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मस्जिदों में हुआ ‘हजरत उमर’ व ‘शहीद-ए-कर्बला’ का जिक्र

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गोरखपुर। मंगलवार को सूर्यास्त होते ही इस्लामी नये साल का प्रारंभ हो गया। माह-ए-मुहर्रम शुरू होते ही 1440 हिजरी लग गयी। मस्जिदों में ‘जिक्रे-शोहदा-ए-कर्बला’ की महफिल बाद नमाजे एशा शुरू हुई। मुसलमानों के दूसरे खलीफा अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना उमर रजियल्लाहु अन्हु को उनके शहादत दिवस पर शिद्दत से याद किया गया। इमामचौकों पर रौनक दिखी।

गौसिया जामा मस्जिद छोटे काजीपुर में मुफ्ती मो. अजहर शम्सी ने हजरत उमर की शान बयान करते हुए कहा कि हजरत उमर पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के प्रमुख चार सहाबा (साथियों) में से थे। वह हज़रत अबू बक्र के बाद मुसलमानों के दूसरे खलीफा चुने गये। पैगंबर-ए-इस्लाम ने आपको फारूक की उपाधि दी थी। जिसका अर्थ होता है सत्य और असत्य में फर्क करने वाला। पैगंबर-ए-इस्लाम के अनुयाईयों में इनका रुतबा हज़रत अबू बक्र के बाद आता है। हजरत उमर जब ख़लीफा हुए तब एक नये दौर की शुरुआत हुई। मजहब-ए-इस्लाम का खूब विस्तार हुआ। हजरत उमर की न्यायप्रियता जग जाहिर है। हजरत उमर अहले बैत से बहुत मोहब्बत करते थे। आपकी शहादत 1 मुहर्रम 24 हिजरी को हुई।

उन्होंने ‘जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला’ पर कहा कि नवासा-ए-रसूल हजरत सैयदना इमाम हुसैन ने मैदान-ए-कर्बला में अपनी और अपने भूखे प्यासे बच्चों, जानिसारों की कुर्बानी पेश करके दुनिया को यही पैगाम दिया कि यजीद जैसे बातिल के सामने कभी झुकना नहीं, जो गलत है उसे गलत कहना चाहिए।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर में मौलाना मो. असलम रज़वी ने तकरीर में कहा कि इमाम-ए- हुसैन ने जो बेमिसाल कुर्बानी पेश की जमीनों-आसमान ने ऐसे मंजर नहीं देखे होंगे। हजरत उमर की जिंदगी पर रोशनी डालते हुए कहा कि हिजरत के बाद मदीना इस्लाम का एक नया केन्द्र बन चुका था। हजरत उमर ने सन् हिजरी इस्लामी कैलेंडर का निर्माण किया जो इस्लाम का पंचांग कहलाता है। हजरत उमर असाधारण इच्छा शक्ति, बुद्धि, राजनीतिक, निष्पक्षता, न्याय और गरीबों और वंचितों लोगों के लिए देखभाल के लिए अच्छी तरह से जाने जाते थे।

बेलाल मस्जिद इमामबाड़ा अलहदादपुर में कारी शराफत हुसैन कादरी रज़वी ने कहा कि हजरत उमर के बारे मे यूरोपीय लेखकों ने कई किताबें लिखी हैं तथा हजरत ‘उमर महान’ की उपाधि दी है। प्रसिद्ध लेखक माइकल एच. हार्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि हन्ड्रेड’ में हज़रत उमर को शामिल किया है। उन्होंने कर्बला की जंग पर कहा कि जिन हालात में इमाम-ए-हुसैन आली मुकाम ने मुकाबला किया अगर रूस्तमे वक्त होता तो वह भी लरज जाता।

मियां साहब इमामबाड़ा के मर्सिया खाना में मौलाना फैजुल्लाह कादरी ने कहा कि मुहर्रम का महीना शुरू हो चूका है माहौल सोगवार है। ऐसे में मुसलमानों से गुजारिश है कि शोहदा-ए- कर्बला के नाम से कुरआन ख्वानी, फातिहा ख्वानी, इसाले सवाब करें। गरीबों व फकीरों की हाजत पूरी करें, उनको खिलाना-पिलाना सवाब है।

मस्जिदे मदद अली (एक मीनारा) बेनीगंज में कारी मो. शाबान बरकाती ने हजरत उमर की जिंदगी पर रोशनी डालते हुए कहा कि हजरत उमर ख़ुलफा-ए-राशीदीन में सबसे सफल ख़लीफा साबित हुए। मुसलमान हजरत उमर को फारूक-ए-आज़म तथा अमीरुल मोमिनीन भी कहते हैं। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने हमें पैगाम दिया कि जो बुरा है उसकी बुराई दुनिया के सामने पेश करके बुराई को खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए। इसके लिए चाहे जिस चीज की कुर्बानी देनी पड़े, ताकि दुनिया में जो अच्छी सोसाइटी के ईमानदार लोग हैं वह अमनो-अमान के साथ अपनी जिंदगी गुजार सकें।

दारुल उलूम अहले सुन्नत मजहरुल उलूम घोषीपुरवा में कारी रईसुल कादरी ने बताया कि हजरत सैयदना इमाम हुसैन का नाम हुसैन और कुन्नीयत अबु-अब्दुल्लाह है। आपके वालिद हजरत अली, वालिदा हजरत फातिमा, नाना पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम व नानी हजरत खदीजतुल कुब्रा़ हैं।

मक्का मस्जिद मेवातीपुर इमामबाड़े के पास कारी मो. अय्यूब बरकाती ने इमाम हुसैन की शान बयान की। नात कारी अंसारुल हक कादरी ने पेश की।

हजरत शाह मुकीम शाह जामा मस्जिद बुलाकीपुर में मौलाना रियाजुद्दीन कादरी ने बताया कि हजरत इमाम हुसैन का शजर-ए- नसब (वंशावली) यह है हुसैन बिन अली बिन अबी-तालिब बिन हाशिम बिन अब्द-मनाफ़ करशी हाशिमी व मुत्तलबी।

मस्जिद सुप्पन खां (कुरैशिया मस्जिद) खूनीपुर में मौलाना अबुल कलाम अजहरी व मौलाना सदरुल हक निजामी ने कहा कि इमाम हुसैन ने अजीम कुर्बानी पेश कर बातिल कुव्वतों को करारी शिकस्त दी। इमाम हसन व हुसैन जन्नती जवानों के सरदार हैं।

मस्जिद हरमैन रायगंज में मो. नेमतुल्लाह चिश्ती ने कहा कि मुहर्रम बातिल के ऊपर हक की जीत, जुल्मत (अंधेरा) पर नूर के गालिब आने का महीना है।

अंधियारी बाग स्थित आस्ताना हजरत मिस्कीन शाह पर मौलाना मकसूद व कारी नसीमुल्लाह ने हजरत इमाम हुसैन की शान में बयान किया। आस्ताना केे खादिम फिरोज अहमद ने बताया कि यहां दस मुहर्रम तक जिक्रे शोहदा-ए-कर्बला की महफिल बाद नमाज एशा सजेगी।