जीएनल स्पेशल स्मृति

यादों के झरोखों से रवींद्र सिंह

( गोरखपुर  व लखनऊ छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व विधायक रवींद्र सिंह की 39 वीं पुण्यतिथि पर  उन्हें याद कर रहे हैं कथाकार रवि राय )

बात करीब 40 साल पहले की है। गोरखपुर के रेलवे प्लेटफॉर्म नम्बर एक से शानेअवध और पूर्वांचल एक्सप्रेस नाम की दो गाड़ियां सुबह एक साथ छूटती थीं । शाने अवध पश्चिम की ओर लखनऊ और पूर्वांचल एक्सप्रेस पूरब की ओर वाराणसी जाती थी।दोनों ट्रेनों के पिछले छोर के डिब्बों के बीच थोड़ा गैप रक्खा जाता ताकि सवारियों को सही ट्रेन की पहचान रहे फिर भी एकाध लोग अक्सर घपचिया ही जाते । तब दिल्ली के लिए गोरखपुर से कोई सीधी ट्रेन सेवा नहीं थी क्योंकि उस वक्त बड़ी लाइन सिर्फ लखनऊ तक ही थी। लखनऊ से गोरखपुर और इससे आगे छोटी लाइन ही थी। दिल्ली के लिए गोरखपुर से लखनऊ जाकर ट्रेन बदलनी पड़ती थी।

30 अगस्त 1979 को मैं गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर अपने पिताजी को ट्रेन पर बैठाने गया था।उन्हें जाना तो दिल्ली था पर लखनऊ तक तो उनका शाने अवध का ही सफर था। जी आर पी थाने से थोड़ा पूरब उनका कोच लगा था।सामान सीट आदि सब स्थिर हो गया । ट्रेन छूटने में अभी काफी समय था । पिताजी ने मुझे जाने के लिए भी कह दिया मगर मैं कोच से बाहर आकर प्लेटफार्म पर ही उनकी खिड़की के पास खड़ा था।

तभी देखा श्याम जी त्रिपाठी बदहवास भागते चले आ रहे हैं।मैंने उनकी तरफ बढ कर पूछ लिया,
” क्या हुआ ?”
त्रिपाठी जी थाने की ओर भागते हुए बस इतना ही बोले ,
” नेताजी को गोली लगी है, फर्स्ट क्लास गेट पर हैं !”

मैं जब तक फर्स्ट क्लास गेट पर पहुंचा ,भीड़ लगनी शुरू हो गई थी। तब गेट के पोर्टिको से प्लेटफॉर्म की ओर आते हुए बायीं ओर पहले प्लेटफॉर्म टिकट और बाद में पूछताछ काउंटर था।इसी काउंटर के ठीक सामने नेताजी यानी रवींद्र सिंह फर्श पर चित्त पड़े हुए थे। आंखें खुली हुई थीं।खादी का सफेद कुर्ता पायजामा पहने थे और उनके सीने पर लाल सफेद रंग का चारखानेदार बनारसी गमछा पड़ा था। शायद उनके बॉडी गार्ड ने ही घाव को ढंकने के लिए अपना गमछा नेताजी पर डाल दिया था। उनकी एक पैर की चप्पल निकल कर पास ही पड़ी थी दूसरी पाँव में थी। सर के पास ही नंगी रिवाल्वर लिए गार्ड चौकन्नी निगाहों से चारों ओर देखता खड़ा था।तभी श्यामजी के साथ थाने से भागते हुए पुलिस वालों का भारी अमला आ पहुंचा।सभी को वहां से हटाया जाने लगा। इंतज़ार करती दोनों ट्रेनें समय से थोड़ा पहले ही रवाना कर दी गईं।

मैं बाहर बढा तो पोर्टिको के भीतर सीढ़ियों के पास एक लड़का पड़ा दिखाई दिया। पोर्टिको से बाहर कुछ ही दूरी पर एक अन्य आदमी औंधे मुंह जमीन पर पड़ा था। लोग उसके पास भीड़ लगा रहे थे।अचानक पुलिस की कई गाड़ियां आ पहुंची।एक सिपाही ने आगे बढ़ कर जमीन पर औंधे पड़े आदमी के शरीर को सीधा किया तो उसके नीचे एक रिवाल्वर दिखी।भीड़ आतंकित हो कर भाग चली। यह आदमी घायल था, पैर में गोली लगो थी।इसकी पहचान पृथ्वी राज तिवारी के रूप में हुई।
रिवाल्वर कब्जे में लेकर पुलिस ने तिवारी को तुरन्त अस्पताल भेज दिया।नेताजी को भी ऐम्बुलेंस से अस्पताल ले जाया गया।

गोरखपुर शहर में देखते ही देखते जंगल की आग की तरह चारो ओर यह खबर फैल गई कि नेताजी को गोली मार दी गई है और उनकी हालत गंभीर है।हमलावर और गार्ड के शूटआउट में घायल लड़के की मृत्यु हो गई थी।उसके पास से बरामद प्रवेश पत्र से मालूम हुआ कि वह गाज़ीपुर का निवासी था और किसी परीक्षा में भाग लेने आया था।

शहर में कई जगह पुलिस की भारी फोर्स किसी अनहोनी की आशंका में तैनात कर दी गई। जिलाधिकारी बंगले के सामने थोड़ी दूर पर एस एन एम त्रिपाठी और धर्मशाला में तिवारी जी के हाता पर सुरक्षा बढ़ा दी गई। अस्पताल में शहर और दूरदराज से लगातार आते जा रहे लोगों का हुजूम बढ़ता ही जा रहा था।प्रदेश मंत्रिमंडल में उस समय नेताजी के खास मित्र और इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष श्री सत्यप्रकाश मालवीय मंत्री थे।उन्होंने नेताजी को फौरन लखनऊ लाने के लिए स्टेटप्लेन की व्यवस्था की किन्तु उससे पहले ही नेताजी की मृत्यु हो गई।

नेताजी से मेरी मुलाकात मेरे घर पर ही हुई। वे विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने जा चुके थे।अखबार में प्रकाशनार्थ एक बयान देने आए थे।पिताजी ‘आज’ के गोरखपुर प्रतिनिधि थे।तब यह अखबार बनारस से छप कर रोज गोरखपुर आता था।लोग तमाम खबरें देने छोटे काजीपुर स्थित मेरे घर आते रहते थे। नेताजी के साथ कृष्ण चंद्र श्रीवास्तव थे जो छात्र संघ के उपाध्यक्ष थे।मेरे घर से थोड़ी दूर जगन्नाथपुर में रहते थे।बाद में आज के बख्शीपुर कार्यालय में भी कई बार नेताजी मिले। मैं इंटर कालेज में छात्रसंघ का चुनाव लड़ा और जीत गया।

कुछ ही दिनों बाद कालेज में छात्र आंदोलन हुआ और मैं उपाध्यक्ष अशोक उपाध्याय तथा मंत्री शिवशंकर लाल के साथ अनशन पर बैठ गया।रवींद्र सिंह और अशोक पांडेय हमारे समर्थन में आए।जिला प्रशासन को तब बेचैनी बढ़ी और सिटी मजिस्ट्रेट राम स्वरूप सक्सेना ने आकर मध्यस्थता की।करीब अस्सी घण्टे बाद कालेज प्रबंधन ने हमारी मांगें मान लीं।

रवीन्द्र सिंह ने युवाओं को एक जुट करने के लिए भारतीय युवक संघ का गठन किया।मुझे उसका सदस्य बनाया। इसका कार्यालय गोलघर में बॉबीज होटल के ठीक ऊपर था। मैं अक्सर वहां जाता। 1974 में ही कांग्रेसी नेता यशपाल कपूर गोरखपुर आए थे।इन्होंने ही ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ का नारा दिया था।ज़िला परिषद हाल में उनकी बैठक थी।छात्रों ने उनका विरोध करने का निर्णय लिया।प्रदर्शन में श्री शीतल पांडेय ( वर्तमान विधायक, सहजनवा ), घनानंद पांडेय, लालसिंह के साथ मुझे भी पुलिस ने हिरासत में लिया। खास तौर से मुझे तो सिटी मजिस्ट्रेट सक्सेना ने ही पकड़ा था।कैंट थाने से अगले दिन हमें छोड़ दिया गया।नेताजी ने हम चारों को गोलघर कार्यालय बुलाया और हमारा खूब ‘ज्ञानवर्धन’ किया।

शुरुआती दिनों में अपने मित्रो के साथ मैंने ‘ समानान्तर साहित्यिक संघ ‘ का गठन किया था। विमल झा साथ थे। इसका उद्घाटन करने मेरे अनुरोध पर नेताजी आए।उन्होंने खूब जबरदस्त भाषण दिया , हमारा उत्साहवर्धन किया।
विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में अपने प्रत्याशी के समर्थन में नेताजी का भाषण होना था।विपक्षी उम्मीदवार ने बीएचयू के तेजतर्रार छात्रनेता और प्रखर वक्ता चंचल सिंह को बुला लिया था। आमने सामने मंच लगा। नेताजी करीब ढाई घंटे तक बोले। सामने का तंबू उखड़ गया।हालांकि,बाद में चंचल दा ने बताया कि समय के मुकाबले के बारे में उन्हें बताया ही नहीं गया था।

वह ऐसा समय था जब गोरखपुर के दो राजनीतिक ध्रुवों में वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई थी। आए दिन कभी इधर कभी उधर किसी न किसी रूप में मुठभेड़ होती ही रहती। रवीन्द्र सिंह इस क्षेत्र से एक नई बयार की तरह नौजवानों के मनोमस्तिष्क पर प्रभावी हो रहे थे।

सेंट एंड्रयूज़ ,गोरखपुर विश्वविद्यालय और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय तक छात्र राजनीति का परचम फहराते हुए वे बुलंदियों की ओर बढ़ते जा रहे थे।अखबारों की सुर्खियों में रहते थे।लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव जीतने पर छात्रों ने लखनऊ शहर में उनका विजय जुलूस निकाला। वे तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के निवास तक हाथी पर चढ़ कर गए और वहीं सभा कर मुख्यमंत्री को ललकारा।

प्रखर वक्ता, क्रांतिकारी सोच और आकर्षक व्यक्तित्व ने जल्द ही उन्हें एक नई पहचान दी। कौड़ीराम विधान सभा सीट से चुनाव जीत कर वे विधायक बने और क्षेत्र के विकास के लिए प्रयास में लगे हुए थे।उनकी अकाल मृत्यु से पूर्वांचल ने अनेकानेक संभावनाओं का नेता खो दिया।
आज उनकी उनतालिसवीं पुण्य तिथि पर उन्हें स्मरण के साथ मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

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