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रकबा दुलमापट्टी में भुखमरी और कुपोषण का साया, पांच दिन में मां और दो बच्चों की मौत

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कुशीनगर। कुशीनगर जिले के दुदही ब्लाक के रकबा दुलमा पट्टी गांव के मुसहर बस्ती गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, लाचारी लगातार लोगों की जान ले रही है. मुसहर बस्ती के एक मजदूर परिवार में पांच दिन में मां और उसके दो बच्चों की मौत हो चुकी है. मां और बड़े भाई की मौत के बाद डेढ़ माह की दुधमुंही  बच्ची की 11 सितम्बर को मौत हो गई. इस परिवार के दो और सदस्य काला जार बीमारी की भेंट चढ़ चुके हैं. परिवार के अन्य सदस्य भी बेहद कुपोषित व बीमार स्थिति में हैं.

ऐसे समय में जब यूपी सरकार सितम्बर महीने में राष्ट्रीय पोषण माह चला रही है, पांच दिन में माँ और दो बच्चों की मौत इस अभियान पर सवाल खड़ा कर देता है.

वीरेंद्र की गोद में डेढ़ माह की बच्ची गीता की 11 सितम्बर को मौत हो गई. यह तस्वीर 8 सितम्बर की है.

रकबा दुलमा पट्टी गांव वर्षों से कालाजार बीमारी के कारण चर्चा में रहा है. इस गांव में काला जार से एक दर्जन लोगों की मौत हुई है. अब इस बीमारी पर अंकुश है लेकिन कुपोषण, भुखमरी का साया अभी भी बना हुआ है.

इसी मुसहर बस्ती में गरीब मजदूर वीरेन्द्र की पत्नी संगीता आर उसके आठ वर्ष के बेटे श्याम की 6 सितम्बर को मौत हो गई. मौत का कारण सरकारी रिकार्ड में डायरिया दर्ज हुआ है लेकिन लोग बता रहे हैं कि इस परिवार की माली हालत बेहद खराब थी और वे किसी तरह दो जून की रोटी का इंतजाम कर पा रहे थे. परिवार के सभी सदस्य कुपोषित हैं.

परिवार का मुखिया वीरेन्द्र 35 वर्ष खुद भी कुपोषित है. उसके परिवार में पत्नी संगीता (30) के अलावा तीन लड़कियां-लक्ष्मी (10), सीता (4) और गीता (डेढ माह) और दो लड़के-श्याम (8) और सन्नू (2) हैं. वीरेन्द्र के एक बेटे लक्ष्मण की पांच वर्ष पहले 10 वर्ष की अवस्था में कालाजार बीमारी से मौत हो चुकी है. संगीता की बहन की भी कालाजार बीमारी से मौत हुई थी.

रकबा दुलमा पट्टी की मुसहर बस्ती

वीरेन्द्र के अनुसार छह सितम्बर की सुबह सात बजे संगीता और फिर श्याम को उल्टी-दस्त शुरू हुआ. तबियत ज्यादा बिगड़ने पर उसने गांव के एक व्यक्ति के मोबाइल से एम्बुलेंस सेवा 108 पर फोन किया. सभी एम्बुलेंस से दस बजे दुदही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर पहुंचे. वहां दोनों को भर्ती कर दिया गया लेकिन कुछ देर बाद पता नहीं क्यों दोनों को पडरौना जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया.

वीरेन्द्र के अनुसार जब संगीता को पडरौना ले जाने के लिए एम्बुलेंस में  बैठाया जा रहा था तभी उसकी मौत हो गई. इसके बावजूद चिकित्सकों ने सांस चलने की बात कहते हुए उसे पडरौना जिला अस्पताल भेज दिया. रास्ते में बेटे श्याम की भी मौत हो गई. पडरौना जिला अस्पताल पहुंचने पर चिकित्सकों ने परीक्षण के बाद दोनों को मृत घोषित कर दिया .

वीरेन्द्र का आरोप है कि दुदही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर उसकी पत्नी और बच्चे के इलाज में लापरवाही हुई.

वीरेंद्र का घर

पत्नी और बेटे के शव को वीरेन्द्र पडरौना जिला अस्पताल से टेम्पो से घर लाया. स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारी भी गांव पहुंचे. अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी कि किसी ने संगीता के मुंह पर झाग देखकर मौत के अन्य कारण की चर्चा कर दी. इसके बाद ग्राम प्रधान व अन्य लोगों ने विचार-विमर्श कर वीरेन्द्र की सहमति से शवों का पोस्टमार्टम कराने का निर्णय लिया. दोनों शवों को फिर पडरौना पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया. पोस्टमार्टम के बाद शव गांव आया और अंतिम संस्कार किया गया.

इसी बीच वीरेन्द्र की बड़ी बेटी लक्ष्मी की भी तबियत खराब हो गई. उसे भी कुछ देर के लिए अस्पताल में भर्ती करना पड़ा.

संगीता की मौत के बाद उसकी डेढ़ माह की बच्ची गीता को देखने वाला कोई नहीं बचा. रिश्ते में नानी लगने वाली एक महिला उसका देखभाल कर रही थी. जानकारी के अभाव में महिलाएं उसे पाउडर का दूध बोतल से पिला रही थी. उसकी हालत निरंतर बिगड़ती जा रही थी. आठ सितम्बर को गांव पहुंचे क्षेत्रीय कांग्रेस विधायक अजय कुमार लल्लू, मानवाधिकार कार्यकर्ता राजेश मणि ने बच्ची को जिले मुख्यालय स्थित पोषण केन्द्र भेजने को कहा लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया. तबियत ज्यादा खराब होने पर 10 सितम्बर को उसे पडरौना जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां 11 सितम्बर को उसकी मौत हो गई.

वीरेन्द्र तमकुहीराज में ठेला पर सामान ढोने का कार्य करता था. आर्थिक तंगी के कारण उसने कुछ महीने पहले ठेला बेच दिया. इसके बाद वह भवन निर्माण में मजदूरी करने लगा लेकिन इसमें उसे रोज काम नहीं मिलता है. इस कारण घर की माली हालत और बिगड़ती गई.

वीरेन्द्र का पूरा परिवार एक तंग कमरे में रहता है. उसी में रसोई भी बनती है. कमरे के बगल में शौचालय बना है. पानी पीने के दिए देशी हैंडपम्प है. मुसहर बस्ती में एक इंडिया मार्का हैण्डपम्प भी है जिसके बारे में लोगों की शिकायत है कि पानी बदबूदार और पीले रंग का आता है.

वीरेन्द्र का राशन कार्ड बना है। ग्राम प्रधान की मौजूदगी में उसने दबे जुबान से कहा कि उसे हर महीने राशन मिल जाता है लेकिन उसके छोटे से कमरे में गेहूं-चावल को कोई बोरा या बर्तन नहीं दिखाई दिया. रस्ती के सहारे में एक बर्तन टंगा हुआ था जिसके बारे में पूछने पर उसने बताया कि इसी में राशन है.

उसकी पत्नी संगीता के नाम से 21 जून 2017 में बना मनरेगा कार्ड है लेकिन 15 महीने में उसे मनरेगा से कोई कार्य नहीं मिला. मनरेगा कार्ड में उसकी फोटो और नाम के अलावा सभी पन्ने सादे हैं. ग्राम प्रधान पप्पू वर्मा ने स्वीकार किया कि पिछले डेढ वर्ष से मनरेगा में कोई काम नहीं हुआ है. इसके पहले हुए काम का भी भुगतान नहीं हुआ है.

ग्राम प्रधान ने दावा किया कि वीरेन्द्र की पत्नी और बेटे की मौत उल्टी-दस्त से हुई है. परिवार गरीब जरूर है लेकिन भुखमरी का संकट नहीं है. इसके पहले भी गांव में दूसरे परिवार डायरिया से पीड़ित हुए थे जो समय से इलाज होने पर ठीक हो गए.

ग्राम प्रधान और जिले के अधिकारी भी संगीता और श्याम की मौत को डायरिया ही बता रहे हैं लेकिन वीरेन्द्र की घर की परिस्थितियां और उसके बच्चों का हाल बता रहा है कि वे भुखमरी और कुपोषण से जूझ रहे हैं. संगीता और श्याम की मौत के बाद भी उसके बच्चों को पोषण केन्द्र में भर्ती नहीं किया जाना प्रशासन की घोर लापरवाही का परिचायक है.

करीब 13 हजार की आबादी वाले रकबा दुलमा पट्टी गांव में मुसहरों के दस घर हैं. सभी मुसहरों की हालत एक जैसी है. वीरेन्द्र की पत्नी का भाई 28 वर्षीय प्रेम भी मजदूरी कर गुजारा कर रहा है. दोनों के घर आस-पास ही हैं. प्रेम के नाम भी जाब कार्ड है लेकिन पिछले डेढ वर्ष से उसे कोई काम नहीं मिला है. जाब कार्ड के सभी पन्ने सादे हैं.

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  • दुलमा पट्टी की खबर व्यवस्था पर सवाल उठाती है,हमें झकझोरती है।