लोकसभा चुनाव 2019

‘ ताल ठोको, तालियां कुछ और भी कहती हैं ‘

प्रतीकात्मक फोटो

 

पांच साल खइलंs, अब इहे भर खइहंs. चुनावी चकल्लस पर ये बेलाग जवाब गांव के एक बुजुर्ग किसान का है. जो टीवी डिबेट के हल्ला बोल, ताल ठोक जैसे शोर से अपरिचित है. यह उसके उमर के तजुर्बे की समझ है. जिसमें चुने हुए जनप्रतिनिधि या सत्ता के निरकुंश होने की प्रवृत्ति पर करारा तंज है.

वह आगे भी कहते हैं- बाबू, इ लरिके सब टीवी देखिके ताली बजावेलंs. टीवी पर दू टोक बोलिके ताली बजवा लिहले से अच्छा नाही कहल जाई. कुछ अच्छा भी होयेके चाहीं. महंगाई बढ़ल जात बा. कर्ज भी माफ नाही भइल. प्रधानी चुनाव के तरह चुनाव अइले पर दू-दू हजार बांट दिहले से का होई. एतना सब केहू समझेला. अब अउर केहू के आवे के चाहीं.

50 साल तक राज करने की मंशा वाले दंभी बयानवीर को कम से कम अब अपनी लोकतांत्रिक समझ को जरूर दुरुस्त करनी चाहिए. कि कैसे एक बार बूथ पर बटन दबा कर अपनी रोजमर्रा में गुम हो जानेवाला आमजन पांच बरस बाद एक तार्किक समझ भी बना लेता है. वहीं वोट पाकर सत्ता में बैठनेवाला सिर्फ ज़ुबान के जोर पर लगातार सत्तासीन होने का भ्रम पाल लेता है. ‘बैठ जा मौलाना, बैठ जा! मंदिर वहीं बनेगा…’ जैसे जहरीले बयानों से टीवी डिबेट में चीख-पुकार मचाने वाले इनके संस्कारिक प्रवक्ता भला लोकतांत्रिक संस्कार समझ भी कैसे सकते हैं. वो तो सिर्फ अपने राष्ट्रवादी संस्कार का ठेका ले रखे हैं.

राह चलते गुफ्तगूं में इस्लाम कहते हैं- बड़ा बुरा समय आ गइल बा, अब तs कुछ कहले सुनले में डर लागेला. चाहे जइसन रहल पहिले ई तरीके क माहौल नाही रहल. होली की शाम नुक्कड़ के कटेरे की दुकान पर चिकेन खरीदने पहुंचे कुछ युवा तो मानो गोदी मीडिया के मंशा पर पानी ही फेर रहे थे. ये युवा इत्मिनान से वही शक-सुबहा और सवाल उठा रहे थे जिस पर कि गलाफाड़ू एंकर देशद्रोह व देश से माफी मांगने का हुंकार भरता है.

यहां पर चर्चा के केंद्र में था पुलवामा घटनाक्रम के बाद गांव-गली में निकाले गए विजय जुलूस. कोई कह रहा था कि किसी संगठन या पार्टी विशेष के कार्यकर्ताओं द्वारा इस तरह का जुलूस निकालना मानो सेना भी किसी खास पार्टी की हो. तो कोई कह रहा था जुलूस में प्राइवेट स्कूल के बच्चों को शामिल कर जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगवाना उचित नहीं था. तो एक ने अपना निष्कर्ष निकालते हुए कहा- इस सरकार में सबसे बड़ा फर्क यह आया है कि पहले लोग किसी भी पार्टी या नेता के बारे में बुरा-भला बोल सकते थे पर अब नहीं.

कमाल है, एक तरफ हाइटेक पहरेदार मीडिया का हल्ला बोल है. जिसके डिबेट में भय, भूख, बेरोजगारी के खिलाफ ताल ठोका जाता है. और ऐसा महसूस करने वालों को पड़ोसी देश भेज देने की धौंस पर ताली बजवाई जाती है. मानो सबकुछ बल्ले-बल्ले हो गया और बस अब सरदार के खुश होने की बारी है. वहीं दूसरी तरफ जनमानस में भय, भूख, बेरोजगारी पर चर्चा ए आम है. चर्चा तुम्हारी भी है, चर्चा उनकी भी है. साथ ही शक ओ सुबह के तरह-तरह के कयास भी हैं. साहबजादों, अब किसको-किसको भेजोगे पड़ोसी मुल्क? यहां तो भेजने बुलाने की जनता की बारी आ गई है. तुम सिर्फ ताल ठोंको. तालियां सब जगह बज रही हैं. तुम्हारे स्टूडियो भर में नहीं. इसके मायने मतलब निकालना अब तुम्हारे बस का नहीं.

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