीं है। इसको रचे जाने  के पीछे तमाम भौतिक-आर्थिक ऐतिहासिक कारण हैं जिसकी तर्क-विवेक और विज्ञान से व्याख्या की जा सकती है।
प्रेमचंद ने अपने लहू के एक-एक कतरे और जिंदगी के एक-एक लम्हे से समाज, भाषा, इतिहास का कर्ज उतारा है। कर्ज उतारने वाला लेखक अपने शत्रुओं का पहचानता है और समय की सत्ता की आंखों में आंख डालकर सवाल करता है। प्रेमचंद ने यही काम किया।
प्रो अनिल राय ने कहा कि प्रेमचंद अपने समय के दो सबसे बड़े सवालों-साम्राज्यवाद और सामंतवाद से टकरा रहे थे। इसलिए वह नवजागरण, स्वराज, स्वदेशी, किसानों-मजदूरों, स्त्रियों के सवाल के साथ-साथ मानसिक-आर्थिक-भौतिक गुलामी के प्रश्न को उठा रहे थे। अम्बडेकर जब भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति और वर्ण व्यवस्था के प्रश्न को लहूलुहान होकर उठा रहे थे, भारतीय साम्यवादी आंदोलन ने इस सवाल को वर्ग संघर्ष में हल होने की बात कर एक बड़ी चूक की। अपने को बोल्शेविक उसूलों का कायल होने और किसानों-मजदूरों का नया जमाना आने की बात करने वाले प्रेमचन्द ने वर्ण व्यवस्था के अंर्तविरोध को उठाकर अपने साहित्य से भारतीय साम्यवादी आंदोलन की इस बड़ी कमी को पूरा किया। इसलिए प्रेमचन्द के साहित्य को भारतीय साम्यवादी आंदोलन की क्षतिपूर्ति के तौर पर देखना और मूल्यांकन करना चाहिए।
उन्होंने कहा किप्रेमचन्द ने ऐसे समाज का सपना देखा जिसमें जाति-वर्ण व्यवस्था की कोई गंध नहीं हो। वर्ण व्यवस्था का नाश इस नए समाज की जरूरी शर्त थी। उन्होंने हमें बताया कि साम्राज्यवाद और सामंतवाद में नाभि नाल का संबंध है।
प्रो. राय ने कहा कि आज पूँजीवादी साम्प्रदायिक साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद के बरक्स प्रेमचंद के जनवादी प्रगतिशील राष्ट्रवाद को मजबूती से स्थापित करने का वक्त आ गया है। पूँजीवादी साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की कुल सचाई यही है कि वह साम्राज्यवादी शक्तियों के चरणों में लोट रहा है, नाक रगड़ रहा है। हमें जनता के राष्ट्रवाद की जरूरत है जिसके चिन्ह प्रेमचन्द के साहित्य में हैं।

प्रेमचंद के राष्ट्रवाद में-साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और सामंतवाद का विरोध है। वह स्वदेशी की बात करते हुए कहते हैं कि जब हम अपना माल उत्पादित कर सकते हैं तो अपनी खनिज सम्पदा देकर विदेशों से माल क्यों खरीदें ? उनके लिए स्वराज का प्रश्न केवल अंग्रेजों की देश से विदाई नहीं थी बल्कि आर्थिक और भौतिक स्वराज था। इस तरह वह हमारी वैचारिक चेतना को दिशा दे रहे थे। प्रेमचंद के स्वराज का मतलब था-भौतिक, आर्थिक अजादी, उत्पादन के साधनों पर मजदूरों-किसानों, भारतीय नागरिकों का नियत्रण और उत्पादन के उपभोग की स्वाधीनता।

प्रो राय ने कहा कि प्रेमचन्द ने मानसिक गुलामी को भौतिक-आर्थिक पराधीनता से भी खतरनाक माना और कहा साम्राज्यवाद हमारी आत्मा, चेतना को गुलाम बना लेता है। साम्राज्यवादए चेतना का उपनिवेशीकरण करता है। प्रेमचन्द ने एक लेखक के बतौर चेतना के उपनिवेशीकरण का डीउपनिवेशीकरण किया।
उन्होंने कहा कि हमारे प्रधान सेवक चेतना के उपनिवेशीकरण से ग्रस्त हैं, तभी तो कहते हैं कि मेरी जिद 1921 तक न्यू इंडिया की परिकल्पना साकार करने की है। हमें उनसे सवाल कराना चाहिए कि वह क्यों भारत को इंडिया या न्यू इंडिया बनाना चाहते हैं ? हमें इन राष्ट्रवादियों से सवाल पूछना है कि किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, आर्थिक-भौतिक गुलामी के बारे में इनको क्या कहना है ? प्रेमचंद की राष्ट्रीय चेतना ही वास्तविक राष्ट्रवाद है जिसके आइने में हमें नकली पूंजीवादी राष्ट्रवाद का विद्रूप पहचानना है और उसे सबके सामने लाना है।

इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार मदनमोहन ने की। संचालन प्रेमचन्द साहित्य संस्थान के सचिव मनोज कुमार सिंह ने किया। इस मौके पर देवेन्द्र आर्य, रवि राय, राजेश सिंह, फतेह बहादुर सिंह, जेएन शाह, अशोक चौधरी, मनोज मिश्रा, आनन्द पांडेय, अशोक श्रीवास्तव, शालिनी श्रीनेत, आलोचक एवं कवि चन्द्रेश्वर, चक्रपाणि ओझा, संदीप राय, फरूख जमाल, आशीष नंदन सिंह आदि उपस्थित थे।

अलख कला समूह की दास्तानगोई और इप्टा का नाट्य मंचन

व्याख्यान के बाद अलख कला समूह ने प्रेमचंद की दो कहानियों शतरंज के खिलाड़ी और पंच परमेश्वर पर आधारित दास्तानगोई प्रस्तुत की। इस दास्तानगोई को वरिष्ठ रंगकर्मी राजाराम चैधरी ने लिखा था। निदेशक बेचन सिंह पटेल का था। इसमें मीर साहब की भूमिका अनन्या, मिर्जा की भूमिका अनीस वारसी, कथा वाचक की भूमिका आशुतोष पाल और ग्रामीण की भूमिका कुलदीप शर्मा ने निभाई। रूप सज्जा राकेश कुमार का था।


इसके बाद इप्टा की गोरखपुर इकाई ने प्रेमचंनद की कहानी रंगीले बाबू पर आधारित इसी नाम के नाटक का मंचन किया। नाट्य रूपान्तरण व निर्देशन डा. मुमताज खान का था। नाटक में एस रफत ने रसिक लाल, विनोद चन्द्रेश ने मास्टर साहब, रीना श्रीवास्तव ने मधुमती, सोनी निगम ने कमला, प्रियंका अग्रहरी ने बेटी, शिशिर बोस ने शाकिर, महेश तिवारी ने मनोहर लाल, धर्मेन्द्र दूबे ने सुन्दर लाल, सुगुण श्रीवास्तव ने दामोदर, शहनवाज ने बदरी, संजय प्रकाश सत्यम ने चंदू और आसिफ सईद ने उस्मान की भूमिका निभाई। गायन, नृत्य और वादन में प्रियंका मिश्रा, कुसुम देवी, स्वधा श्रीवास्तव, अभिषेक कुमार शर्मा, राम आसरे और विकास शर्मा शामिल रहे। संगीत व गीत संयोजन शैलेन्द्र निगम का था था जबकि परिधान व मंच परिकल्पना सीमा मुमताज की थी। रूप सज्जा राम बहाल की थी।

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