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मदरसों में साइंस -मैथ पढ़ाने वाले शिक्षकों को 40 महीनों से मानदेय नहीं दे रही है मोदी सरकार

गोरखपुर। केंद्र पुरोनिधानित मदरसा (एसपीक्यईएम) आधुनिकीकरण योजना के तहत प्रदेश के मदरसों में विज्ञान, गणित, हिंदी-अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षकों को 40 माह से मोदी सरकार मानदेय नहीं दे रही है.

उप्र के 6726 मदरसों में केंद्र पुरोनिधानित मदरसा आधुनिकीकरण योजना संचालित है. यह योजना वर्ष 1993 में कांग्रेस की नरसिम्हा सरकार ने शुरू की थी. इस योजना के तहत 30,000 शिक्षकों की नियुक्ति हुई जो मदरसों में विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, सामाजिक विज्ञान, कम्प्यूटर की शिक्षा वर्ष देते चले आ रहे हैं. पहले हर मदरसे में दो शिक्षकों की नियुक्ति हुई जिसे दो बार में बढाकर चार कर दिया गया . ये शिक्षक पांच वर्ष की संविदा पर रखे गए.

योजना के तहत केंद्र सरकार स्नातक शिक्षक को 6 हज़ार रुपये और स्नातकोत्तर शिक्षक को 12 हज़ार रुपये देती है. राज्य सरकार स्नातक शिक्षक को 2 हज़ार रुपये और स्नातकोत्तर शिक्षक को 3 हज़ार रुपये अलग से देती है.

गोरखपुर न्यूज़ लाइन और चलचित्र अभियान ने गोरखपुर के दीवान बाजार स्थित मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया जाकर शिक्षकों और शिक्षिकाओं से बातचीत की. आप उनकी व्यथा कथा को यहाँ देख-सुन सकते हैं.

मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों ने बताया कि मोदी सरकार के सत्ता में आते ही इस योजना पर हमले शुरू हो गया. वर्ष 2018 में चौथे शिक्षक के रूप में रखे गए शिक्षकों को संविदा समाप्त होते ही नौकरी से हटा दिया गया. तमाम आन्दोलन के बाद भी उन्हें वापस नहीं लिया गया. उत्तर प्रदेश में ऐसे सात हजार शिक्षकों की नौकरी गई.

इसके पूर्व से केंद्र सरकार ने शिक्षकों का मानदेय देना बंद कर दिया. मोदी सरकार ने पिछले 40 माह से मंदी नहीं दिया है. मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक प्रदेश सरकार से मिलने वाले दो हजार और तीन हजार के मानदेय पर गुजरा करने को विवश हैं. यह मंदी भी उन्हें नियमित रूप से नहीं मिलता है.

मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार में शिक्षक मोहम्मद आज़म ने बताया कि सितंबर 2018 में जब राष्ट्रीय अल्संख्यक आयोग के सदस्य सरदार मंजीत सिंह राय जिले में आए थे, तो उनके सामने शिक्षकों की समस्या उठी थी। उन्होंने आश्वस्त किया था कि समस्या का समाधान 15 दिन में कराएंगे, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।

खोखर टोला की रहने वाली मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार में शिक्षिका गौसिया सुम्बुल ने कहा कि मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों पर मदरसों में हिन्दी, विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, अंग्रेजी पढ़ाने का दारोमदार हैं। शिक्षक दिल्ली से लेकर लखनऊ तक गुहार लगा चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। रोजी-रोटी, चिकित्सा समेत तमाम दुश्वारियों से दो चार होना पड़ रहा है। 40 माह से मानदेय नहीं मिलने से मदरसा शिक्षकों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। हमारी मांग है कि मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों का बकाया मानदेय जल्द दिया जाए, उन्हें स्थायी किया जाय, केंद्र सरकार के बराबर उप्र सरकार द्वारा अंशदान दिया जाए, प्रतिमाह मानदेय दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और केंद्र व प्रदेश सरकार का मानदेय एक साथ दिया जाय.

बेटे को थैलीसीमिया बीमारी, इलाज कराते-कराते कर्जदार हो गया – आसिफ

जमुनहिया बाग गोरखनाथ के रहने वाले आसिफ महमूद खान ‘एम फातिमा गल्स स्कूल नकहा नं.1’ में आधुनिकीकरण शिक्षक हैं। इनका चार साल का बच्चा थैलीसीमिया बीमारी से पीड़ित है। दो माह में तीन बार उसे खून चढ़ाया जाता है। इनके बेटे को को पैदाइश के पांचवें माह में मेजर थैलीसीमिया जैसी बीमारी ने चपेट में ले लिया। उन्होंने बताया कि 40 माह से केंद्र सरकार ने मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों का मानदेय नहीं भेजा है। ऐसे में बच्चे का इलाज कराने में काफी परेशानी हो रही है। बच्चे को दो माह में तीन बार खून चढ़ता है। हर बार ढ़ाई से तीन हजार रुपया खर्च होता है। प्रदेश सरकार द्वारा मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षकों को दिया जाने वाला राज्यांश भी नियमित रूप से नहीं मिला है। ऐसे में इलाज व घर का खर्चा चलाना मुश्किल होता है। वहीं बेटे की बीमारी पर काफी खर्च होता है। काफी कर्जदार हो गया हूं।

हर बार मानदेय के लिए संघर्ष करना पड़ता है शिक्षकों को : नवेद

अखिल भारतीय मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक संघ के मंडल अध्यक्ष नवेद आलम ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा संचालित मदरसा आधुनिकीकरण योजना जब से शुरू हुई है तब से सरकार माहवार मानदेय देने की व्यवस्था तक सुनिश्चित नहीं कर सकी है। जिले में 163 के आस-पास मदरसे केंद्र सरकार द्वारा संचालित मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत आच्छादित हैं। इसमें करीब 489 शिक्षक कार्यरत हैं। सरकार कई बार मदरसों की जांच करवा चुकी है। मदरसा शिक्षकों ने हर बार जांच में पूरा सहयोग किया इसके बाद भी मानदेय रोके जाने से शिक्षक आक्रोशित हैं।

अब तो मन करता है कि नौकरी छोड़ दें लेकिन जाएँ कहाँ -शबाना खातून और सीरी तब्बसुम

मदरसा दारुल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार में शिक्षिका शबाना खातून और सीरी तब्बसुम ने कहा की अब तो घर वाले कहते हैं कि नौकरी ही छोड़ दो. हम लोग वर्षों से कार्य कर रहे हैं. कोई 15 तो कोई दस वर्ष से पढ़ा रहा है. जिन्दगी के इतने वर्ष शिक्षा के लिए देने के बाद वेतन तक समय से न मिलना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. हम अब कहीं और जा भी नहीं सकते. मोदी-योगी सरकार बेटी पढाओ -बेटी बचाओ की बात करती है लेकिन हम तो मदरसे में बेटियों के साइंस, अंग्रेजी, हिंदी पढ़ा रहे है , हमारा तो कोई ध्यान नहीं रख रहा. आखिर हम क्या करें.

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